हेल्थ सर्वे के गायब हुए डेटा पर चिंता क्यों जता रहे हैं एक्सपर्ट?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) से एनीमिया और शिशु मृत्यु दर से लेकर स्वच्छता और परिवार नियोजन तक, कई इंडिकेटर गायब हैं

केंद्र सरकार के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) की फैक्टशीट पिछले सप्ताह जारी की गईं. यह सर्वेक्षण 2023-24 के दौरान किया गया था. शुरुआत में अधिकतर ध्यान बाल पोषण, टीकाकरण कवरेज, मातृ स्वास्थ्य सेवाओं और स्वास्थ्य बीमा में हुई प्रगति पर गया.
लेकिन कुछ ही घंटों में शोधकर्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और नीति विश्लेषक एक अलग मुद्दे पर चर्चा करने लगे. वह था सर्वेक्षण के प्रमुख आंकड़ों से दशकों से ट्रैक किए जा रहे कई इंडिकेटर का गायब होना.
NFHS-5 (2019 से 2021 के बीच आयोजित) में शामिल 131 प्रमुख इंडिकेटर की तुलना में नवीनतम फैक्टशीट में 101 इंडिकेटर ही हैं. इनमें कई ऐसे मापदंड शामिल नहीं हैं जिनका उपयोग पारंपरिक रूप से भारत की सामाजिक और स्वास्थ्य प्रगति का आकलन करने के लिए किया जाता रहा है. इनमें एनीमिया की व्यापकता, शिशु मृत्यु दर, पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर, नवजात मृत्यु दर, जन्म के समय लिंगानुपात, स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन की उपलब्धता, स्वच्छता कवरेज, HIV के प्रति जागरूकता और परिवार नियोजन उपायों की गुणवत्ता शामिल हैं.
इन इंडिकेटर के हटने से स्वास्थ्य शोधकर्ताओं के बीच व्यापक बहस छिड़ गई है. इनमें से कई शोधकर्ता NFHS पर केवल राष्ट्रीय रुझानों के लिए ही नहीं बल्कि जिला स्तर की उन जानकारियों के लिए भी निर्भर रहते हैं जो दूसरी जगह उपलब्ध नहीं होतीं. हालांकि कुछ हटाए गए इंडिकेटर का डेटा सरकार की अन्य प्रणालियों से भी जुटाया जाता है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि NFHS की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह स्वास्थ्य परिणामों को सामाजिक-आर्थिक, भौगोलिक और जनसांख्यिकीय विशेषताओं से जोड़कर दिखाता है.
सरकारी अधिकारियों ने इन बदलावों का बचाव किया है. उनका कहना है कि इसका उद्देश्य डेटा संग्रह में दोहराव कम करना और विभिन्न प्रणालियों में तालमेल बैठाना है. उदाहरण के लिए मृत्यु दर से जुड़े इंडिकेटर को पहले से ही नमूना पंजीकरण सिस्टम यानी Sample Registration System (SRS) के जरिए ट्रैक किया जाता है. वहीं एनीमिया को भारत के विशेष Diet and Biomarkers Survey in India (DABS-I) सर्वेक्षण के माध्यम से मापा जाना प्रस्तावित है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों ने यह भी कहा है कि कुछ विशेषज्ञों ने NFHS के पिछले दौरों में एनीमिया का अनुमान लगाने की पद्धति पर सवाल उठाए थे. खासकर उंगली में सुई चुभाकर लिए गए रक्त नमूनों के उपयोग पर. उनका मानना था कि इससे एनीमिया की वास्तविक स्थिति से अधिक आंकड़ा सामने आ सकता है.
हालांकि आलोचकों का कहना है कि मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि यह डेटा कहीं और उपलब्ध है या नहीं. कई शोधकर्ताओं ने ध्यान दिलाया है कि NFHS जिला स्तर तक विस्तृत जानकारी देता है. यह नीति निर्माताओं को यह समझने में मदद करता है कि आय, शिक्षा, जाति, ग्रामीण-शहरी स्थिति और अन्य सामाजिक कारकों के आधार पर स्वास्थ्य परिणाम कैसे बदलते हैं. इस तरह के विस्तृत आपसी संबंधों का विश्लेषण अक्सर अलग-अलग सर्वेक्षणों में संभव नहीं होता.
विशेष रूप से दो प्रमुख सरकारी योजनाओं से जुड़े इंडिकेटर की अनुपस्थिति पर ध्यान दिया गया है. ये हैं स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन की उपलब्धता और स्वच्छता. NFHS-5 ने दिखाया था कि केवल 58.6 प्रतिशत परिवार ही स्वच्छ ईंधन का उपयोग कर रहे थे. वहीं स्वच्छता कवरेज में सुधार हुआ था लेकिन यह अभी भी सार्वभौमिक स्तर से काफी दूर था. विश्लेषकों का कहना है कि नए NFHS डेटा के बिना प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना और स्वच्छ भारत मिशन जैसी प्रमुख योजनाओं के दीर्घकालिक प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन करना अधिक कठिन हो जाएगा.
ये मिसिंग इंडिकेटर विस्तृत राष्ट्रीय रिपोर्ट में फिर से शामिल होंगे या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है. फिलहाल NFHS-6 एक विरोधाभास पेश करता है. एक ओर यह स्वास्थ्य और विकास के कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति के प्रमाण देता है. दूसरी ओर सर्वेक्षण को लेकर चर्चा उतनी ही उन आंकड़ों पर केंद्रित रही है जो जारी किए गए हैं, जितनी उन आंकड़ों पर जो जारी नहीं किए गए.