'अननोन मैन' और पाकिस्तान में हत्याएं : 'धुरंधर' के फसाने में कितनी हकीकत?

'धुरंधर' में दिखे रहमान डकैत से लेकर एसपी चौधरी असलम तक...पाकिस्तान की ल्यारी इन किरदारों को वाक़ई देख-भुगत चुकी है

'धुरंधर' किरदार : अक्षय खन्ना, रणवीर सिंह, संजय दत्त

अपने पहले हिस्से में ‘हिंदू बहुत डरपोक कौम होती है...’ डायलॉग से शुरू होती है फिल्म धुरंधर. दुनिया भर में अपने संगीत, कहानी और कमाई की ज़मीन पर रिकॉर्ड बनाती ध्वस्त करती इस धुंआधार फिल्म का दूसरा हिस्सा कहता है ‘ये नया भारत है, घर में घुसेगा भी और मारेगा भी...’ साल 2019 में ‘उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक’ बनाकर अपना लोहा मनवा चुके निर्देशक आदित्य धर कई बरसों से एक बात बार-बार कहते हैं, "कहानी से बढ़कर कुछ भी नहीं होता..."

आदित्य का नाम हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री के उन कुछ मेधावी निर्देशकों में शुमार किया जाता है जो महाकाय स्टूडियोज़, भयभीत करने वाले मेकिंग बजट और सुपरस्टार्स का पीछा करने से पहले कहानी के पीछे भागते हैं. और अंतिम दम तक भागते हैं. ‘उरी’ के समय अपनी बेहद सीमित पूंजी आदित्य कहानी की रिसर्च में लगा रहे थे. सेना के अफसरों, पत्रकारों और सूत्रों से मुलाकात के लिए बार-बार मुंबई से दिल्ली आते जाते थे.

आदित्य ऐसा तब तक करते रहे जब तक उन्हें सारे सिरे मिले नहीं. कुल बारह दिनों में लिखे स्क्रीनप्ले का असर जब सड़क से संसद तक गूंजा तो आदित्य के काम को भर-भर के सराहना मिली.

धुरंधर के दोनों हिस्सों में आदित्य धर ने अपनी बात सिनेमा इंडस्ट्री के माथे पर सोने की सियाही से गुदवा दी कि ‘कहानी से बढ़कर कुछ नहीं होता...’ पाकिस्तान के ल्यारी में सेट ये कहानी ही थी कि दूर से इतनी भयानक एजेंडा लगती यह फिल्म जब आपको पास बुलाती है, तो लाजवाब करके वापस भेजती है. लेकिन सवाल ये है कि क्या आदित्य ये सिर्फ अपनी कल्पना के दम पर कर पाए? या इस कल्पना में सच का धातु भी मिला हुआ है जो इसे गढ़े जाने की काबिलियत देता है.

कितनी हक़ीक़त कितना फ़साना? 

दिसंबर 2025 में आई फिल्म धुरंधर जिस घटना से खुलती है वह है कंधार हाइजैक. 24 दिसंबर 1999 को नेपाल के काठमांडू से दिल्ली आ रही इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC-814 को पांच आतंकवादियों ने हाईजैक कर लिया. विमान में 179 यात्री और 11 क्रू मेंबर्स थे. विमान अमृतसर, लाहौर और दुबई होते हुए आखिरकार अफगानिस्तान के कंधार पहुंचा, जहां उस वक्त तालिबान का नियंत्रण था. ये सिर्फ एक हाइजैक नहीं था. यह एक ऐसा बंधक संकट था जिसे पूरी दुनिया लाइव देख रही थी और भारत इस दृश्य में लाचार दिखाई देता है. उस समय भारत सरकार पर जबरदस्त दबाव था. यात्रियों की जान बचाने के लिए हाईजैकर्स ने तीन आतंकवादियों की रिहाई की मांग रखी: मसूद अजहर, उमर शेख और मुश्ताक अहमद जरगर. तब देश के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे और विदेश मंत्री जसवंत सिंह. कई दिनों तक चले तनाव और बातचीत के बाद आखिरकार भारत सरकार को यह मांग माननी पड़ी. 31 दिसंबर 1999 को बंधकों की रिहाई हुई लेकिन इस फैसले की गूंज आने वाले दशकों तक सुनाई देती रही. 

