सत्ता के साथ साझेदारी
धनी भाजपा के साथ कारोबारी रिश्तों से फेसबुक को लगातार विज्ञापन राजस्व मिलते रहने की उम्मीद है. इससे उसकी योजनाओं को भी गति मिलेगी

भाजपा सरकार और विपक्षी दलों के बीच वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट को लेकर सियासी गतिरोध पैदा हो गया है. रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनी सत्ताधारी भाजपा का पक्ष ले रही थी. जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, फेसबुक के कुछ कर्मचारियों ने मार्च में तेलंगाना के भाजपा विधायक टी.राजा सिंह के कुछ पोस्ट को द्वेषपूर्ण भाषा संबंधी कंपनी के नियमों का गंभीर उल्लंघन मानते हुए फ्लैग (चेतावनी जारी) कर दिया था. लेकिन भारत में फेसबुक की दक्षिण और मध्य एशिया प्रभार की पॉलिसी निदेशक अंखी दास ने ''राजा सिंह पर द्वेषपूर्ण भाषा संबंधी नियम'' को लागू करने और ''हिंसा को बढ़ावा देने या उसमें भाग लेने वाले तीन अन्य हिंदू राष्ट्रवादी लोगों और समूहों को आंतरिक रूप से फ्लैग करने'' का विरोध किया.
लेख के मुताबिक, दास ने कर्मचारियों से कहा कि नियमों का उल्लंघन करने पर भाजपा नेताओं को दंडित करने से भारत में कंपनी के कारोबारी हितों को नुक्सान पहुंचेगा. फेसबुक के प्रवक्ता ऐंडी स्टोन ने माना कि दास ने सियासी दुष्परिणामों की चिंता जाहिर की थी, पर साथ में उन्होंने जोड़ा कि कोई कार्रवाई नहीं करने के कंपनी के फैसले के पीछे सिर्फ दास की मुखालफत ही एकमात्र वजह नहीं थी.
जर्नल के इस लेख ने भारी बहस छेड़ दी है. कांग्रेस ने फेसबुक की इस अनियमितता को लेकर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच की मांग कर दी है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा, ''भाजपा और आरएसएस भारत में फेसबुक तथा व्हाट्सऐप को नियंत्रित करते हैं. ये लोग इसके जरिए फेक न्यूज और नफरत फैलाते हैं तथा इसका इस्तेमाल वोटरों को फुसलाने के लिए करते हैं. हम पूर्वाग्रह, फेक न्यूज और नफरत भरी भाषा के जरिए अपने इस लोकतंत्र में किसी तरह की छेड़छाड़ की अनुमति नहीं दे सकते, जिसे बड़ी मुश्किल से हासिल किया जा सका है. फेसबुक की भागीदारी...पर हरभारतीय को सवाल उठाना चाहिए.'' कांग्रेस सांसद और सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) पर संसद की स्थायी समिति के चेयरमैन शशि थरूर ने कहा कि समिति इस पर फेसबुक से स्पष्टीकरण तलब करेगी. कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने यह भी संकेत दिया कि दास के भाजपा से सीधे संपर्क हैं और यह फेसबुक के भगवा पार्टी की ओर झुकाव की एक वजह है. श्रीनेत ने कहा, ''उनकी जुड़वां बहन रश्मि दास जेएनयू में आरएसएस से जुड़े एबीवीपी (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) के छात्र संघ की सिर्फ महासचिव ही नहीं थीं, बल्कि वे अब भी एबीवीपी की कार्यकर्ता हैं.'' रश्मि एबीवीपी के गैर-लाभकारी संगठन वर्ल्ड ऑर्गेनाइजेशन ऑफ स्टूडेंट्स ऐंड यूथ की पूर्व अध्यक्ष भी हैं.
भाजपा ने भी फौरन पलटवार किया. केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री प्रह्लाद जोशी ने जेपीसी जांच की बात खारिज की. भाजपा सांसद और आइटी संबंधी स्थायी समिति के सदस्य निशिकांत दूबे ने फेसबुक को तलब करने की थरूर की योजना की वैधानिकता पर सवाल खड़े किए. केंद्रीय सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर ही हमला बोला, ''कांग्रेस चुनाव से पहले डेटा को हथियार बनाने के मामले में कैंब्रिज एनालिटिका और फेसबुक के साथ गठजोड़ में रंगे हाथ पकड़ी गई है.'' ब्रिटिश डेटा विश्लेषक और राजनैतिक परामर्शदाता कंपनी कैंब्रिज एनालिटिका पर 2014 में कथित रूप से 5 करोड़ फेसबुक यूजर्स के डेटा चुराने का आरोप लगा था. एनालिटिका के पूर्व कर्मचारी क्रिस्टोफर वाइली ने 2018 में दावा किया था कि कांग्रेस भारत में इस फर्म की क्लाइंट थी.
