मोदी की कम खर्च की अपील के बाद जनता को अभी और झटके मिल सकते हैं!
तेल की कीमतों में इजाफे के बावजूद कंपनियों के नुकसान की भरपाई केवल आंशिक रूप से ही हो पाई है इसलिए पेट्रोल-डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी की आशंका है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से तेल की खपत कम करके विदेशी मुद्रा बचाने की अपील की. इसके कुछ ही दिनों बाद केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल के मूल्य में इजाफा करने का ऐलान कर दिया.
15 मई को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी गई. यह चार साल में पहली बढ़ोतरी थी. मुंबई और दिल्ली में CNG की कीमत में ₹2 प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी हुई और फिर 17 मई को दिल्ली में एक रुपए और बढ़ गई.
चुनाव खत्म होने के बाद पेट्रोल-डीजल महंगा होने की आशंका कई दिनों से जताई जा रही थी. वेस्ट एशिया में जारी जंग और होर्मुज की खाड़ी बंद होने के कारण भारत में तेल की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है. दुनिया का 20 फीसदी तेल इसी रास्ते से आता है.
यही वजह है कि इस क्षेत्र में जारी जंग के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें बहुत बढ़ गई हैं. 30 अप्रैल को क्रूड की कीमत $122 प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो 2022 के यूक्रेन युद्ध के बाद सबसे ज्यादा है. 16 मई को इसकी कीमत $109 प्रति बैरल रही.
भारत में कच्चे तेल की लैंडेड कीमत (किसी उत्पाद के शुरुआत से लेकर खरीदार तक पहुंचाने की पूरी यात्रा की कुल लागत) बहुत ज्यादा है. अभी यह करीब 114 डॉलर प्रति बैरल है. यह पिछले जुलाई के मुकाबले 60 फीसद से भी ज्यादा बढ़ गई है. केयरएज रेटिंग्स एजेंसी के मुताबिक, इस साल मध्य मार्च से मध्य अप्रैल तक भारतीय कच्चे तेल की लागत का औसत 131 डॉलर प्रति बैरल रहा, जबकि ब्रेंट क्रूड ऑयल का औसत 104 डॉलर प्रति बैरल था.
भारत अपनी जरूरत का करीब 89 फीसद कच्चा तेल विदेश से आयात करता है. ऐसे में ऊंची कीमतों के कारण देश का आयात बिल काफी बढ़ जाएगा. वित्त वर्ष 2026 (FY26) में भारत ने 24.53 करोड़ टन कच्चा तेल खरीदा जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 24.32 करोड़ टन था.
हालांकि, FY26 में देश का कुल नेट ऑयल और गैस आयात बिल 117.5 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल से 10 फीसद कम था. यह कमी कच्चे तेल की इंडियन ऑयल बास्केट (विदेशों से खरीदे जाने वाले कच्चे तेल की औसत कीमत) की कीमत कम होने की वजह से हुई. हालांकि, अब तेजी से बढ़ती तेल की कीमतें इस गणित को बदल देंगी. इस साल आयात बिल फिर बढ़ने वाला है.
इस मुसीबत में आयात बिल में और इजाफा होने के कारण, पिछले कुछ महीनों से रुपया लगातार कमजोर हो रहा है. वर्ष 2026 में अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले 6 फीसद से ज्यादा गिर चुका है. 14 मई को रुपया डॉलर के मुकाबले 95.86 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया.
इसमें ऊंची कच्चे तेल की कीमतें और पश्चिम एशिया का तनाव मुख्य वजह बने. सरकार के मुताबिक, प्रमुख तेल कंपनियां जैसे- इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के जरिए पेट्रोल, डीजल और LPG को बाजार मूल्य से कम दाम पर बेचा रहा है. इसके कारण ये कंपनियां तेल की कीमत बढ़ाने से पहले रोजाना करीब ₹1,000 करोड़ का नुकसान उठा रही हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ₹3 की बढ़ोतरी से इन कंपनियों को हर महीने अतिरिक्त ₹4,400 करोड़ से थोड़ा ज्यादा राजस्व मिलेगा. हालांकि, तीनों कंपनियों का मासिक नुकसान ₹30,000 करोड़ से ऊपर है, इसलिए यह बढ़ोतरी बहुत कम राहत है. इसी वजह से कई विशेषज्ञों का कहना है कि ईंधन की कीमतों में अभी और बढ़ोतरी होने की संभावना है.
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का नतीजा ऊंची महंगाई है. महंगाई पहले ही बढ़ना शुरू हो गई थी और पश्चिम एशिया युद्ध के कारण इस वित्त वर्ष में इसे 5 फीसद के आसपास रहने की उम्मीद है. अप्रैल 2026 में CPI महंगाई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) 3.48 फीसद रही थी.
