ट्रंप टैरिफ : भारत के लिए यह कारोबारी झटका कैसे बन सकता है एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट ?
अगस्त की 27 तारीख को अमेरिका की तरफ से भारतीय सामानों पर 50 फीसदी टैरिफ लागू होने के पहले ही इसका असर दिखना शुरू हो चुका था, हालांकि भारत ने भी इससे निपटने की तैयारियां शुरू कर दी हैं

वॉशिंगटन से उठी हलचल दिल्ली तक महसूस हुई जब 27 अगस्त से अमेरिका का नया टैरिफ भारतीय निर्यातकों पर लागू हो गया. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का 6 अगस्त का एग्जीक्यूटिव ऑर्डर, जिसे उनकी “अमेरिका फर्स्ट” ट्रेड पॉलिसी के तहत लाया गया था, पहले से चर्चा में था, लेकिन भारतीय सामान की एक बड़ी रेंज पर कुल 50 फीसद ड्यूटी लागू होने से इंडस्ट्री और सरकार दोनों में झटके की लहर दौड़ गई.
अमेरिका का नौवां सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर होने के नाते भारत अचानक खुद को सालों में मिले सबसे बड़े ट्रेड झटके का शिकार पा रहा है. यह ऐसा झटका है जो ग्लोबल सप्लाई चेन को फिर से आकार दे सकता है और दिल्ली को मजबूर करेगा कि वह अपनी निर्यात रणनीति में मुश्किल लेकिन जरूरी डाइवर्सिफिकेशन करे.
दिल्ली के लिए यह झटका बहुत भारी है. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट है, जहां भारत की लगभग 18 फीसद शिपमेंट जाती हैं, जिसकी कीमत वित्त वर्ष 24-25 में 120 अरब डॉलर से ज्यादा रही. टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स, जेम्स ऐंड जूलरी और आईटी हार्डवेयर जैसे सेक्टर, जिनमें भारत ने सालों की मेहनत से मार्केट शेयर बनाया, सीधे खतरे में हैं.
पिछले तीन दशकों में यह भारत-अमेरिका रिश्तों की सबसे मुश्किल घड़ी है, कुछ वैसी ही जैसी तब थी जब भारत को न्यूक्लियर टेस्ट करने पर प्रतिबंध झेलने पड़े थे. उसके बाद भारत ने रणनीतिक तौर पर अमेरिका से नजदीकियां बढ़ाईं.
प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने 27 अगस्त को हालात की समीक्षा के लिए अधिकारियों की मीटिंग बुलाई और तुरंत राहत देने के कदमों पर जोर देते हुए भारत की जवाबी रणनीति को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया तेज करने को कहा. उधर, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और उनकी टीम नुक्सान का अंदाजा लगाने में जुटी है.
इंडस्ट्री एसोसिएशंस का कहना है कि टेक्सटाइल और जूलरी सेक्टर में प्रॉफिट मार्जिन आधा हो सकता है, जबकि लेदर और ऑटो कंपोनेंट्स के एक्सपोर्टर्स को डर है कि उनका मार्केट शेयर वियतनाम, बांग्लादेश और मेक्सिको जैसे प्रतिद्वंद्वियों के हाथ चला जाएगा. फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, अपैरल और कीमती पत्थर जैसे सेक्टर्स में तो अमेरिकी मार्केट भारत के कुल ग्लोबल एक्सपोर्ट वॉल्यूम का 30-40 फीसद तक हिस्सा है. सिर्फ टेक्सटाइल बेल्ट से पिछले साल अमेरिका को भारत का करीब 11 अरब डॉलर का एक्सपोर्ट हुआ, जो भारत के कुल टेक्सटाइल एक्सपोर्ट का लगभग 29 फीसद था. तमिलनाडु के तिरुप्पुर को लें, जो निटवेयर हब है. यहां के एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन का अनुमान है कि कुल 12,000 करोड़ रुपए के ऑर्डर में से 6,000 करोड़ रुपए तक के अमेरिकी ऑर्डर अब हाथ से निकल सकते हैं.
सीफूड इंडस्ट्री के लिए भी हालात उतने ही गंभीर हैं. हर साल करीब 60,000 करोड़ रुपए का एक्सपोर्ट होता है, जिसमें से आधा अमेरिकी मांग से आता है. सिर्फ झींगा (श्रिम्प) ही इस आंकड़े का 40 फीसद है. नए टैरिफ से 24,000 करोड़ रुपए तक का एक्सपोर्ट साफ हो सकता है.
