दलित Gen-Z छोड़ रही परंपरागत काम-धंधे, बढ़ रही नौकरी की चाह

'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ रिपोर्ट दलित-आदिवासियों की आजीविका से जुड़े रुझान और देश की डेमोग्राफी पर कई जानकारियां देती है

Manoj Kumar makes products from bamboo
सांकेतिक फोटो (AI)

दलित और आदिवासी समुदाय की नई पीढ़ी यानी Gen-Z अब अपने परंपरागत कामों को छोड़ रही है. समय के साथ जाति और लिंग आधारित पेशागत विभाजन (ऑक्यूपेशनल सेग्रिगेशन) कमजोर हुआ है. नई पीढ़ी के अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के श्रमिकों की अपने पारंपरिक जातिगत उद्योगों में काम करने की संभावना घट रही है. जो उद्योग पारंपरिक रूप से एससी-एसटी के प्रभुत्व वाले माने जाते थे, उनमें अब इन समुदायों के युवा श्रमिक कम जा रहे हैं.

उदाहरण के तौर पर, चमड़ा उद्योग में 1983 में एससी-एसटी समुदाय के 39 प्रतिशत युवा (20 से 29 साल) थे, जो अब घटकर 24 प्रतिशत रह गए हैं. इसी तरह खनन में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत से घटकर 23 प्रतिशत और लकड़ी के उत्पाद बनाने वाले उद्योगों में 29 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत रह गया है. यह जानकारी 17 मार्च को जारी 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026: यूथ इन लेबर मार्केट, पाथवेज फॉर लर्निंग टू अर्निंग' रिपोर्ट में दी गई है. इसे अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु ने केंद्र सरकार के आंकड़ों और अपने सर्वे के आधार पर तैयार किया है.

इसी रिपोर्ट के मुताबिक हाल के वर्षों में ग्रेजुएट बेरोजगारों की संख्या बढ़ी है, जिसका मुख्य कारण स्नातकों की बढ़ती तादाद है. उच्च बेरोजगारी दर के कारण ग्रेजुएट बेरोजगारों की संख्या में इजाफा हो रहा है. 2023 तक 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के 6.3 करोड़ स्नातकों में से लगभग 1.1 करोड़ बेरोजगार थे.

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर अमित बसोले बताते हैं, "एससी-एसटी युवाओं के परंपरागत काम छोड़ने की एक वजह यह भावना हो सकती है कि इन कामों को उनकी पहचान से जोड़ दिया गया है, जिसमें वे सम्मान की कमी महसूस करते हैं. इसके अलावा अर्थव्यवस्था में पैदा हो रहे नए अवसरों के कारण भी युवा अपना पेशा बदल रहे हैं." सैलरीड जॉब की मांग पर वे कहते हैं कि नियमित आय से सुरक्षा की भावना आती है. स्वरोजगार और बड़े कारोबारियों को छोड़ दें, तो केवल सैलरी वाली नौकरियों में ही यह सुरक्षा मिलती है.

2004 से 2023 के बीच हर साल लगभग 50 लाख युवा ग्रेजुएट हुए, जबकि इसी अवधि में रोजगार पाने वाले स्नातकों की संख्या प्रति वर्ष केवल 28 लाख ही बढ़ी. इस तरह रोजगार की वृद्धि स्नातकों की संख्या के अनुपात में नहीं रही है. अगर वेतनभोगी (सैलरीड) नौकरियों की बात करें, तो हर साल केवल 17 लाख स्नातकों को ही ऐसी नौकरी मिल पाती है. पर्याप्त अवसर न होने के कारण 'अधिक स्नातक, कम नौकरियां' की स्थिति बन गई है.

सुझाव के तौर पर प्रो. बसोले कहते हैं कि अगले 10-20 साल में शिक्षा और स्किलिंग का स्तर सुधारना होगा. नियमित आय वाली नौकरियां ज्यादा पैदा करनी होंगी. सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जिससे प्राइवेट सेक्टर में अधिक रोजगार सृजित हों. साथ ही छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना होगा ताकि हर स्तर और स्थान पर नौकरियां उपलब्ध हों.

