वे पांच घटनाएं जो अगर ना होतीं तो मायावती जैसी हैं, वैसी न होतीं
आज 70 साल की हो रहीं मायावती पहली बार BSP के संस्थापक कांशीराम की नजर में कांस्टिट्यूशन क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में अपने एक भाषण के जरिए आईं और यह 1977 की बात है

नई दिल्ली के लेडी हार्डिंग अस्पताल में 15 जनवरी, 1956 को पैदा हुईं मायावती आज 70 साल की हो गईं. दिल्ली के ही इंद्रपुरी की झुग्गियों में रहने वाले प्रभुदास दयाल और रामरती देवी के परिवार में पैदा हुईं मायावती ने जो हासिल किया है, वह निश्चित तौर पर एक मिसाल है.
आज अपने 70वें जन्मदिन पर मायावती 2027 के विधानसभा चुनाव से तकरीबन साल भर की दूरी पर खड़ी हैं. अपनी 70 सालों की इस जीवन यात्रा में वे चार बार देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं. लेकिन 2014 का लोकसभा चुनाव ऐसा रहा जिसमें उनकी बहुजन समाज पार्टी (BSP) का खाता तक नहीं खुल पाया.
हालांकि, 2019 में वे समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में 10 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रहीं. लेकिन 2024 के चुनावों में फिर एक बार उनकी पार्टी ने 'एकला चलो रे' की रणनीति अपनाई और फिर एक बार मायावती की पार्टी एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हो पाई.
अब उनकी नजर 2027 के विधानसभा चुनाव पर है जो उनके लिए बेहद निर्णायक होने जा रहा है. राजनीतिक गलियारों में कयासबाजी है कि इस चुनाव के लिए मायावती एक बार फिर गठबंधन की राह पकड़ सकती हैं. ऐसे में मायावती के 70वें जन्मदिन पर उन घटनाओं पर नजर डालना प्रासंगिक है, जो न सिर्फ मायावती की जीवन यात्रा की झलक देती हैं, बल्कि यह भी बताती हैं कि अगर वे घटनाएं न होतीं तो आज मायावती जैसी हैं, वैसी न होतीं.
कांस्टिट्यूशन क्लब का भाषण
मायावती पहली बार बड़े नेताओं या यों कहें कि BSP के संस्थापक कांशीराम की नजर में कांस्टिट्यूशन क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में अपने एक भाषण के जरिए आईं. 1977 के सितंबर में उस वक्त की सत्ताधारी पार्टी जनता पार्टी ने जात-पात से लड़ने के रास्तों को लेकर एक आयोजन किया. इसमें मुख्य वक्ताओं में पार्टी के बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री राजनारायण शामिल थे. राजनारायण 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी को हराकर हीरो बन गए थे. अपने भाषण में उन्होंने दलितों को बार-बार 'हरिजन' कहकर संबोधित किया. श्रोताओं में बैठी मायावती को यह बात ठीक नहीं लगी.
जब कार्यक्रम के आखिरी क्षणों में मायावती को बोलने का मौका मिला तो उन्होंने न सिर्फ राजनारायण और उनकी पार्टी बल्कि मुख्यधारा की सभी पार्टियों पर सीधा हमला बोला. उन्होंने कहा कि हरिजन शब्द का इस्तेमाल करके ये सभी लोग दलितों को अपमानित करते हैं. मायावती ने बताया कि बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान में हरिजन शब्द का नहीं बल्कि दलितों के लिए अनुसूचित जाति का इस्तेमाल किया है. मायावती के आक्रामक और तर्कपूर्ण भाषण का नतीजा यह हुआ कि जनता पार्टी के कार्यक्रम में ही पार्टी और राजनारायण के खिलाफ नारे लगने लगे.
इसी कार्यक्रम के बाद कांशीराम को मायावती के बारे में बताया गया. कांशीराम उन दिनों बामसेफ चलाते थे. कांशीराम को जिन लोगों ने मायावती के बारे में बताया उसका असर यह हुआ कि वे रात में ही इंद्रपुरी की झुग्गियों में उनसे मिलने चले गए. मायावती का जन्म 1956 में इन्हीं झुग्गियों में हुआ था. कांशीराम जब उनके यहां पहुंचे तब मायावती का परिवार रात का खाना खाकर सोने की तैयारी में था. अचानक किसी ने दरवाजा खटखटाया. मायावती के पिता ने दरवाजा खोला तो सामने कांशीराम थे. कांशीराम और मायावती की इस एक घंटे की मुलाकात ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी. भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने का मायावती का सपना जिस गति से पीछे छूटता गया, उससे कई गुना अधिक गति से वे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में लगातार आगे बढ़ती गईं.
