गर्म रातें और बढ़ता हीट स्ट्रेस, दिल्ली के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

क्लाइमेट चेंज के जोखिमों के बीच दिल्ली जैसे शहरों में बढ़ती गर्मी का खतरा एक गंभीर वास्तविकता है, जिससे निपटने के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

दिल्ली की रातें लगातार अधिक गर्म होती जा रही हैं. 25 मई को शहर में पिछले 14 वर्षों की सबसे गर्म रात दर्ज की गई लेकिन यह पहली बार नहीं था. थिंक-टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट ‘मेकिंग दिल्ली हीट-रेजिलिएंट’ के मुताबिक, पिछले एक दशक में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के दिन जितने अधिक गर्म हुए हैं, रातों में भी उसी हिसाब से गर्मी बढ़ी है.

परिणाम यह है कि दिल्ली जैसे शहरों में रहने वालों को गर्मी की रात में भी राहत नहीं मिल पा रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे सबसे ज्यादा असर निर्माण मजदूरों, गिग वर्कर्स, रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं, बेघर लोगों और अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोगों पर पड़ा है. प्रभावित लोगों में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल हैं जो मिलकर लगभग दिल्ली की आधी आबादी हैं.

जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है जो लोग खर्च उठा सकते हैं वे राहत पाने के लिए एयर कंडीशनर (AC) का अधिक उपयोग करने लगे हैं. यही कारण है कि 21 मई को दिल्ली की अधिकतम बिजली मांग रिकॉर्ड 8,231 मेगावाट तक पहुंच गई, जो पिछले छह वर्षों में मई महीने की बिजली मांग में लगातार बढ़ोतरी को दर्शाती है.

AC का बढ़ता उपयोग शहरी ऊष्मा द्वीप (Urban Heat Island - UHI) प्रभाव को और बढ़ाता है, जिससे शहर और उसके आसपास के क्षेत्रों के तापमान में अंतर बढ़ जाता है. शहरी ऊष्मा द्वीप एक ऐसी घटना है जहां किसी शहर या महानगर का तापमान उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में काफी अधिक होता है. यह अंतर दिन की तुलना में रात में अधिक होता है और स्थानीय रूप से इसमें 2°C से लेकर 10°C तक का अंतर हो सकता है.

AC बाहर गर्म हवा छोड़ते हैं, जिससे खुले में रहने या काम करने वाले लोगों के लिए वातावरण और गर्म हो जाता है. CSE की रिपोर्ट के मुताबिक, इन कारणों से वातावरण में तापमान की असमानता बढ़ती है. CSE में सस्टेनेबल हैबिटेट कार्यक्रम की प्रबंधक और रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका मिताशी सिंह बताती हैं, "गर्म रात तब मानी जाती है, जब दिन का अधिकतम तापमान 40°C से ऊपर हो और रात का न्यूनतम तापमान सामान्य से 4.5°C से 6.4°C अधिक रहे. 25 मई को रात का तापमान 32.4°C तक पहुंच गया, जो पिछले 14 वर्षों की सबसे गर्म रात थी."

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दिल्ली में गर्मियों की रात ठंडी क्यों नहीं हो रही है? इसका मुख्य कारण शहर में बढ़ता कंक्रीटीकरण और हरित क्षेत्रों (पेड़-पौधे) तथा जल क्षेत्रों (तालाब, झील आदि) का लगातार कम होना है. दरअसल, शहर में तेजी से बन रहे सड़कों, इमारतों और नालियों में कंक्रीट का इस्तेमाल हो रहा है. इमारतें अब एक-दूसरे के बहुत करीब बनाई जा रही हैं. इन सबके कारण पर्याप्त छाया और तापरोधक व्यवस्था नहीं होती है.

साथ ही शहरों की योजना ऐसी बन रही है जिसमें अधिक निर्माण पर जोर है लेकिन हवा के आवागमन के लिए पर्याप्त जगह नहीं छोड़ी जाती. CSE में सस्टेनेबल हैबिटेट कार्यक्रम के निदेशक रजनीश सरीन कहते हैं, "हीट आइलैंड प्रभाव से बाहर काम करने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि उनके पास बढ़ती गर्मी से बचने के पर्याप्त साधन नहीं होते. वे घर के अंदर नहीं रह सकते और रोजी-रोटी कमाने के लिए उन्हें दिनभर काम करना पड़ता है."

