मार्केटिंग के झांसे से बचिए, फूड लेबल्स को सही तरीके से पढ़िए
लेबल्स पढ़ने का असली मतलब दावों को फैक्ट्स के साथ मिलाना, अपनी हेल्थ की प्राथमिकताओं को समझना और सही फैसला लेना है

आज किसी भी फूड पैकेज को देखकर ऐसा लगता है जैसे जानकारी का ओवरलोड हो गया हो. AI पर चलने वाली डिजिटल फूड लेबलिंग कंपनी 'LabelBlind' की एक स्टडी के मुताबिक, औसतन हर प्रोडक्ट पर आठ से नौ दावे किए जाते हैं. वहीं, प्रोटीन पाउडर जैसी कैटेगरी में तो एक प्रोडक्ट पर औसतन 17 तक दावे हो सकते हैं.
मेवे, सीड्स, एनर्जी बार्स और ट्रेल मिक्स पर आमतौर पर करीब 12 दावे लिखे होते हैं. मार्केटिंग के इन दावों, न्यूट्रिशनल डेटा और हेल्थ मैसेजिंग के इस भारी शोर के बीच, 'LabelBlind' की फाउंडर और CEO रशीदा वापीवाला समझाती हैं कि कंज्यूमर्स को किसी प्रोडक्ट के पैकेज पर आखिर क्या देखना चाहिए, ताकि वे तय कर सकें कि वह उनकी डाइट और हेल्थ की जरूरतों के हिसाब से सही है या नहीं.
यह बात इसलिए भी और अहम हो जाती है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की बार-बार हिदायत के बावजूद, भारत में अभी तक 'फ्रंट-ऑफ-पैक' लेबलिंग को लेकर कोई पक्की गाइडलाइंस नहीं हैं. फूड रेगुलेटर FSSAI इसे लागू करने में लगातार देरी कर रहा है, जिससे कंज्यूमर्स को इन उलझे हुए लेबल्स को खुद ही समझना पड़ता है.
वापीवाला के मुताबिक, न्यूट्रिशन के कुछ 'थंब रूल्स' यानी सबसे सरल लेकिन बेहद जरूरी नियम होते हैं. पैकेटबंद खाना खरीदते समय कंज्यूमर्स को इन बेसिक बातों का ध्यान रखना चाहिए:
डेली डाइट में प्रोडक्ट का रोल समझें
कंज्यूमर्स को पैकेटबंद खाने पर लिखे दावों को पढ़ना चाहिए और ऐसे प्रोडक्ट्स चुनने चाहिए जो उनकी लाइफस्टाइल और खाने-पीने के तरीके में फिट बैठें. तेल, घी, शहद, चाय या आटा जैसी रोजमर्रा की चीजों के लिए 'फ्रंट-ऑफ-पैक' दावों को पढ़ना बहुत जरूरी हो जाता है क्योंकि ये चीजें रोज खाई जाती हैं. दूसरी तरफ, स्नैक्स, आइसक्रीम, चॉकलेट या डेसर्ट जैसी 'इंडलजेंट' चीजों को अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए.
स्वस्थ्य प्राथमिकताओं के हिसाब से लेबल्स पढ़ें: कंज्यूमर्स को अपनी सेहत के हिसाब से लेबल्स को अहमियत देनी चाहिए. मिसाल के तौर पर, अगर कोई अपना ब्लड शुगर कंट्रोल करना चाहता है, तो वह "लो शुगर" या "नो रिफाइंड शुगर" वाले प्रोडक्ट्स की तरफ जाएगा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप सोडियम, फैट या एडिटिव्स जैसी बाकी चीजों को नजरअंदाज कर दें. किसी भी एक दावे पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए. जब कोई प्रोडक्ट कहता है "नो एडेड शुगर", तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसमें कैलोरी कम है या वह न्यूट्रिशन के मामले में एकदम बैलेंस है.
कंज्यूमर्स को यह चेक करना चाहिए कि चीनी की जगह कौन से इंग्रीडिएंट्स डाले गए हैं, उसमें कितने एडिटिव्स हैं और कहीं दूसरे न्यूट्रिएंट्स बहुत ज्यादा तो नहीं हैं. इसी तरह, एलर्जी वाले लोग अक्सर ग्लूटेन-फ्री या लैक्टोज-फ्री प्रोडक्ट्स चुनते हैं, लेकिन अनजाने में वे ऐसी चीजें खा लेते हैं जिनमें शुगर या फैट बहुत ज्यादा होता है. इसलिए, लेबल्स पढ़ने का मतलब सिर्फ एक हेल्थ दावे के पीछे भागना नहीं, बल्कि एक बैलेंस खोजना है.
