बारूद के ढेर पर दिल्ली : जुगाड़ के सहारे चल रहे होटल, पीजी और गेस्टहाउस

फ्लोरिश स्टे अग्निकांड के बाद हुई जांच में सामने आया कि दिल्ली के कई होटल, पीजी और गेस्टहाउस नियमों के बजाय जुगाड़ के सहारे चल रहे हैं

सांकेतिक फोटो

नई दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लोरिश स्टे बीएंडबी (ब्रेड एंड ब्रेकफास्ट) में जून की शुरुआत में लगी आग में 22 लोगों की मौत ने सिर्फ एक और जांच अभियान शुरू नहीं कराया. इसने अधिकारियों को उस सवाल का सामना करने के लिए मजबूर किया जो लंबे समय से राष्ट्रीय राजधानी की भीड़भाड़ वाली बस्तियों, बजट होटलों, गेस्टहाउसों और पीजी (पेइंग गेस्ट) आवासों पर मंडरा रहा है. आखिर यह शहर कितने खतरनाक ढंग से बारूद के ढेर पर बैठा है?

कई हफ्तों से चल रहे सख्त जांच अभियान में दिल्ली भर की संपत्तियों पर छापेमारी शामिल है. इसके संकेत चिंताजनक हैं. अधिकारियों ने सैकड़ों संपत्तियों में नियमों के उल्लंघन पकड़े हैं. 250 से अधिक नोटिस जारी किए हैं. 400 से ज्यादा ढांचों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए हैं. सैकड़ों सीलिंग और ध्वस्तीकरण अभियान चलाए हैं. कार्रवाई तेज होने के साथ जिला प्रशासन अब तक करीब 900 स्थलों का निरीक्षण कर चुका है.

भवन नियमों के उल्लंघन का पैमाना और स्वरूप चौंकाने वाला है. कहीं फायर सेफ्टी की मंजूरी नहीं है. कहीं इमर्जेंसी एग्जिट बंद हैं. कहीं अलार्म और अग्निशमन उपकरण काम नहीं कर रहे. कई जगह खुली बिजली की तारें मिलीं. कुछ इमारतों में अतिरिक्त और बिना मंजूरी वाले फ्लोर बनाए गए थे. कई गेस्टहाउस रिहायशी परिसरों से संचालित हो रहे थे. कृषि भूमि को बिना अनुमति व्यावसायिक उपयोग में बदला गया था. अस्थाई ढांचों ने सीढ़ियों को संकरा कर दिया था. बेसमेंट में इमर्जेंसी एग्जिट नहीं थे. छतों पर अवैध कमरे बने थे. जनरेटर बिना मंजूरी के चल रहे थे. फायर सेफ्टी सिस्टम सिर्फ कागजों पर मौजूद थे. और भी कई तरह की अनियमितताएं मिलीं.

अलग-अलग देखें तो इनमें से कई उल्लंघन दिल्ली में आम हैं. लेकिन इन्हें एक साथ देखें तो यह ऐसे शहर की तस्वीर पेश करते हैं, जिसकी रफ्तार उसके नियामक तंत्र की क्षमता से कहीं ज्यादा तेज रही है.

दिल्ली में आवास और व्यावसायिक जगह की लगातार बढ़ती मांग ने ऐसे इलाके पैदा किए हैं जहां रिहायशी इमारतें चुपचाप हॉस्टल, पीजी, गेस्टहाउस, क्लीनिक, कोचिंग सेंटर और छोटे होटलों में बदल गईं. समय के साथ अतिरिक्त मंजिलें जुड़ती गईं. अस्थाई ढांचे स्थाई बन गए. फायर एग्जिट वाली जगहें स्टोर रूम बन गए. नियमों को लागू करने से जुड़ी कागजी प्रक्रिया पीछे छूटती गई.

निरीक्षण यह संकेत देते हैं कि शहर उस व्यवस्था पर चल रहा है जिसे आम बोलचाल में 'जुगाड़' कहा जाता है. यानी ऐसा तरीका, सुधार या जोड़तोड़ जो काम चलाता रहे. इसे अक्सर सूझबूझ और कौशल के रूप में सराहा भी जाता है. लेकिन समय के साथ जुगाड़ नियमों का विकल्प भी बन गया. फ्लोरिश स्टे अग्निकांड की जांच ने इस सच्चाई को साफ तौर पर सामने ला दिया.

