एयर इंडिया हादसा : एक साल बाद भी अनसुलझे हैं कई सवाल
अहमदाबाद विमान हादसे को एक साल पूरा हो गया है लेकिन अब भी इस सवाल का जवाब नहीं मिला है कि आखिर इस हादसे की असल वजह क्या थी?

12 जून 2025 की दोपहर एयर इंडिया की उड़ान AI-171 ने अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़ान भरी. करीब 32 सेकंड बाद ही यह विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया. 242 लोगों को लेकर लंदन जा रहा बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर बी.जे. मेडिकल कॉलेज के छात्रावास से टकरा गया और भीषण आग की चपेट में आ गया. इस घटना में 260 लोगों की मौत हो गई.
इस जानलेवा हादसे से केवल एक व्यक्ति जीवित बचकर बाहर निकल सका. अब इस घटना को एक साल पूरा हो गया है. फिर भी पीड़ित परिवारों और पूरे विमानन उद्योग को इस सवाल के जवाब का इंतजार है कि आखिर उस दिन क्या हुआ था? बोइंग 787 जैसा आधुनिक विमान, जो आज भी दुनिया भर में उड़ान भर रहा है, इस भीषण हादसे का शिकार कैसे हो गया?
दुर्घटना के कुछ ही सप्ताह बाद केंद्र सरकार के विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (AAIB) की ओर से जारी अंतरिम रिपोर्ट में संकेत दिया गया था कि दुर्घटना का कारण पायलट की गलती थी. चाहे वह जानबूझकर की गई हो या तकनीकी कारणों से हुई हो. हालांकि तब भी असल वजह का पता नहीं चल सका और मामला अटकलों पर छोड़ दिया गया. भारतीय पायलट महासंघ (FIP) ने अंतरिम रिपोर्ट में पायलट पर लगाए गए आरोप को तुरंत खारिज कर दिया था.
तब से इस घटना से जुड़े कई अहम और अनुत्तरित सवालों की फाइल और मोटी होती जा रही है. दुर्घटना की पहली बरसी से पहले हुई बातचीत में FIP के अध्यक्ष कैप्टन सी.एस. रंधावा ने बिना लाग-लपेट के कहा कि जांच की सबसे बड़ी विफलता पायलट की गलती को जल्दबाजी में स्वीकार करना है. उन्होंने कहा, "हम AAIB और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को यह समझाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं कि इस मामले में इससे कहीं अधिक बातें हैं जिनके बारे में जानना जरूरी है."
दुर्घटना की पहली बरसी पर अहमदाबाद जाकर पीड़ित परिवारों से मिलने वाले रंधावा ने कहा कि अंतिम रिपोर्ट जल्द जारी होने की व्यापक उम्मीद है. हालांकि उन्होंने अधिकारियों से अनुरोध किया कि रिपोर्ट तभी जारी की जाए, जब सभी सवालों के ठोस और प्रमाणित जवाब मिल जाएं. दुर्घटना के एक महीने के भीतर जारी प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया गया था कि उड़ान भरने के तुरंत बाद इंजन में फ्यूल सप्लाई कंट्रोल करने वाले दोनों स्विच लगभग एक साथ ऑफ मोड में चले गए थे. पश्चिमी मीडिया ने कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) के एक छोटे हिस्से को आधार बनाकर इसे पायलट की जानबूझकर की गई कार्रवाई का सबूत बताना शुरू कर दिया.
हालांकि रंधावा स्पष्ट रूप से कहते हैं, "किसी भी पायलट ने फ्यूल कंट्रोल को नहीं छुआ." उनके मुताबिक, CVR के उस छोटे हिस्से को जिस तरह पेश किया गया वह स्वयं एक त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया का संकेत था जिससे अटकलों को बढ़ावा मिला. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जांच की प्रक्रिया और उसमें शामिल जांचकर्ताओं की भूमिका के कारण भी जांच को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
AAIB की पांच सदस्यीय जांच टीम का नेतृत्व संजय कुमार सिंह (प्रमुख जांच अधिकारी) और जसबीर सिंह लरहगा (मुख्य जांचकर्ता) कर रहे हैं. ये दोनों AAIB के अधिकारी हैं. बाकी तीन सदस्य विपिन वेणु वराकोथ, वीरराघवन के. और वैष्णव विजयकुमार हैं जो नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) के कार्यरत अधिकारी हैं.