अगर पश्चिम एशिया में तनाव लंबा चला तो आने वाले दिनों में यह और बढ़ जाएगी. इसी महीने WPI महंगाई (थोक मूल्य सूचकांक) 8.3 फीसद रही, जो पिछले 3.5 साल में सबसे ऊंची है. क्रिसिल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर सेहुल भट्ट ने कहा, “पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी का फैसला हाल के समय के सबसे लंबे नुकसान चक्र को कम करने की दिशा में एक सार्थक लेकिन आंशिक कदम है.”
क्रिसिल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर सेहुल भट्ट ने आगे कहा कि अभी कुछ दिनों पहले जब क्रूड की कीमच उच्च स्तर पर पहुंच गई थी, तब तेल कंपनियां (OMCs) पेट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर ₹23 से ₹30 तक का नुकसान सह रही थीं. पेट्रोल, डीजल और LPG को मिलाकर इससे रोजाना ₹1,300 से ₹1,400 करोड़ का संयुक्त नुकसान बनता था. सरकार ने ₹10 प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी छूट देकर दखल दिया. इससे पेट्रोल पर नुकसान घटकर ₹14 प्रति लीटर और डीजल पर ₹17 प्रति लीटर रह गया. इसके बाद दैनिक नुकसान की दर घटकर करीब ₹1,000 करोड़ प्रतिदिन रह गई.
भट्ट के मुताबिक, “तेल की कीमत में ₹3 की यह बढ़ोतरी और कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी नरमी आने से बचे हुए नुकसान घटकर पेट्रोल पर ₹10 प्रति लीटर और डीजल पर ₹13 प्रति लीटर रह गए हैं. इससे OMCs को कुछ हद तक ऑपरेशनल राहत मिली है.”
उन्होंने आगे कहा, "प्रारंभिक अनुमानों के मुताबिक, पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद अप्रैल तक तीनों ईंधनों (पेट्रोल, डीजल और LPG) पर कुल नुकसान ₹70,000 करोड़ तक पहुंच चुका था. मई के अंत तक यह नुकसान ₹1 लाख करोड़ को पार कर जाने की उम्मीद थी. इसके अलावा, रसोई गैस (LPG) पर होने वाले नुकसान जो तीनों में सबसे ज्यादा स्थाई और संरचनात्मक समस्या है, अभी भी पूरी तरह से अनसुलझे हैं."
भट्ट के मुताबिक हमें समझना होगा कि तेल की कीमतों में यह इजाफा बैलेंस-शीट पर बढ़ते तनाव को कम करने के लिए किया गया है, न कि कंपनियों के मार्केटिंग मार्जिन को बढ़ाने के लिए. इसे एक नीतिगत स्वीकारोक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए कि जो लागतें अब तक सहन की गईं, उन्हें अंत में कीमतों में दिखना ही चाहिए.
केयरएज रेटिंग्स की मुख्य अर्थशास्त्री राजनी सिन्हा ने कहा, “खुदरा ईंधन कीमतों में हालिया बढ़ोतरी से महंगाई दर पर 15 आधार अंक (15 bps) तक प्रभाव पड़ने की आशंका है.” इसके अलावा, परोक्ष रूप से भी महंगाई पर काफी दबाव पड़ेगा- खासकर बढ़ी हुई परिवहन लागत और लॉजिस्टिक्स खर्च, कृषि क्षेत्र में ऊंची इनपुट लागत और बढ़ती खाद्य महंगाई के जरिए.
इस अंतर ने तेल कंपनियों (OMCs) पर लागत का दबाव और बढ़ा दिया. भारतीय तेल बास्केट और ब्रेंट तेल की कीमतों के बीच का अंतर अब कम हुआ है, जिससे कुछ राहत मिलने की उम्मीद है. हालांकि, कीमतों के इस अंतर में कमी आने के बावजूद, खुदरा ईंधन कीमतों में आगे और बढ़ोतरी हो सकती है, खासकर अगर वैश्विक ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं.
कम ऊर्जा इस्तेमाल करने के प्रधानमंत्री की सलाह को कितना लागू किया जा सकेगा, यह अभी कह पाना मुश्किल है. पीएम की अपील में एक साल तक सोना न खरीदना, विदेश यात्रा और डेस्टिनेशन वेडिंग से बचना, जितना संभव हो घर से काम करने की सलाह दी गई है. इसके अलावा, उर्वरकों का उपयोग आधा करना, खाद्य तेल की खपत कम करना, कारपूलिंग, सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना और स्वदेशी उत्पादों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना भी शामिल है.