सूरत में डायमंड ट्रेडर्स बता रहे हैं कि मांग पहले ही तेजी से गिर चुकी है. एक स्थानीय डायमंड कटर के मुताबिक, “जो हीरा पिछले साल 25,000 रुपये में बिकता था, अब मुश्किल से 18,000 कीमत पर जा रहा है.”
कानपुर और चेन्नै के लेदर एक्सपोर्टर्स और तमिलनाडु के ऑटो-कंपोनेंट निर्माता तिल-तिल तड़पने जैसी स्थिति के लिए तैयार हो रहे हैं, क्योंकि खरीदार सस्ते विकल्पों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं. वहीं फार्मास्यूटिकल्स, जो अमेरिकी बाजार का अहम हिस्सा है, अब मार्जिन लॉस झेल रहा है, हालांकि कुछ जरूरी दवाएं अब भी छूट की कैटेगरी में आती हैं.
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस (एफआइईओ) ने इमरजेंसी एक्सपोर्ट क्रेडिट सपोर्ट और ड्यूटी ड्रॉबैक एडजस्टमेंट की मांग की है. एफआइईओ के डायरेक्टर जनरल अजय सहाय का कहना है, “कई एक्सपोर्टर्स के लिए यह सर्वाइवल का वक्त है. अगर तुरंत लिक्विडिटी सपोर्ट नहीं मिला तो लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स में डिफॉल्ट्स और नौकरियों का नुक्सान देखने को मिलेगा.” 26 अगस्त को कॉमर्स सेक्रेटरी सुनील बर्थवाल ने एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल्स से कहा कि वे हफ्ते भर में सेक्टर-वाइज असेसमेंट तैयार करें.
अर्थशास्त्रियों और रेटिंग एजेंसियों ने खतरे की घंटी बजा दी है. एफआइईओ का अनुमान है कि अमेरिका को होने वाले 87 अरब डॉलर के मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में से करीब 55 फीसदी यानी लगभग 47-48 अरब डॉलर अब 30-35 फीसद की भारी प्राइसिंग डिसडवांटेज झेल सकते हैं. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआइ) का कहना है कि अमेरिका को जाने वाला कुल एक्सपोर्ट गिरकर सिर्फ 49.6 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, यानी यह पिछले उच्च स्तर से चौंकाने वाली 40-45 फीसदी की गिरावट होगी.
क्रिसिल का अनुमान है कि गारमेंट सेक्टर की साल-दर-साल आमदनी लगभग आधी रह सकती है, जिससे लुधियाना जैसे हब में करीब 120 बड़े एक्सपोर्टर्स सीधे प्रभावित होंगे. साफ आंकड़ों और असली जगहों- तिरुपुर, सूरत, कानपुर, लुधियाना- में यह टैरिफ शॉक कोई थ्योरी नहीं है. यह तुरंत असर डाल रहा है, बेहद दर्दनाक है और सरकार व इंडस्ट्री से तुरंत कदम उठाने की मांग करता है.
डाइवर्सिफिकेशन की कीमत
पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला टैरिफ झटके की धुंध को काटते हुए कहते हैं: “हमें अपने निर्यात बाजारों को डाइवर्सिफाई करना होगा. अमेरिका अहम रहेगा, लेकिन हमारी लंबी अवधि की रणनीति ऐसे इलाकों में विस्तार करना होनी चाहिए जहां डिमांड बढ़ रही है और प्रतिस्पर्धा कम राजनैतिक है.” उनकी यह बात दिल्ली के पॉलिसी सर्कल्स में उभरती उस सहमति को भी दिखाती है कि अब ट्रेड डिप्लोमेसी को उन क्षेत्रों की तरफ मोड़ने का वक्त है जहां भारत अब तक अपनी क्षमता के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाया है.
फिर भी आगे का रास्ता आसान नहीं है. यूरोप एक बड़ा मौका देता है, लेकिन ब्रसेल्स की मांग है कि हर प्रोडक्ट सस्टेनेबिलिटी और पर्यावरणीय मानकों पर खरा उतरे, जिसके लिए भारत अभी तैयारी बढ़ा ही रहा है. अफ्रीका एक उभरता हुआ फ्रंटियर है, जहां भारतीय दवाइयों और इंजीनियरिंग सामान की पहले से अच्छी साख है, लेकिन लॉजिस्टिक अड़चनें, सीमित फाइनेंशियल इन्फ्रास्ट्रक्चर और चीन का दबदबा विस्तार को मुश्किल बना देते हैं.
