कश्मीर पर विरोध, पर आतंक पर सहयोग; भारत-तुर्किए रिश्तों में 'टू ट्रैक' का क्या है रहस्य?
तुर्किए ने हाल ही में दाऊद इब्राहिम के एक करीबी को भारत को सौंपा है

तुर्किए और पड़ोसी देश पाकिस्तान में गलबहियां की खबरें पिछले कुछ समय से खूब चर्चा में रही हैं. इन सबके बीच 28 अप्रैल को तुर्किए ने दाऊद इब्राहिम के अपराध सिंडिकेट ‘डी-कंपनी’ से जुड़े एक प्रमुख नारकोटिक्स तस्कर को भारत को सौंप दिया है.
भले ही दोनों देशों के बीच भू-राजनीतिक मतभेद रहे हों लेकिन ऐसा करके तुर्किए ने सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के साथ सहयोग और संबंधों को और मजबूत करने के संदेश दिए हैं. दोनों देशों की एजेंसियों के बीच कई स्तरों की बातचीत के बाद मुंबई के रहने वाले सलीम इस्माइलभाई डोला को तुर्किए ने भारत डिपोर्ट कर दिया है.
सलीम डोला कई नारकोटिक्स तस्करी के मामलों में वॉन्टेड था. वह 2018 के 1000 करोड़ रुपए के फेंटानिल जब्ती मामले में मुख्य आरोपी है. उसके अंतरराष्ट्रीय ड्रग रूट्स से संबंध माने जाते हैं, जो मैक्सिको तक फैले हुए हैं. वह फरार डॉन दाऊद इब्राहिम के करीबी सहयोगी इकबाल मिर्ची के साथ काम करता रहा है.
डोला का भारत प्रत्यर्पण सिर्फ पुलिस की सफलता नहीं है बल्कि यह तुर्की और भारत के बीच सुरक्षा और अपराध नियंत्रण के क्षेत्र में चल रहे सहयोग को भी दिखाता है. 2020 में भारत से फरार होने के बाद डोला 2024 में दुबई से इस्तांबुल चला गया था. रेड कॉर्नर नोटिस होने के बावजूद, तुर्किए ने कूटनीतिक और इंटरपोल के रास्ते से भारत से जरूरी दस्तावेज मांगे. तुर्किए सरकार ने उसे अपने निवेश कार्यक्रम के तहत नागरिकता देने से इनकार कर दिया और अंत में उसे भारत को सौंप दिया.
भारतीय सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि तुर्किए की कुछ ऐसे देशों के साथ राजनीतिक निकटता है जो अक्सर भारत के खिलाफ होते हैं. इसके बावजूद उसने सुरक्षा सहयोग के तहत दाऊद इब्राहिम के करीबी को भारत को सौंपने का फैसला किया. नाम नहीं बताने की शर्त पर सीनियर अधिकारी ने कहा, “दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियां आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों और खुफिया जानकारी साझा करने के मामले में व्यवहारिक और कामकाजी संबंध बनाए हुए हैं.”
जनवरी 2019 में भी तुर्किए ने मिशाल कुन्हिमोन नाम के एक भारतीय नागरिक को भारत डिपोर्ट कर दिया था. मिशाल पर भारतीय मुजाहिदीन और ISIS नेटवर्क से जुड़े होने का आरोप था. 2015 में तमिलनाडु के कम से कम दो युवकों को ISIS में शामिल होने की कोशिश करते हुए तुर्किए में पकड़ा गया, फिर उसे वापस भारत भेज दिया गया था.
इन घटनाओं से तुर्किए की उस इच्छा का पता चलता है कि वह भारतीय नागरिकों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करने को तैयार है. अधिकारियों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच यह सहयोग अब संस्थागत रूप से भी औपचारिक हो चुका है.
जुलाई 2019 में तुर्किए में भारत-तुर्की आतंकवाद विरोधी संयुक्त कार्यसमूह (ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप ऑन काउंटर टेररिज्म) की चौथी बैठक हुई थी. इस बैठक ने आतंकवाद की फंडिंग, कट्टरपंथी और सीमा पार अपराधी सिंडिकेट्स पर खुफिया जानकारी साझा करने के लिए एक व्यवस्थित मंच उपलब्ध कराया था. ये वे क्षेत्र हैं, जो सलीम डोला जैसे मामलों से सीधे जुड़े हुए हैं.
अधिकारियों का कहना है कि भारत और तुर्किए के संबंध एक साथ दो अलग ट्रैकों पर चलते हैं. कश्मीर जैसे मुद्दों पर तुर्किए की स्थिति और पाकिस्तान के समर्थन में है. यही कारण है कि पाकिस्तान के साथ तुर्किए की रणनीतिक निकटता समय-समय पर भारत के साथ रिश्तों में तनाव पैदा करती रही है. हालांकि, व्यावहारिक रिकॉर्ड बताता है कि आतंकवाद विरोधी सहयोग और संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई राजनीतिक उथल-पुथल से अलग-थलग बनी हुई है.
भारत के लिए, आतंकवाद की फंडिंग और नारकोटिक्स तस्करी के बढ़ते वैश्विक नेटवर्क का सामना करते हुए ऐसे सहयोग की बहुत बड़ी अहमियत है. तुर्किए के लिए अंतरराष्ट्रीय पुलिसिंग ढांचे के अंदर भारत के साथ सहयोग करना भू-राजनीतिक और सुरक्षा जरूरतों के बीच संतुलन बनाने का एक तरीका है.
भारत के सबसे खतरनाक संगठित अपराध सिंडिकेट से जुड़े एक बड़े ऑपरेटिव को तुर्किए के जरिए भारत को सौंपना दोनों देशों के बीच आतंकवाद विरोधी सहयोग को लेकर बढ़ते मजबूत संबंध को दिखाता है. भारत-तुर्किए संबंध राजनीतिक रूप से जटिल हैं, लेकिन सुरक्षा के मुद्दे पर दोनों चुपचाप एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं, क्योंकि दोनों कई मामलों में एक साझा खतरे का सामना कर रहे हैं जो कूटनीतिक मतभेदों से परे हैं.