इस विवाद के बाद, फेसबुक 17 अगस्त को एक बयान जारी करने के अलावा खामोश ही रहा. बयान में इसने कहा, ''हम घृणा फैलाने वाले भाषण और सामग्री, जिससे हिंसा भड़कती हो, पर रोक लगाते हैं और हम इन नीतियों को बगैर किसी कीराजनैतिक स्थिति या पार्टी से जुड़ाव के, विश्व स्तर पर लागू करते हैं. हालांकि, हमें पता है कि इस दिशा में और अधिक किए जाने की जरूरत है, हम इसके लागू किए जाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और अपनी सटीकता और निष्पक्षता की नियमित समीक्षा करते हैं.'' बहरहाल, भड़काऊ कंटेंट के खिलाफ फेसबुक की कार्रवाई की कोई स्वतंत्र समीक्षा नहीं की गई है.
फेसबुक पर अनियमितता के आरोप पहली बार नहीं लगे हैं. दुनियाभर में इसने खुद को सत्ताधारी व्यवस्था के पाले में खड़ा कर लिया है. मिसाल के तौर पर, सिंगापुर में इसने सरकार की ओर से झूठ मानी गई खबरों को 'करेक्शन नोटिस' भेजने की बात मान ली. इसी महीने के शुरू में खबर आई थी कि अमेरिका में फेसबुक के ग्लोबल पब्लिक पॉलिसी के वाइस प्रेसिडेंट जोएल कपलन ने अमेरिकी रूढि़वादी पृष्ठों के खिलाफ 'स्ट्राइक हटाने' के लिए हस्तक्षेप किया था. ब्राजील में भी इस पर ऐसे ही आरोप लगे थे. वहीं पिछले साल, टीएमसी सांसद, डेरेक ओ'ब्रायन ने संसद में यह दावा किया था कि फेसबुक का एल्गोरिद्म भाजपा-विरोधी खबरों को सेंसर कर रहा है और ''फेसबुक का दिल्ली दफ्तर मोटे तौर पर भाजपा के आइटी सेल का विस्तार भर है.''
2017 में मतदाता जागरूकता अभियान के लिए चुनाव आयोग का फेसबुक इंडिया के साथ गठजोड़ का फैसला भी अब संदेह के घेरे में है. एक साल बाद, 23 मार्च को, चुनाव आयोग ने घोषणा की थी कि डेटा की सुरक्षा के मद्देनजर उन्हें फेसबुक के साथ साझेदारी की समीक्षा करनी पड़ रही है, क्योंकि इसका प्रभाव स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव पर पड़ सकता है. बहरहाल, चार दिन बाद यह साझेदारी फिर से पटरी पर आ गई. इस बारे में कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया.
सत्तारूढ़ सियासी ताकतों के साथ फेसबुक का तालमेल वैचारिक की बजाए कारोबारी हितों से अधिक जुड़ा है. राजनैतिक दलों का सोशल मीडिया पर विज्ञापनों के लिए बढ़ता खर्च इन रिश्तों को अधिक लेन-देन भरा बना रहा है. मसलन, मार्केट रिसर्च कंपनी ईमार्केटर के मुताबिक, 2019-20 के अमेरिकी चुनाव प्रक्रिया में, फेसबुक ने कुल राजनैतिक विज्ञापन राजस्व का 59.4 फीसद झटक लिया है. राजनैतिक विज्ञापन के राजस्व के लिए अब भारत एक नई मंजिल के तौर पर उभरा है.
34 करोड़ फेसबुक यूजर्स और 40 करोड़ व्हाट्सऐप यूजर्स के साथ भारत फेसबुक का सबसे बड़ा बाजार है. भारत का डिजिटल परिदृश्य दिनो-दिन बड़ा होता जा रहा है—देश की इंटरनेट आबादी में 108 फीसद की वृद्धि हुई है, 2014 में जब भाजपा सत्ता में आई थी तब के 25 करोड़ के मुकाबले 2019 में यह 52 करोड़ हो गई. इस दौरान सोशल मीडिया के इस्तेमाल में 155 फीसद की बढ़ोतरी हुई है. अप्रैल में फेसबुक ने ऐलान किया था कि यह 38.8 करोड़ उपभोक्ताओं वाली भारत की दूरसंचार कंपनी रिलायंस जियो के करीब 10 फीसद शेयर 5.7 अरब डॉलर (करीब 43,000 करोड़ रुपए) में खरीदने वाली है. यह अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश है.
धनी भाजपा के साथ 'कामकाजी रिश्तों' से फेसबुक को लगातार विज्ञापन राजस्व मिलने की उक्वमीद है और इससे उसकी विकास योजनाओं को गति मिलेगी. फेसबुक की ऐड लाइब्रेरी रिपोर्ट के अनुसार, 2019 के आम चुनावों से पहले, फरवरी और मार्च में खर्च किए गए 10 करोड़ रु. के राजनैतिक विज्ञापनों में से 40 फीसद उसे भाजपा से मिले थे.
भाजपा फेसबुक कीसबसे बड़े क्लाइंट के रूप में उभरी है, पर अभी वह पूरी तरह संरक्षक की भूमिका में नहीं आई है. मिसाल के तौर पर, 2016 में सरकार ने नेट न्यूट्रलिटी कार्यकर्ताओं के हंगामे के बाद फेसबुक के 'फ्री बेसिक्स' प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था, जिसमें उसने मुक्रत, फेसबुक आधारित इंटरनेट सेवा देने की बात कही थी. व्हाट्सऐप डिजिटल भुगतान सेवा लॉन्च करने की कंपनी की योजना भी दो साल से अटकी हुई है.