समस्या यह है कि भारत का विमानन नियामक DGCA स्वयं निगरानी संबंधी विफलताओं को लेकर जांच के दायरे में है. रंधावा के आरोप को तकनीकी क्षेत्र में काम करने वाली एक संस्था का भी समर्थन मिला है. विमानन और उच्च जोखिम वाले उद्योगों में सुरक्षा के लिए काम करने वाली गैर-लाभकारी संस्था 'सेफ्टी मैटर्स फाउंडेशन ऑफ इंडिया' ने एक फोटोग्रामेट्री एनालिसिस रिपोर्ट जारी की है. इसमें दिखाया गया है कि विमान का रैम एयर टरबाइन फ्यूल स्विच के 'कटऑफ' स्थिति में जाने से 2.5 सेकंड पहले सक्रिय हो गया था. इससे संकेत मिलता है कि किसी भी स्विच को छूने से पहले ही प्लेन का सिस्टम गड़बड़ाने लगा था. संस्था के आकलन के मुताबिक कारण कभी परिणाम के बाद नहीं आ सकता.
वे संदेश, जिन्हें अब तक कोई नहीं पढ़ पाया
FIP के मुताबिक, विमान के उड़ान भरने के तुरंत बाद कम से कम 10 विशेष ACARS (एयरक्राफ्ट कम्युनिकेशंस एड्रेसिंग एंड रिपोर्टिंग सिस्टम) रखरखाव संदेश भेजे गए थे. इसके अलावा उड़ान भरने से 15 मिनट पहले के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि विमान रनवे छोड़ने से पहले ही तकनीकी समस्याओं के संकेत दे रहा था.
ACARS वह डिजिटल प्रणाली है, जिसके जरिए विमान अपनी स्थिति और तकनीकी जानकारी लगभग रियल टाइम में जमीन पर मौजूद ऑपरेटरों और तकनीशियनों तक पहुंचाते हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि जब ACARS विफल हो जाता है, तो यह केवल संचार ही नहीं रोकता, बल्कि पायलटों के इलेक्ट्रॉनिक फ्लाइट बैग भी निष्क्रिय कर देता है. इससे कॉकपिट में वास्तविक समय की मौसम और परिचालन संबंधी जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाती.
FIP ने औपचारिक रूप से मांग की है कि विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (AAIB) बोइंग को निर्देश दे कि वह इन विशेष रखरखाव संदेशों का अर्थ स्पष्ट करे.
महासंघ ने यह भी पूछा है कि इन संदेशों को पहले क्यों नहीं बताया गया? पायलट की कथित गलतियों को लेकर FIP का कहना है कि अधिकारियों ने विदेशी मीडिया में इस तरह की बातें लीक की थीं. साथ ही यह सवाल भी उठाया गया है कि क्या प्रारंभिक रिपोर्ट में तकनीकी कारणों को खारिज करने और बोइंग को क्लीन चिट देने से पहले इन संदेशों की जांच की गई थी? यह लेख लिखे जाने तक ACARS आंकड़ों का कोई सार्वजनिक विश्लेषण जारी नहीं किया गया है.
ब्लैक बॉक्स का सवाल
फ्लाइट रिकॉर्डर को लेकर सरकार के रवैये ने भी भ्रम बढ़ाया है. दुर्घटना के बाद मीडिया रिपोर्टों में कहा गया था कि ब्लैक बॉक्स को डेटा रिकवरी के लिए विदेश भेजा जा सकता है. 24 जून को नागरिक उड्डयन मंत्री ने कहा था कि उपकरण भारत में ही है और इसकी जांच देश में की जा रही है.
हालांकि 26 जून को मंत्रालय ने पुष्टि की कि दोनों रिकॉर्डर दिल्ली लाए गए थे और AAIB तथा अमेरिकी राष्ट्रीय परिवहन सुरक्षा बोर्ड (NTSB) के अधिकारियों की मौजूदगी में उनका डेटा सफलतापूर्वक डाउनलोड किया गया था.
आम लोगों को कई दिनों तक यह बताया गया कि भारत पूरी प्रक्रिया स्वयं संभालने में सक्षम है जबकि अमेरिकी जांचकर्ताओं की मौजूदगी इस सरकारी दावे के विपरीत थी. यह सवाल अब भी बना हुआ है कि भारतीय जांचकर्ताओं द्वारा डेटा का पूरा विश्लेषण किए बिना प्रारंभिक निष्कर्ष विदेशी मीडिया तक क्यों पहुंचे? इससे जांच की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं.
वह गवाह जो इंतजार करता रहा
जांच के मानकों के मुताबिक, सबसे गंभीर चूकों में से एक यह रही कि विमान के एकमात्र जीवित बचे यात्री से काफी समय बाद पूछताछ की गई. 40 वर्षीय ब्रिटिश नागरिक विश्वास कुमार रमेश AI-171 के अंतिम क्षणों के एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी थे. फिर भी AAIB ने उनसे औपचारिक पूछताछ 29 मार्च 2026 को की, यानी दुर्घटना के नौ महीने से अधिक समय बाद.