इस हाइजैक से दो नाम ऐसे उभरे जिन्हें बरसों तक भूला नहीं जा सका. पहला, रुपिन कात्याल, जो कि इसी फ्लाइट में अपनी पत्नी के साथ हनीमून से लौट रहा नौजवान था. और दूसरा, ज़हूर इब्राहिम मिस्त्री. भारत के साथ बातचीत में एक समय ऐसा भी आया जब हाइजैकर्स को जल्दबाज़ी दिखाकर दबाव बढ़ाना था और इसके लिए उन्होंने एक पैसेंजर की गला रेतकर हत्या कर दी. यह पैसेंजर था रुपिन कात्याल और इसका गला रेतने वालों में से एक था ज़हूर मिस्त्री. 

कंधार हाइजैक का मामला तो निपट गया लेकिन रुपिन कात्याल की हत्या को भारत में किसी निजी त्रासदी जैसा माना गया. इस नए नवेले जोड़े की इस त्रासदी को इस भाव प्रधान देश ने याद रखा.

मिस्ट्री बना मिस्त्री 

यह सब खत्म होने के बाद कंधार हाइजैक के आतंकवादी इधर-उधर ग़ायब हो गए. सुरक्षा बलों के बीच और कुछ मीडिया रपटों में दावा किया गया कि कंधार में हवाई जहाज़ के भीतर जो निगोसिएशन टीम गई थी, जिसमें तब इंटेलिजेंस ब्यूरो के एडिशनल डायरेक्टर और वर्तमान में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल भी थे, से ज़हूर मिस्त्री ने एक बात कही थी. वह ये कि ‘बिगाड़ लो जो बिगाड़ सकते हो...’ इसी हिसाब का कोई वाक्य, जो चुनौती देता सुनाई देता है. हैरानी की बात नहीं कि, अपनी फ़ौरी कामयाबी और भारत को अपने सामने लाचार देखकर किसी हाइजैकर ने ये कह भी दिया हो. कहा जाता है कि यह बात उसी ज़हूर मिस्त्री ने कही थी जिसने रुपिन कात्याल का गला रेता था.

इसके बाद ज़हूर मिस्त्री हवा हो गया. किसी को दिखाई ही नहीं दिया कई बरसों तक. क्योंकि ज़हूर ने अपनी पहचान बदली और दुबई. ओमान, अफगानिस्तान होते हुए पाकिस्तान के कराची आकर बस गया. नाम और पेशा ऐसा बदला कि आस-पड़ोस के लोग भी मानते थे कि फर्नीचर की दुकान चलाने वाला यह आदमी एक आम कारोबारी है. ज़हूर ने अपना नाम बदलकर ज़ाहिद अखुंद रख लिया था और कराची में क्रिसेंट फर्नीचर के नाम से दुकान चलाने लगा था. 

लेकिन कब तक छुप पाता 

साल 2012 में हुई एक पर्ची किलिंग में पाकिस्तानी मीडिया के एक टैबलॉइड ने पहली बार ‘अननोन मैन’ का जिक्र अपनी हेडलाइन में किया. पाकिस्तान में पर्ची किलिंग वैसी ही है जैसे मुंबई के अंडरवर्ल्ड में सुपारी किलिंग. यहां सुपारी निकलती है वहां पर्ची निकलती है. 2012 से एक सिलसिला शुरू हुआ जब हत्याओं का ज़िम्मा कोई नहीं ले रहा था. इसे ऐसे समझें कि पाकिस्तान का ल्यारी ठीक वैसा ही इलाका है जैसा किसी जमाने में मुंबई का धारावी. ऐसे क्रूर इलाके जिनमें बीच चौराहे चाकुओं से गोदकर हत्याएं होती रही हैं और हत्यारे हर वो मुमकिन कोशिश करते हैं कि इन हत्याओं के अधिकतम गवाह हों ताकि इलाके को पता चल सके कि नया ‘भाई’ आ गया है.

मुंबई अंडरवर्ल्ड की तरह ही गैंगवॉर और खुले तौर पर लिए गए बदले, पाकिस्तान के ल्यारी में भी यही दृश्य आम थे. वहां फिरकापरस्तों और एक्सट्रीमिसट आतंकवादियों के लिए टास्क फ़ोर्स बनाई गई थी और एसपी चौधरी असलम जैसे पुलिस अधिकारी ख़ुद को सरकार का सफाईकर्मी बताते थे, इधर मुंबई में पठान, मुंबईकर और दक्षिण भारतीय अपराधियों के गैंग्स का सफाया प्रदीप शर्मा और दया नाइक जैसे पुलिस अधिकारी कर रहे थे और ये भी यही कहते थे कि इन्हें ‘सफ़ाई’ का काम दिया गया है.