सरीन कहते हैं, “स्थिति तब और कठिन हो जाती है जब रात में भी गर्मी से राहत नहीं मिलती. इसके अलावा, अगर गर्मी के कारण काम प्रभावित होता है या वे बीमार पड़ जाते हैं, तो उनकी आय भी कम हो जाती है.”

मई 2024 में प्रकाशित CSE की रिपोर्ट ‘अर्बन हीट स्ट्रेस ट्रैकर’ के मुताबिक, 2014 से 2023 के बीच दिल्ली में दिन और रात के तापमान के बीच होने वाली प्राकृतिक ठंडक में लगभग 9 फीसद की कमी आई है. मिताशी सिंह के मुताबिक, 2001-10 के दौरान दिन और रात के तापमान में लगभग 12°C का अंतर होता था, जो 2023 तक घटकर 9.8°C रह गया है.

उन्होंने यह भी बताया कि रात में अधिक तापमान सेहत पर ज्यादा गंभीर असर डाल सकता है क्योंकि दिनभर गर्मी झेलने के बाद शरीर रात में भी ठंडा नहीं हो पाता. इससे हृदय पर अधिक दबाव पड़ सकता है, नींद का चक्र बिगड़ सकता है, जिससे शरीर को आराम मिलने में समस्या हो सकती है. सरल शब्दों में कहें तो इससे लंबे समय तक शारीरिक नुकसान हो सकता है.

सरीन ने बताया कि दिल्ली की हीट एक्शन योजनाएं कमजोर और जोखिम वाले समूहों की पहचान तो करती हैं लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए ठोस उपाय नहीं बताती हैं. उन्होंने कहा, “अगर ऐसे कदम नहीं उठाए गए तो बढ़ते तापमान से प्रभावित लोगों की संख्या लगातार बढ़ेगी. दिल्ली को अपने संवेदनशील लोगों की सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक और व्यवस्थित योजना की जरूरत है.”

CSE की रिपोर्ट इस समस्या के समाधान के लिए दोहरी रणनीति अपनाने की सिफारिश करती है. इसके तहत पूरे साल और पूरे शहर में ऐसे कदम उठाने की जरूरत है, जैसे औद्योगिक क्षेत्रों, कार्यालय परिसरों, बाजारों और झुग्गी-बस्तियों में तापरोधी छतों को अनिवार्य बनाना.

रिपोर्ट में गर्मी को आधिकारिक आपदा घोषित करने, हीट डैशबोर्ड (हीटवेव लू की स्थिति, और वर्षा के पैटर्न को दर्शाने के इस्तेमाल होता है) विकसित करने, जलवायु के मुताबिक शहरी योजना बनाने और नई तथा पुरानी इमारतों में प्राकृतिक ठंडक देने वाले डिजाइन को अनिवार्य करने की भी सिफारिश की गई है. इसके अलावा, सार्वजनिक ठंडक सुविधाओं का विकास और सरकारी योजनाओं व जलवायु फंड का उपयोग भी जरूरी बताया गया है.

विशेष रूप से कमजोर समुदायों के लिए अनिवार्य विश्राम अवकाश, अलग-अलग समय पर काम की व्यवस्था, अत्यधिक गर्मी की स्थिति में स्पष्ट कार्य-प्रणाली तथा गर्मी संबंधी आपात स्थितियों में आर्थिक, चिकित्सा और सामाजिक सहायता जैसे कदम लागू किए जाने चाहिए.

रिपोर्ट के मुताबिक, हीट मैनेजमेंट अब कभी-कभार की चिंता नहीं रह गया है बल्कि यह हर साल सामने आने वाली वास्तविकता बन चुका है, जो भविष्य में और गंभीर हो सकती है. सरीन का मानना है कि बढ़ती गर्मी के खतरे से निपटने और शहरों को रहने योग्य बनाए रखने के लिए पहले से तैयारी करने वाली सक्रिय और प्रभावी हीट मैनेजमेंट नीति अपनाना जरूरी है.

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