लैटिन अमेरिका जैसे ब्राजील, मेक्सिको और चिली में भारतीय जेनेरिक दवाओं, आइटी सर्विसेज और ऑटो कंपोनेंट्स की अच्छी मांग है, लेकिन ऊंचे फ्रेट कॉस्ट और सीमित डायरेक्ट कनेक्टिविटी भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा घटा देती है. पश्चिम एशिया, खासकर यूएई और सऊदी अरब, अभी-भी संभावनाओं वाला बाज़ार है जहां फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स पर बातचीत चल रही है, हालांकि यहां की ज्यादातर मांग हाइड्रोकार्बन और कंस्ट्रक्शन इनपुट्स पर टिकी है.
असल चुनौती स्केल और तैयारी की है. भारतीय एक्सपोर्टर्स, खासकर एसएमई, लंबे समय से अमेरिकी मार्केट पर निर्भर रहे हैं क्योंकि वहां मार्केट बड़ा है और नियम अपेक्षाकृत पारदर्शी हैं. दूसरी जगह पैठ बनाने के लिए लॉजिस्टिक्स, कंप्लायंस और मार्केटिंग में लगातार निवेश करना होगा, जहां सरकार की सहायता जरूरी होगी. एक्सपोर्ट क्रेडिट एजेंसियों को दोबारा फंड की जरूरत पड़ सकती है और ट्रेड प्रमोशन काउंसिल्स को नए सिरे से तैयार करना होगा ताकि मौके तलाशे जा सकें. दिल्ली के ट्रेड दूतों को भी अब राजनैतिक कूटनीति से आगे बढ़कर सीधे कमर्शियल स्काउटिंग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है.
फिलहाल, नरेंद्र मोदी सरकार के पास विकल्प सीमित हैं. टैरिफ का जवाब टैरिफ से देना मुश्किल है, क्योंकि भारत की अमेरिकी बाजार पर निर्भरता और इंडो-पैसिफिक समीकरण में रणनीतिक रिश्तों की अहमियत बहुत बड़ी है. इसलिए जोर रहेगा कूटनीतिक कोशिशों पर ताकि लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स के लिए छूट मिल सके और अमेरिकी सांसदों के साथ चुपचाप लामबंदी की जा सके, खासकर उन राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ जहां भारतीय बड़ी संख्या में हैं. साथ ही उम्मीद है कि अधिकारी ब्रिटेन, यूरोपीय यूनियन और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) देशों के साथ लंबित बातचीत को तेज करेंगे ताकि यह संदेश जाए कि भारत हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठा है.
देश के लिए एक अवसर भी है
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत इस मुश्किल को एक टर्निंग पॉइंट में बदल सकता है. टैरिफ शॉक्स नए नहीं हैं- 2019 में अमेरिका ने जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रीफरेंसेज (जीएसपी) के फायदे वापस ले लिए थे लेकिन इस बार का पैमाना अभूतपूर्व है. 2025 की खासियत यह है कि भारत अब ग्लोबल ट्रेड बातचीत में कहीं ज्यादा अहमियत रखता है. 4.2 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी, तेजी से बढ़ता मिडिल क्लास और ‘चाइना प्लस वन’ स्ट्रैटेजी में केंद्रीय भूमिका के साथ ही भारत अब सिर्फ एक दर्शक नहीं है. उसे अपने मार्केट साइज का इस्तेमाल बेहतर शर्तें हासिल करने और अपने एक्सपोर्टर्स के लिए मजबूत ढांचा खड़ा करने, दोनों कामों में करना होगा.
योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन रहे मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने सुझाव दिया है कि टैरिफ के झटके को कम करने के लिए करेंसी का अवमूल्यन सोचा जा सकता है, हालांकि दिल्ली के सत्ता गलियारों में इसे समर्थन कम ही मिल रहा है. नीति-निर्माता ज्यादा फोकस कर रहे हैं जियो-इकोनॉमिक समीकरणों को फिर से सेट करने और एक्सपोर्टर्स को लिक्विडिटी सपोर्ट, पॉलिसी इंसेंटिव और बेहतर ग्लोबल ब्रांडिंग के सहारे संभालने पर.
जिन उपायों पर चर्चा हो रही है उनमें शामिल हैं: एक्सपोटर्स क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन (ईसीजीसी) का सपोर्ट बढ़ाना, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआइ) स्कीम में बदलाव, यूरोपीय संघ और खाड़ी देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को फास्ट-ट्रैक करना. इसके साथ ही इंडोनेशिया, वियतनाम और थाईलैंड जैसे बाजारों के साथ एंगेजमेंट तेज किए जा रहे हैं, जहां इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और प्रोसेस्ड फूड्स में भारत के लिए अच्छे मौके हैं.