सिर्फ हाइलाइट्स नहीं, पूरा लेबल चेक करें
कंज्यूमर्स को लेबल को पूरी तरह से देखना चाहिए, खासकर उन खास न्यूट्रिएंट्स को जो हेल्थ पर सबसे ज्यादा असर डालते हैं, जैसे सैचुरेटेड फैट, एडेड शुगर, सोडियम और टोटल कैलोरी. 'फ्रंट-ऑफ-पैक' जानकारी से फैसला लेने में मदद मिलनी चाहिए, लेकिन आखिरी चॉइस सभी बड़े न्यूट्रिशनल इंडिकेटर्स को एक साथ देखने के बाद ही की जानी चाहिए. एक समझदारी भरा फैसला लेने के लिए यह समझना जरूरी है कि प्रोडक्ट आपकी पूरी डाइट में कैसे फिट बैठता है, न कि सिर्फ किसी एक पैमाने पर फोकस करना.
हेल्थ दावों को सौ फीसदी गारंटी न मानें
'फ्रंट-ऑफ-पैक' दावे अक्सर प्रोडक्ट्स की एक अच्छी लेकिन झूठी इमेज बना देते हैं. वापीवाला इस बात पर जोर देती हैं कि खरीदारी करने से पहले लेबल्स को पढ़ने, समझने और उनका सही मतलब निकालने की जिम्मेदारी कंज्यूमर्स की ही है. दावों का असली इन्ग्रेडिएंट्स के साथ मेल खाना जरूरी है. उदाहरण के लिए, अगर कोई प्रोडक्ट कुछ न मिलाने का दावा करता है, तो कंज्यूमर्स को इन्ग्रेडिएंट्स लिस्ट पढ़कर इसे वेरिफाई करना चाहिए. लिस्ट में लिखी पहली तीन-चार चीजें बहुत अहम होती हैं क्योंकि प्रोडक्ट में सबसे ज्यादा हिस्सा उन्हीं का होता है.
न्यूट्रिशन के दावों को असली वैल्यू से क्रॉस-चेक करें
इन्ग्रेडिएंट्स चेक करने के बाद, कंज्यूमर्स को 'न्यूट्रिशनल इंफॉर्मेशन पैनल' देखना चाहिए. अगर कोई प्रोडक्ट हाई प्रोटीन, फाइबर या विटामिन्स का दावा करता है, तो न्यूट्रिशन बॉक्स में यह दिखना चाहिए, और आदर्श रूप से इसमें 'रिकमेंडेड डाइटरी अलाउंस' (RDA) का एक अच्छा-खासा प्रतिशत दिखना चाहिए. विरोधाभासों को चेक करना भी बहुत जरूरी है. हो सकता है कि कोई प्रोडक्ट "लो शुगर" होने का दावा करे, लेकिन उसमें सैचुरेटेड फैट या सोडियम बहुत ज्यादा हो. ऐसी गड़बड़ियों के लिए बहुत सावधानी से जांच करने और सोच-समझकर फैसला लेने की जरूरत होती है.
बेसिक न्यूट्रिशन का गणित समझें
वापीवाला 'एटवॉटर के 4-4-9 सिद्धांत' को एक बहुत काम की गाइडलाइन मानती हैं. हर एक ग्राम कार्बोहाइड्रेट से 4 कैलोरी मिलती है, हर एक ग्राम प्रोटीन से 4 कैलोरी मिलती है और हर एक ग्राम फैट से 9 कैलोरी मिलती है. यह बेसिक फॉर्मूला कंज्यूमर्स को यह समझने में मदद करता है कि लेबल पर लिखे कैलोरी के नंबर सही बैठते हैं या नहीं. 'सर्विंग साइज' एक और बड़ा फैक्टर है. कंज्यूमर्स को यह चेक करना चाहिए कि एक सर्विंग में कितनी मात्रा आती है और फिर यह कैलकुलेट करना चाहिए कि उस हिस्से से उनकी दिन भर की कैलोरी, शुगर, फैट, सोडियम या बाकी न्यूट्रिएंट्स की कितनी जरूरत पूरी हो रही है.
वापीवाला कहती हैं कि ये 'थंब रूल्स' स्मार्ट तरीके से खाना चुनने की बुनियाद बनाते हैं. कुल मिलाकर, लेबल्स पढ़ने का मतलब मार्केटिंग की भाषा के झांसे में आने के बजाय, दावों को फैक्ट्स के साथ मिलाना, अपनी खुद की स्वास्थ्य प्राथमिकताओं को समझना और सोच-समझकर फैसला लेना है.