इन्हीं सब के बीच पाकिस्तान के कराची में ‘अननोन मैन’ पर हत्याओं के आरोप डालने का सिलसिला कायम था. इन हत्याओं में बस एक पैटर्न ये था कि ये सभी किसी न किसी तरह भारत विरोधी और वांटेड कमांडर्स हुआ करते थे. पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी ISI के लिए काम करने वाले खनानी ब्रदर्स के जावेद खनानी ने ठीक वैसे ही छत से कूदकर आत्महत्या की थी जैसा धुरंधर के दूसरे हिस्से में दिखाया गया है.

फिर ये मिस्ट्री सॉल्व भी हुई 

ज़हूर मिस्त्री को भारत की सिक्योरिटी एजेंसीज़ में एक नाम दिया था. ज़हूर ‘मिस्ट्री’. जो दो दशक बाद भी सुलझ नहीं पाई थी. 1 मार्च 2022 की दोपहर थी. कंधार हाइजैक को 22 साल हो चुके थे. कराची के पॉश इलाके में फर्नीचर की दुकान ‘क्रिसेंट फर्नीचर’ में दुकान का मालिक ज़ाहिद अखुंद दिन के कामों में लगा हुआ था. हुलिया ऐसा कि इतने सालों बाद इसे पहचानना भी मुश्किल होता. दरवाज़े पर दो नौजवान आए. नक़ाब से चेहरा ढंका हुआ था. इनमें से एक ने साफ़ शब्दों में ज़ाहिद की तरफ़ देखकर पूछा- ‘ज़हूर मिस्त्री?’ ज़हूर से ज़ाहिद बन चुका ये शख्स जब तक समझ पाता कि इतना पुराना नाम ये जानते कैसे हैं और इन्होने खोजा कैसे. दोबारा पूछा गया- ‘ज़हूर इब्राहिम मिस्त्री ना?’

ज़हूर की ज़बान से ज़्यादा उसका चेहरा बता रहा था कि नाम उसका ही था. चेहरे के ठीक सामने पिस्टल से पॉइंट ब्लैंक तीन फ़ायर हुए और ज़हूर वहीं ढेर हो गया. भीड़ भरे बीच बाज़ार की गई इस हत्या के चश्मदीदों ने कराची पुलिस को बताया कि हमलावरों में से एक ने कहा था ‘ये रुपिन कात्याल की तरफ से...’ 

ये हत्या इतनी प्लानिंग के साथ हुई कि जिन दो हमलावरों ने गोली मारी वे कुछ ही मिनट में बिल्कुल लापता हो गए. जिस मोटरसाइकिल से वे आए थे उसे कराची के ओल्ड पार्ट्स मार्केट में पुर्ज़ा-पुर्ज़ा खोलकर गायब कर दिया गया. यह हत्या भी ‘अननोन मैन’ के हिस्से आई. 

आदित्य धर की ‘पीक डिटेलिंग’ 

कहानी के लिए की गई रिसर्च और सात दरवाज़ों के पीछे छिपी इन कहानियों तक आदित्य ने कैसे अपनी पहुंच बना ली यह सोचने की बात है. लेकिन इन घटनाओं को जिस नक्काशी के साथ बरता गया उससे धुरंधर की शाहकार कहानी पैदा हुई. पीक डिटेलिंग का एक उदाहरण यही देख लीजिए कि सुरक्षा एजेंसियों के बारे में थोड़ा या औसत जानने वाले जानते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एक ख़ास ब्रांड की सिगरेट पीते हैं. एक सस्ता लेकिन सबसे ज़्यादा बिकने वाला ब्रांड. जिसे देखकर सिगरेट पीने वाले बता सकते हैं कि ये कौन सा ब्रांड है. धुरंधर के पहले हिस्से के पहले फ्रेम में ‘सान्याल’ का किरदार निभा रहे आर. माधवन को उसी सिगरेट के साथ दिखाया गया है. डोभाल को थोड़ा और जानने वाले जानते हैं कि एक समय आधी सिगरेट बुझाकर वापस जेब में रख लेने की उनकी आदत रही. धुरंधर के दूसरे हिस्से में यह डीटेल आदित्य ने इस्तेमाल की है.

धुरंधर का मारक मज़ा असल में पहले से घट चुकी घटनाओं और ‘अननोन मैन’ के नपे तुले बैलेंस से तैयार हुआ है. पाकिस्तान में बलोचों, पठानों और पुलिस के दशकों चले गुत्थमगुत्था की ठोस दाल पर ‘अननोन मैन’ का देसी घी का बघार. 

Read more!