निरीक्षण टीमों ने बार-बार होटलों और पीजी आवासों में फायर सेफ्टी से जुड़े उल्लंघन पाए. इनमें फायर सेफ्टी की मंजूरी न होना या उसकी अवधि समाप्त होना, एग्जिट का बंद होना और इमर्जेंसी से निपटने की अपर्याप्त तैयारी शामिल है. कुछ प्रतिष्ठानों में काम करने वाला अलार्म सिस्टम या क्राइसिस मैनेजमेंट प्लान तक नहीं था. अन्य जगहों पर बिजली और ढांचागत कमियां मिलीं जो आग लगने की स्थिति में नुकसान को और बढ़ा सकती थीं.

निरीक्षकों ने बार-बार पाया कि फायर सेफ्टी में चूक शायद ही कभी अकेले मौजूद थी. इसके साथ अक्सर अनधिकृत निर्माण, लाइसेंस संबंधी उल्लंघन, अवैध व्यावसायिक गतिविधियां या ढांचे में बिना अनुमति किए गए बदलाव भी जुड़े थे. कार्रवाई के दौरान कई जिलों में बिना स्वीकृत नक्शों वाली इमारतें, तय ऊंचाई सीमा से अधिक ऊंचे ढांचे और पूर्णता या अधिभोग प्रमाणपत्र के बिना चल रही संपत्तियां मिलीं. कई इलाकों में जांच टीमों ने ऐसे व्यावसायिक प्रतिष्ठान पाए जो उन परिसरों से चल रहे थे जिन्हें सिर्फ रिहायशी उपयोग की मंजूरी मिली थी.

यह पैटर्न दिल्ली के शहरी केंद्र तक सीमित नहीं है. दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के कुछ हिस्सों में अधिकारियों ने कृषि भूमि के अनधिकृत रूपांतरण और स्वीकृत भूमि उपयोग मानकों से बाहर निर्माण गतिविधियों के मामले पाए हैं. शुरुआत में यह अभियान मुख्य रूप से कारण बताओ नोटिस और प्रतिबंधात्मक आदेशों पर आधारित था. लेकिन जून के मध्य तक कार्रवाई का स्वरूप बदल गया. सीलिंग और ध्वस्तीकरण आम होते गए. हाल के दिनों में अधिकारियों ने कार्रवाई की रफ्तार और बढ़ा दी है. इससे संकेत मिलता है कि अभियान अब सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा.

निरीक्षणों ने चुनौती के वास्तविक पैमाने को भी उजागर किया है. दिल्ली ऐसा शहर है जहां जगह को लेकर लगातार दबाव बना रहता है. हर साल यहां नए निवासी, कारोबारी, छात्र और कामगार आते हैं. वे आवास और अवसरों की तलाश में होते हैं. मांग पूरी करने के लिए इमारतों में बदलाव किए जाते हैं, उनका विस्तार होता है और उनका उपयोग बदला जाता है. दूसरी ओर, कानून लागू करने वाली एजेंसियां अक्सर वर्षों में जमा हुए इन बदलावों के पीछे-पीछे चलती रह जाती हैं.

मांग और रेगूलेशन के बीच यही तनाव अब सामने आ रहे कई उल्लंघनों में दिखाई देता है. फ्लोरिश अग्निकांड के बाद हुए निरीक्षणों ने दिखाया है कि समस्या कुछ गिने-चुने नियम तोड़ने वाले प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं है. इसके बजाय यह ऐसे व्यापक तंत्र की ओर इशारा करती है जहां नियमों को अक्सर मोड़ा गया, कागजी प्रक्रिया टाली गई और जोखिमों को सामान्य मान लिया गया. धीरे-धीरे वे शहरी जीवन का हिस्सा बन गए.

सालों तक यह व्यवस्था किसी तरह चलती रही. फिर मालवीय नगर की आग ने समझौते के इसी सामान्य पैटर्न को एक त्रासदी में बदल दिया. अब जारी कार्रवाई यह उजागर कर रही है कि ऐसे समझौते राजधानी के जीवन के बड़े हिस्से में कितनी गहराई तक जड़ें जमा चुके थे.

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