सर्वे में कुछ रोचक जानकारियां भी मिली हैं. हरियाणा के युवा प्राइवेट सेक्टर (मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज) में काम कर रहे हैं, जबकि बिहार में सरकारी नौकरी की चाहत ज्यादा है क्योंकि वहां निजी क्षेत्र का विकास कम हुआ है. आंध्र प्रदेश में जिनके पास थोड़ी भी जमीन है, वे आईटी क्षेत्र की ओर रुख कर रहे हैं, जबकि भूमिहीन युवा निर्माण और श्रम प्रधान कार्यों में जा रहे हैं.

इसी रिपोर्ट से पता चलता है कि युवाओं की शिक्षा में हिस्सेदारी 2017 और 2024 में 34 प्रतिशत पर स्थिर रही, लेकिन रोजगार में उनकी भागीदारी बढ़ी है. महिलाओं की शिक्षा में गिरावट नहीं दिखी, पर उनके रोजगार में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. 15 से 24 वर्ष के युवाओं से जब पढ़ाई छोड़ने का कारण पूछा गया, तो अधिकांश ने परिवार के भरण-पोषण के लिए कमाई को मुख्य वजह बताया.

उच्च शिक्षा में पुरुषों और महिलाओं का सकल नामांकन (ग्रॉस एनरोलमेंट) अनुपात अन्य विकासशील देशों के समान है, जो एक सकारात्मक संकेत है. हालांकि, जाति-आधारित असमानताएं अब भी एक बाधा हैं. 2011 से 2023 के बीच अनुसूचित जातियों में नामांकन दर 11 से बढ़कर 26 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों में 8 से बढ़कर 21 प्रतिशत हुई है, फिर भी यह राष्ट्रीय औसत (28 प्रतिशत) से कम है.

देश में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या 1,644 से बढ़कर अब 69,534 हो गई है. 2000 से 2010 के बीच संस्थानों की संख्या में 150 प्रतिशत की रिकॉर्ड वृद्धि हुई. 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026' के अनुसार, इनमें से लगभग 80 प्रतिशत संस्थान निजी हैं. यह 1950 से 1980 के दशक की स्थिति से बिल्कुल अलग है, जब सरकारी और निजी संस्थानों की हिस्सेदारी लगभग बराबर थी.

व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में 2000 के बाद ITI (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान) की संख्या में भी 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. यह 2005 में 3,674 से बढ़कर 2025 में 14,582 हो गई है. उच्च शिक्षा की तरह यहां भी 80 प्रतिशत संस्थान निजी हैं. हालांकि संख्या तो बढ़ी है, लेकिन गुणवत्ता में गिरावट आई है. नामांकन, परिणाम और ट्रेड विविधता जैसे मानकों पर पिछले दशकों में ITI की रैंकिंग गिरी है. सरकारी संस्थानों की तुलना में निजी ITI का प्रदर्शन कमजोर पाया गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कामकाजी आबादी कुल जनसंख्या की 70 प्रतिशत है. आश्रितों के मुकाबले कामकाजी आबादी का अधिक होना 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' कहलाता है. भारत अब इसके आखिरी चरण में है. अनुमान है कि 2030 से आश्रित आबादी बढ़ने लगेगी और कामकाजी आबादी कम होगी. बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से युवाओं का अनुपात घटेगा. वर्तमान में कामकाजी आबादी में 15 से 29 साल के युवाओं का हिस्सा करीब 36.7 करोड़ है. अगर पढ़ाई कर रहे युवाओं को हटा दें, तो देश में 26.3 करोड़ कामकाजी युवा हैं.

कृषि क्षेत्र में युवाओं की हिस्सेदारी उम्रदराज श्रमिकों की तुलना में तेजी से गिरी है. हालांकि, 2017 के बाद कृषि में काम करने वाली महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, जबकि युवा पुरुषों की हिस्सेदारी 2017 से 2023 के बीच स्थिर बनी हुई है.

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