लेकिन डाइवर्सिफिकेशन में बरसों लगते हैं. एक्सपोर्टर्स, खासकर एमएसएमई, बहुत कम मार्जिन पर चलते हैं और आसानी से अपनी सप्लाई चेन नहीं बदल सकते. सूरत का डायमंड एक्सपोर्टर या तिरुपुर का गारमेंट मैन्युफैक्चरर रातोरात न्यूयॉर्क के खरीदारों से हटकर लागोस या साओ पॉलो के क्लाइंट्स के साथ नहीं जा सकता. ट्रेड डील्स के अलावा भारत को चाहिए कि उसकी लॉजिस्टिक्स प्रतिस्पर्धी हो, पोर्ट्स बेहतर हों, लोन सस्ता मिले और प्रोडक्ट्स ग्लोबल स्टैंडर्ड्स पर खरे उतरें. इनके बिना डाइवर्सिफिकेशन के महज बयानबाजी बनकर रह जाने का खतरा है.
जबरदस्त बदलाव के साथ संतुलन
सबकी निगाहें मोदी की आने वाली विदेश यात्राओं पर हैं और दिल्ली नुक्सान की भरपाई और स्ट्रैटजिक मैसेजिंग, दोनों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रही है. मोदी इस हफ्ते पूर्वी एशिया के दौरे पर रहेंगे, जिसमें जापान और चीन की लगातार यात्राएं शामिल हैं. वे 29-30 अगस्त को टोक्यो में 15वें इंडिया-जापान एनुअल समिट में हिस्सा लेंगे, जिसमें प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा के साथ उनकी पहली द्विपक्षीय मुलाकात होगी. दोनों नेताओं से उम्मीद है कि वे 2008 की जॉइंट डिक्लेरेशन ऑन सिक्योरिटी कोऑपरेशन को अपग्रेड करेंगे और इसे भारत की अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ डिफेंस पार्टनरशिप के बराबर ले जाएंगे.
भारतीय कूटनीति के कई जानकार मानते हैं कि दिल्ली-वॉशिंगटन रिश्तों को स्थायी नुकसान हो चुका है और अब वक्त आ गया है कि भारत ‘दोस्ती’ पर भरोसा करने के बजाए लेन-देन आधारित रिश्ते बनाए.
टोक्यो में बातचीत की मेज पर कई अहम प्रस्ताव होंगे—सेमीकंडक्टर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल टेक्नोलॉजी में करीबी सहयोग; अहम खनिजों की सप्लाई चेन पर गहरा तालमेल; और क्लीन एनर्जी, हाइड्रोजन व न्यूक्लियर एनर्जी सेफ्टी में नया पुश. भारत उभरते इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक व्हीकल इकोसिस्टम में जापानी निवेश चाहता है, जबकि जापान की नजर भारत के डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में बड़ी भूमिका पर है. रणनीतिक रूप से, खासकर इंडो-पैसिफिक में मैरीटाइम सिक्योरिटी इन चर्चाओं दिलचस्पी का मुख्य विषय होगा.
जापान के बाद मोदी 31 अगस्त से 1 सितंबर तक चीन के तियानजिन जाएंगे, जहां वे शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन (एससीओ) समिट में शामिल होंगे. अधिकारियों का कहना है कि मोदी की मौजूदगी दिल्ली की “मल्टी-वेक्टर डिप्लोमेसी” को दिखाती हैः जापान जैसे सहयोगियों के साथ रिश्ते मजबूत करना और साथ ही चीन के साथ बहुपक्षीय मंचों पर जुड़ना. इधर, देश में कई थिंक-टैंक- जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठन भी शामिल हैं- चीन को लेकर अपनी सोच नए सिरे से गढ़ रहे हैं, जो आगे और एंगेजमेंट की गुंजाइश दिखाता है. संघ से जुड़े एक सूत्र ने कहा, “मौजूदा जियो-इकोनॉमिक हालात में आप चीन को नजरअंदाज नहीं कर सकते, और उन पर भरोसा भी नहीं कर सकते.”