22 मई 2026 के एक पत्र में ब्रिटेन की एयर एक्सीडेंट्स इन्वेस्टिगेशन ब्रांच ने बताया कि भारतीय जांचकर्ताओं ने रमेश का बयान लेने में सहायता के लिए उनसे कोई अनुरोध नहीं किया था जबकि रमेश ब्रिटिश नागरिक हैं. रमेश ने पिछले वर्ष अस्पताल के बिस्तर से मीडिया को बताया था कि उड़ान भरने के तुरंत बाद ऐसा लग रहा था कि विमान हवा में अटका हुआ है. इसके बाद विमान में हरी और सफेद रोशनियां टिमटिमाने लगी थीं.
यही वे महत्वपूर्ण बातें हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है. रोशनियों का टिमटिमाना, विमान के इंजन में ऊर्जा की कमी का एहसास और केबिन की स्थिति जैसी जानकारियों पर अनुभवी जांचकर्ताओं को दुर्घटना के शुरुआती हफ्तों में ही विस्तार से जानकारी जुटानी चाहिए थी.
2009 में अमेरिकी एयरवेज की फ्लाइट 1549 की हडसन नदी में आपात लैंडिंग के मामले में NTSB ने दुर्घटना के कुछ दिनों के भीतर ही कैप्टन चेस्ली सली सुलेनबर्गर से पूछताछ कर ली थी. बाद में NTSB ने विस्तृत फ्लाइट सिम्युलेटर परीक्षण किए और निष्कर्ष निकाला कि सुलेनबर्गर का फैसला सही था.
उस मामले में सच्चाई का पता सिम्युलेटर ने लगाया था अटकलों ने नहीं. AI-171 की आखिरी 32 सेकंड की उड़ान के घटनाक्रम का ऐसा कोई सिम्युलेशन अब तक सामने नहीं आया है. सिम्युलेशन कंप्यूटर पर घटना की हूबहू कॉपी करने की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके जरिए किसी तकनीकी खामी का पता लगाया जाता है. रंधावा ने इस चूक की ओर सीधे इशारा करते हुए कहा, "यह महज 32 सेकंड की उड़ान थी और आपने इसमें इतना समय लगा दिया. इतनी ऊर्जा बर्बाद हो गई. फिर भी कोई निष्कर्ष नहीं निकला."
अंतिम रिपोर्ट
जांच की शुरुआती अवस्था में, जब AAIB ने अभी-अभी अपनी जांच शुरू की थी, तब ही Boeing, Honeywell और GE - इन तीन अमेरिकी कंपनियों को लगभग दोषमुक्त मान लिया गया. जबकि FIP जिस 'इलेक्ट्रिकल थ्योरी' को आगे बढ़ा रहा था, उसमें सबसे अधिक संदेह इन्हीं कंपनियों के सिस्टमों पर जाता था. इस मुद्दे को FIP लगातार उठा रहा है. FIP का सवाल सीधा है कि क्या इन कंपनियों को क्लीन चिट देने से पहले ACARS संदेशों की जांच भी की गई थी?
रंधावा की मांग सरल है. उन्होंने कहा, "सच्चाई सामने आनी चाहिए और लोगों को न्याय मिलना चाहिए." उनका कहना है कि अधूरी या जल्दबाजी में तैयार रिपोर्ट केवल घावों को और गहरा करेगी. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के एनेक्स 13 का उल्लेख किया, जिसके मुताबिक अंतिम रिपोर्ट जारी करने से 30-60 दिन पहले उसका मसौदा सभी संबंधित पक्षों के साथ साझा किया जाना चाहिए. साथ ही अगर सबूतों के लिए अधिक समय चाहिए तो अंतिम रिपोर्ट जारी करने की कोई अनिवार्य एक-वर्षीय समयसीमा नहीं होनी चाहिए.
उन्होंने कहा कि भारत के 260 मृतकों और उनके परिवारों को किसी ऐसी रिपोर्ट की आवश्यकता नहीं है जो केवल बरसी के अवसर पर औपचारिकता निभाने के लिए जारी की जाए. उन्हें ऐसी रिपोर्ट चाहिए, जो यह बताए कि क्या किसी इलेक्ट्रिक फैल्योर की वजह से इंजन खुद ही बंद हो गया था? क्या ACARS का डेटा, जो बोइंग और एयर इंडिया के पास था, दबा दिया गया या उसकी अनदेखी की गई? क्या केबिन में हरी और सफेद रोशनियों के टिमटिमाने को लेकर विश्वास कुमार रमेश का बयान वास्तव में फेल हो रहे इलेक्ट्रिक सिस्टम का आखिरी संकेत था? इन सवालों को उठाते हुए रंधावा कहते हैं कि पीड़ितों को अटकलें नहीं, जवाब मिलने चाहिए.