पिता का घर छोड़ना
सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अपनी बेटी की बढ़ती सक्रियता से उनके पिता प्रभुदास खिन्न रहते थे. उनके लाख समझाने के बावजूद मायावती प्रशासनिक सेवा की तैयारी में वक्त नहीं दे पा रही थीं. उन्हें लगता था कि कांशीराम ने ही उनकी बेटी को रास्ते से भटका दिया है. प्रभुदयाल सभी समस्याओं की जड़ कांशीराम को मानते थे. उन्हें लगता था कि अगर उनकी बेटी कांशीराम से मिलना बंद कर दे तो वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे पाएगी. इसलिए उन्होंने मायावती के सामने एक दिन फरमान जारी कर दिया कि अगर उनके घर में रहना है तो कांशीराम से मिलना-जुलना बंद करना होगा.
प्रभुदास को लग रहा होगा कि अकेली लड़की भला कहां जाएगी. लेकिन मायावती ने अपने कुछ कपड़ों और स्कूल शिक्षक की नौकरी से बचाए कुछ पैसों को लेकर उस घर को छोड़ दिया जिसमें उन्होंने उस वक्त तक का जीवन गुजारा था. यहां से सीधे मायावती बामसेफ के कारोलबाग कार्यालय में पहुंचीं. उस वक्त कांशीराम कहीं बाहर थे. जब वे वापस लौटे तो मायावती ने उन्हें अपने निर्णय के बारे में बताया. कांशीराम ने बामसेफ कार्यालय के पास ही खुद रहने के लिए एक कमरे का किराए का मकान ले रखा था. उन्होंने मायावती को इसमें रहने का प्रस्ताव दिया. जिसे उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया.
इस घटना से जहां एक तरफ कांशीराम मायावती की प्रतिबद्धता को लेकर निश्चिंत हो गए, वहीं मायावती कांशीराम के बेहद नजदीक होती चली गईं. मायावती का अचानक कांशीराम के इतना नजदीक हो जाने से उस वक्त बामसेफ में काम कर रहे कई बड़ नेता असहज भी हुए और कुछ को बाहर का रास्ता भी देखना पड़ा लेकिन मायावती तेजी से राजनीति की सीढ़ियां पर आगे बढ़ने लगीं.
डीएस-4
डीएस-4 का मतलब है दलित शोषित समाज संघर्ष समिति. इस मंच की घोषणा कांशीराम ने 1981 में की थी. इसका मुख्य नारा था: ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस-फोर. यह एक राजनीतिक मंच नहीं था लेकिन इसके जरिए कांशीराम दलितों को बल्कि अल्पसंख्यकों के बीच भी एक तरह की गोलबंदी करना चाह रहे थे.
डीएस-4 के तहत कांशीराम ने सघन जनसंपर्क अभियान चलाया. उन्होंने एक साइकिल मार्च निकाला, जिसने सात राज्यों में तकरीबन 3,000 किलोमीटर की यात्रा की. अगड़ी जातियों के खिलाफ काफी तीखे नारों के जरिए जो जनसंपर्क अभियान कांशीराम चला रहे थे, उससे वह वर्ग उनके पीछे गोलबंद होने लगा जिसे साथ लाने के लिए कांशीराम ने डीएस-4 बनाया था.
इसी सामाजिक पूंजी से उत्साहित होकर कांशीराम ने 14 अप्रैल, 1984 को BSP की स्थापना की. BSP ने सियासत में जो भी हासिल किया, उसमें उस मजबूत बुनियाद की सबसे अहम भूमिका रही जिसे कांशीराम ने डीएस-4 के जरिए रखा था. भले ही BSP की स्थापना को तब मीडिया ने कोई तवज्जो नहीं दी हो लेकिन उसी वक्त यह साफ हो गया कि इस संगठन के शीर्ष पर कांशीराम और मायावती ही हैं.
गेस्ट हाउस कांड
1 जून, 1995 को कांशीराम के निर्देश पर मायावती ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल मोतीलाल वोरा से मिलकर मुलायम सिंह यादव की अगुवाई वाली सपा-BSP गठबंधन सरकार से समर्थन वापसी की जानकारी दी और नई सरकार के गठन के लिए दावा पेश किया. इसके बाद 2 जून को मायावती ने अपनी पार्टी के विधायकों की बैठक राज्य अतिथिगृह में बुलाई. बैठक के बाद मायावती अपने कुछ विश्वस्त लोगों के साथ अपने कमरे में आगे की रणनीति पर चर्चा करने चली गईं. बाकी विधायक बाहर कॉमन हॉल में ही रहे.
तकरीबन चार बजे होंगे. अचानक गेस्ट हाउस पर तकरीबन 200 लोगों की भीड़ ने हमला कर दिया. बाद में मालूम चला कि इस भीड़ में न सिर्फ सपा कार्यकर्ता शामिल थे बल्कि सपा के कई विधायक भी थे. इस भीड़ ने न सिर्फ BSP नेताओं को जातिसूचक भद्दी गालियां दीं बल्कि उनके साथ मारपीट भी की. पांच BSP विधायकों को एक गाड़ी में भरकर मुख्यमंत्री आवास ले जाया गया. वहां उन्हें धमकाया गया और सपा में शामिल होने के लिए उनसे सादे कागज पर दस्तखत लिए गए.