इस बीच एक के बाद एक हो रहीं मोदी की ये समिट दिखाती हैं कि भारत ग्लोबल स्तर पर कैसे संतुलन साध रहा है. टोक्यो में एजेंडा टेक्नोलॉजी, सप्लाई चेन और डिफेंस कन्वर्जेंस का होगा, जबकि बीजिंग में फोकस प्रतिस्पर्धा को मैनेज करने और कॉन्फ्लिक्ट के फैलाव को रोकने पर रहेगा. यह कूटनीतिक कदम वॉशिंगटन, मॉस्को और दूसरे पार्टनर्स को भी यह संदेश देता है कि भारत इस तेजी से ध्रुवीकृत होती दुनिया में दोनों खेमों से जुड़ने को तैयार है.
इस विकसित होती तस्वीर का अगला पड़ाव होगा इस साल के अंत में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का दिल्ली दौरा, जिससे रूस-भारत-चीन (आरआइसी) फ्रेमवर्क एक बार फिर चर्चा में आएगा, पश्चिम के काउंटरवेट के लिए नहीं, बल्कि ग्लोबल इकोनॉमिक गवर्नेंस की शर्तें तय करने वाले मंच के तौर पर.
इधर ब्राजील ने भी वॉशिंगटन की टैरिफ आक्रामकता पर तीखी प्रतिक्रिया दी है और अपनी बातों को भारत की उन चिंताओं के साथ जोड़ा है जो बिगड़े हुए ट्रेड नॉर्म्स को लेकर हैं. इससे ब्रिक्स + के लिए बातचीत तेज करने का जमीन तैयार हो रही है- लोकल करेंसी सेटलमेंट्स, सप्लाई चेन फाइनेंसिंग के नए तरीकों और साझा ट्रेड डिफेंस स्ट्रैटजीज पर. असल में, जो कभी एक ढीला-ढाला गठबंधन था, अब उसे कहीं ज्यादा संगठित होकर काम करने पर मजबूर किया जा सकता है.
फिर भी एक ओर जहां दिल्ली बहुपक्षीय मंचों पर झुकाव दिखा रही है, वहीं उसने वॉशिंगटन से जुड़ी एक खिड़की मजबूती से खुली रखी है. मोदी के न्यूयॉर्क में यूएनजीए दौरे के दौरान साउथ ब्लॉक के अधिकारी यह पक्का कर रहे हैं कि बैकचैनल एंगेजमेंट जारी रहे. डिकपलिंग की तमाम बातों के बावजूद, दिल्ली के सत्ता गलियारों में कोई भी अमेरिका से बातचीत छोड़ने को तैयार नहीं है, खासकर तब, जब अब भी भारत के 18 फीसद एक्सपोर्ट वहीं जाते हैं.
इंडस्ट्री लॉबीज सरकार पर दबाव डाल रही हैं कि वह यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और खाड़ी देशों के साथ ट्रेड बातचीत को फास्ट-ट्रैक करे. अधिकारी भी मानते हैं कि अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी से भारत का रुख डब्ल्यूटीओ और आने वाली जी20 ट्रेड चर्चाओं में और सख्त हो सकता है. एक ऐसी सरकार के लिए, जिसने लगातार ‘मेक इन इंडिया’ को ग्लोबल ब्रांड की तरह पेश किया है, यह विडंबना किसी से छिपी नहीं है कि अब वही दुनिया के सबसे बड़े कंज्यूमर मार्केट से प्राइसिंग की वजह से बाहर धकेला जा रहा है.
आगे का रास्ता चुनौतियों से भरा है. डाइवर्सिफिकेशन के लिए सब्र, पूंजी और राजनैतिक इच्छाशक्ति चाहिए और इन सबकी परीक्षा अब होगी, क्योंकि एक्सपोर्टर्स तुरंत राहत मांग रहे हैं और विपक्ष सरकार की आर्थिक साख पर हमला कर रहा है. मोदी के विदेश दौरों के साथ आने वाले हफ्ते बेहद अहम होंगे. उनकी कूटनीति में पार्टनर्स को भरोसा दिलाने, रियायतें हासिल करने और एक ठोस डाइवर्सिफिकेशन रोडमैप पेश करने की क्षमता ही यह तय करेगी कि भारत इस झटके को बस झेलता है या और मजबूत बनकर उभरता है.
फिलहाल एक सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता: वॉशिंगटन की टैरिफ पाबंदियों ने भारत की एक्सपोर्ट डिपेंडेंसी की नाजुकता को उजागर कर दिया है. दिल्ली इसे अस्थायी झटका मानती है या फिर एक स्ट्रक्चरल टर्निंग पॉइंट, यही आने वाले समय में भारत के ग्लोबल ट्रेड फुटप्रिंट को तय करेगा.