ओवरलोडेड ट्रकों ने कैसे लगा दी टोल प्लाजा के सिस्टम में सेंध!

टोल प्लाजाओं पर फर्जी नंबरों से ओवरलोड ट्रकों को पास कराने का खेल उजागर, कैश लेन और मिलीभगत से सरकार को करोड़ों रुपए का नुकसान

सांकेतिक फोटो

अप्रैल की तीन तारीख. तड़के सुबह, कानपुर-लखनऊ हाईवे पर दरोगाखेड़ा के पास चल रही एक सामान्य चेकिंग ने ऐसा राज खोला, जिसने यूपी के टोल प्लाजा सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए. सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी (प्रवर्तन) आलोक कुमार यादव की टीम ने जब एक ट्रक को रोका, तो सब कुछ सामान्य लग रहा था. ट्रक का नंबर था UP32ZN8925 और चालक ने कागज भी पूरे दिखाए. 

लेकिन जैसे ही टोल पर्ची देखी गई, कहानी पलट गई. पर्ची पर दर्ज वाहन संख्या थी MA34S9455. यह नंबर न किसी राज्य कोड से मेल खाता था और न ही किसी सरकारी डेटाबेस में मौजूद था. ऑनलाइन जांच में जब इस नंबर का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला, तो अधिकारियों को साफ हो गया कि मामला महज एक गलती नहीं, बल्कि बड़े फर्जीवाड़े का हिस्सा है. 

चालक ने 30 मार्च की एक और टोल पर्ची दिखाई, जिसमें भी यही फर्जी नंबर दर्ज था. जांच में ट्रक ओवरलोड पाया गया और उस पर 1,08,600 रुपए का चालान किया गया, लेकिन इस एक कार्रवाई ने उस पूरे नेटवर्क का दरवाजा खोल दिया, जो लंबे समय से टोल प्लाजाओं पर सक्रिय था.

इस घटना के बाद जब परिवहन विभाग ने लखनऊ के सीतापुर रोड स्थ‍ित इटौंजा टोल प्लाजा का डेटा खंगाला, तो जो तस्वीर सामने आई, वह और भी चौंकाने वाली थी. जनवरी महीने में करीब 1600 ओवरलोड वाहन इस टोल प्लाजा से गुजरे थे, जिनमें से लगभग 900 वाहनों के टोल ऐसे नंबरों पर काटे गए थे, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं था. फरवरी के आंकड़ों में भी यही पैटर्न जारी रहा और शुरुआती जांच में 200 से अधिक फर्जी नंबर सामने आ चुके हैं. यह स्पष्ट संकेत था कि यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और संगठित रैकेट है, जो नियमों को धता बताते हुए सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठा रहा है.

कैसे चलता है फर्जी नंबरों का रैकेट 

जांच में सामने आया कि यह पूरा खेल बेहद सरल लेकिन प्रभावी तरीके से खेला जा रहा है. ओवरलोड ट्रक चालक जानबूझकर FASTag का इस्तेमाल नहीं करते और टोल प्लाजा पर कैश लेन का सहारा लेते हैं. टोल प्लाजा पर पहुंचने के बाद वे टोलकर्मी को कोई भी मनगढ़ंत वाहन नंबर बता देते हैं और उसी नंबर पर पर्ची काट दी जाती है. परिवहन विभाग के अधिकारी बताते हैं कि चूंकि कैश ट्रांजैक्शन में तत्काल वेरिफिकेशन की कोई सख्त व्यवस्था नहीं है, इसलिए यह फर्जी नंबर सिस्टम में दर्ज हो जाता है और वाहन बिना किसी डर के आगे बढ़ जाता है. इसके बदले चालक 500 से 700 रुपए तक अतिरिक्त भुगतान करता है, जबकि ओवरलोडिंग के मामले में उस पर 20,000 रुपए या उससे अधिक का जुर्माना लग सकता है. यानी मामूली रकम देकर भारी जुर्माने से बच निकलने का यह आसान रास्ता बन चुका है. 

‘MA सीरीज़’ और ओवरलोडिंग का खेल

इस फर्जीवाड़े का सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाला पहलू ‘MA सीरीज़' के नंबरों का बार-बार सामने आना है. भारत में किसी भी राज्य का कोड ‘MA’ नहीं है, इसके बावजूद सैकड़ों टोल रसीदों में इसी सीरीज़ के नंबर दर्ज पाए गए. इतना ही नहीं, कई नंबर तो ऐसे थे जो किसी भी मानक वाहन नंबर प्लेट के फॉर्मेट से मेल ही नहीं खाते. जैसे MB1AUGCC4BRGL006, CLMM101469 या 1C63588694 जैसे नंबरों पर भी टोल पर्चियां काटी गईं. 

यह फर्जीवाड़ा केवल ड्राइवर की चालाकी नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर मौजूद लापरवाही या मिलीभगत का परिणाम है. दरअसल, इस पूरे खेल की जड़ ओवरलोडिंग है. यूपी में रेत, गिट्टी और मोरंग ढोने वाले ट्रकों की बड़ी संख्या तय सीमा से कई टन अधिक वजन लेकर चलती है. कुछ मामलों में यह अतिरिक्त वजन 10 टन तक पाया गया है. 

ओवरलोडिंग से जहां सड़कों को भारी नुकसान होता है, वहीं दुर्घटनाओं का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है. सरकार ने इस पर सख्ती के निर्देश दिए हैं, लेकिन यही सख्ती अब इस तरह के फर्जीवाड़े को जन्म दे रही है, जहां नियमों से बचने के लिए नए रास्ते खोज लिए गए हैं.

अधिकारियों की नजर में ‘संगठित रैकेट’

आरटीओ (प्रवर्तन) प्रभात पांडे के मुताबिक, “यह एक संगठित रैकेट लगता है. बड़ी संख्या में ओवरलोडेड ट्रकों को फर्जी नंबरों के जरिए टोल पार कराया गया है, जिससे सरकार को भारी राजस्व नुकसान हुआ है.” उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर ऐसे फर्जी नंबरों वाले वाहन किसी हादसे में शामिल होते हैं, तो उनकी पहचान तक संभव नहीं होगी, जो सार्वजनिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है. वहीं, सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी आलोक कुमार यादव का कहना है कि बिना टोल कर्मचारियों की मिलीभगत के इस तरह का खेल संभव ही नहीं है. उनके अनुसार, “जब शासन ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि ओवरलोड वाहनों का डेटा साझा किया जाए, तब भी इस तरह की गड़बड़ी सामने आना यह दिखाता है कि कहीं न कहीं सिस्टम के भीतर ही समस्या है.” 

इस पूरे मामले पर NHAI ने अपनी भूमिका सीमित बताते हुए कहा है कि टोल प्लाजा पर टोल वसूली का प्राथमिक माध्यम FASTag है और अगर कहीं कैश में गड़बड़ी हो रही है, तो उसकी जांच परिवहन विभाग का विषय है. NHAI के परियोजना निदेशक नकुल प्रकाश वर्मा ने कहा, “टोल प्लाजा पर टोल FASTag से कटता है. अगर कहीं कैश में गड़बड़ी हो रही है, तो यह जांच का विषय है और इसे परिवहन विभाग देख रहा है.” लेकिन यह तर्क भी कई सवाल खड़े करता है. जब FASTag को अनिवार्य किया जा चुका है, तो इतनी बड़ी संख्या में कैश ट्रांजैक्शन कैसे हो रहे हैं और उन पर निगरानी क्यों नहीं है?

सरकारी खजाने को चपत

राजस्व के लिहाज से देखें तो यह फर्जीवाड़ा सरकार के लिए भारी नुकसान का कारण बन रहा है. सिर्फ जनवरी के 900 फर्जी मामलों को आधार मानें, तो अनुमानित नुकसान कम से कम 1.8 करोड़ रुपए बैठता है, और इसमें अतिरिक्त भार का शुल्क शामिल नहीं है. मामले में सरोजनी नगर थाने में एफआईआर दर्ज की गई है और ट्रक ड्राइवर मनीष के साथ एक अज्ञात टोल कर्मचारी को आरोपी बनाया गया है.

पुलिस अब सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है और पिछले महीनों के रिकॉर्ड की जांच कर रही है. उम्मीद है कि इस जांच में और बड़े खुलासे हो सकते हैं और इस रैकेट के पीछे के असली चेहरे सामने आ सकते हैं. टोल प्लाजाओं पर सामने आया फर्जीवाड़ा सिर्फ लखनऊ या किसी एक हाईवे तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसकी जड़ें पूरे प्रदेश में फैली होने की आशंका है. जिस तरह सरोजनीनगर और इटौंजा टोल प्लाजा के आंकड़ों में बड़ी संख्या में फर्जी नंबरों पर ओवरलोड ट्रकों को पास किया गया, वह संकेत देता है कि यह एक व्यवस्थित पैटर्न है, जिसे अन्य टोल प्लाजाओं पर भी दोहराया जा रहा होगा. खासतौर पर उन मार्गों पर, जहां रेत, गिट्टी और खनन से जुड़े ट्रकों की आवाजाही ज्यादा है, वहां इस तरह की मिलीभगत की संभावना और बढ़ जाती है. 

सरकारी खजाने के नुकसान का आकलन करें तो तस्वीर और गंभीर हो जाती है. एक ओवरलोड ट्रक पर औसतन 20 हजार रुपए या उससे अधिक का जुर्माना बनता है. अगर सिर्फ एक टोल प्लाजा पर एक महीने में 800-900 मामलों में फर्जीवाड़ा सामने आता है, तो यह नुकसान करीब 1.5 से 2 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है. ऐसे में अगर पूरे प्रदेश के सौ के करीब प्लाजाओं को जोड़कर देखा जाए, तो यह आंकड़ा हर महीने 100 करोड रुपए और सालाना 1000 करोड़ रुपए से अधि‍क का राजस्व नुकसान सरकार को हो रहा है. यह न सिर्फ सरकारी खजाने पर सीधी चोट है, बल्कि नियमों की प्रभावशीलता पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है.

सिस्टम में कहां है कमी 

यह पूरा मामला सिर्फ एक फर्जी नंबर या एक टोल प्लाजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की खामियों को उजागर करता है, जो तकनीक के होते हुए भी उसे सही तरीके से लागू नहीं कर पा रहा. लखनऊ के ट्रक आपरेटर दीपेंद्र दुबे बताते हैं, “कैश ट्रांजैक्शन की गुंजाइश, वेरिफिकेशन की कमी और जवाबदेही का अभाव- ये तीनों मिलकर इस तरह के फर्जीवाड़े को बढ़ावा दे रहे हैं.” परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक टोल प्लाजाओं पर पूरी तरह डिजिटल निगरानी लागू नहीं होगी और कैश लेन को खत्म नहीं किया जाएगा, तब तक इस तरह की गड़बड़ियों पर रोक लगाना मुश्किल होगा. 

हालांकि राज्य के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने इस फर्जीवाड़े की तह तक जाने के लिए अधिकारियों की एक टीम बना दी है. टोल पार करने वाले हरेक ट्रक की जांच करने के निर्देश दिए गए हैं. 

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