तब इस उन्मादी भीड़ में शामिल कई लोग मायावती के कमरे के बेहद करीब पहुंच गई. ये लोग दरवाजा तोड़ने की कोशिश करने लगे. मायावती को भद्दी गालियां दी गईं. दावा किया जाता है कि ये लोग उस दिन BSP नेता के साथ कुछ भी करने की तैयारी में थे. बड़ी विडंबना थी कि वहां मौजूद कई पुलिसकर्मी इस मौके पर अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट गए लेकिन दो पुलिसकर्मियों के साहस की वजह से मायावती बच गईं. बाद में जिलाधिकारी के दखल से भीड़ को गेस्ट हाउस से हटाया जा सका.
इस घटना ने मायावती को अंदर तक हिला दिया. असुरक्षा की जिस चादर में आज भी मायावती लिपटी दिखती हैं, उसके लिए अगर सबसे अधिक कोई घटना जिम्मेदार है तो वह है गेस्ट हाउस कांड. इस घटना के बाद से लेकर मायावती अपने कुछ विश्वस्तों के बेहद सीमित दायरे में सिमटी दिखती हैं. वे उतना खुलकर सामने नहीं आतीं, जितना वे इस घटना से पहले आती थीं.
जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं
वैसे तो सत्ता का स्वाद मायावती ने उसी दौर में बगैर मंत्री बने चखना शुरू कर दिया था जब उत्तर प्रदेश में सपा-BSP की गठबंधन सरकार बनी. इस सरकार में मायावती मंत्री नहीं थीं. लेकिन उन्हें कांशीराम ने BSP की ओर से सरकार के साथ समन्वय की जिम्मेदारी दी थी और खुद को उत्तर प्रदेश की राजनीति से दूर कर लिया था. मतलब यह हुआ कि सरकार जिस पार्टी के समर्थन से चल रही थी, उसकी सबसे ताकतवर नेता के तौर पर मायावती स्थापित हो गईं. इस दौर में वे जो चाहती थीं, उनमें से ज्यादातर काम सरकार से करवा लेती थीं. मायावती से समन्वय का काम खुद मुलायम नहीं करते थे बल्कि उनके प्रधान सचिव पीएल पुनिया यह काम देखते थे.
लेकिन मायावती जब 3 जून, 1995 को पहली बार देश के सबसे बड़े सूबे की मुख्यमंत्री बनीं तो यहां से उनकी राजनीति ने एक नया मोड़ लिया. दलितों पर प्रदेश में हो रहे लगातार हमलों से जहां BSP परेशान थी तो मुलायम के उभार से BJP, कांग्रेस और जनता दल परेशान थे. सब चाहते थे कि मुलायम की सरकार गिर जाए और कांशीराम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन जाएं. लेकिन कांशीराम की बीमारी ने यह अवसर मायावती को दे दिया.
कांशीराम के बेहद करीब रहे एक पत्रकार बताते हैं कि BJP का समर्थन हासिल करने की पहल कांशीराम ने ही की थी. उनके कहने पर ही अटल बिहारी वाजपेयी से इस बारे में बातचीत की गई थी. वाजपेयी इस प्रस्ताव पर तैयार हो गए. अपनी इस योजना की जानकारी कांशीराम ने मायावती को नहीं दी थी. कांशीराम को लग गया था कि बीमारी की वजह से वे मुख्यमंत्री का दायित्व नहीं संभाल पाएंगे. अस्पताल के बिस्तर पर लेटे-लेटे ही एक दिन कांशीराम ने मायावती से पूछा कि क्या तुम उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनना चाहोगी? मायावती को लगा कि बीमार कांशीराम उनसे मजाक कर रहे हैं.
फिर कांशीराम ने उन्हें दूसरे दलों के समर्थन के पत्र दिखाए और कहा कि तुम लखनऊ जाकर ये दस्तावेज राज्यपाल को सौंपना. कांशीराम ने मायावती को कहा कि राज्यपाल तुम्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाएंगे और 15 दिनों में विधानसभा में बहुमत साबित करना होगा. मायावती ने यह काम 1 जून, 1995 को उत्तर प्रदेश के उस वक्त के राज्यपाल मोतीलाल वोरा से मिलकर किया. 2 जून को गेस्ट हाउस कांड हो गया लेकिन यह कांड भी मायावती को 3 जून को मुख्यमंत्री बनने से नहीं रोक पाया.
गेस्ट हाउस कांड की वजह से उन्हें सपा को छोड़कर सभी दलों का खुला समर्थन मिल गया. विश्वासमत साबित करना भी बेहद नाटकीय रहा. लेकिन यहां भी बाजी मायावती के हाथ ही लगी और इसके बाद मायावती ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा.