NEET का ऑनलाइन मोड : छात्रों को क्या फायदा हो सकता है और क्या नुकसान?

एक्सपर्ट चेतावनी देते हैं कि NEET को ऑनलाइन कर देना परीक्षा की निष्पक्षता की गारंटी नहीं है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

देश की सबसे प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में से एक NEET-UG पिछले कुछ समय से विवादों में घिरी है. अब 2027 से यह परीक्षा OMR शीट के बजाय कंप्यूटर से कराए जाने की तैयारी हो रही है. यह बदलाव NEET-2024 से जुड़े बड़े विवाद और उसके बाद बनाई गई के.

राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों के आधार पर किया जा रहा है.  विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव मूल रूप से NEET जैसी बेहद महत्वपूर्ण परीक्षा में छात्रों और लोगों का विश्वास बहाल करने के लिए है जिसमें हर साल 22 लाख से ज्यादा छात्र शामिल होते हैं.

NEET ऑफलाइन पेन-एंड-पेपर मोड में ही होती आई है. काले बॉलपेन से OMR शीट पर गोले भरना मेडिकल परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए एक परिचित रस्म जैसा बन गया था. अब यह पूरा सिस्टम बदल जाएगा.

ऑनलाइन एसेसमेंट कंपनी 'हायरमी' के चीफ बिजनेस ऑफिसर वेंकटरमन उमाकांत के मुताबिक, “सरकार CBT (कंप्यूटर आधारित परीक्षा) इसलिए ला रही है क्योंकि पुरानी पेन-पेपर वाली परीक्षा में पेपर लीक होने का खतरा ज्यादा था.” कंप्यूटर वाली परीक्षा में पेपर छापने और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह भेजने की जरूरत ही खत्म हो जाएगी इसलिए पेपर लीक की संभावना बहुत कम हो जाएगी.

हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि सिर्फ तकनीक बदल देने से परीक्षा की निष्पक्षता की गारंटी नहीं मिल सकती. NEET तैयारी कराने वाले प्लेटफॉर्म डॉ. आनंद मणि रेजिडेंशियल कोचिंग और मेंटरबॉक्स एआई के संस्थापक डॉ. आनंद मणि कहते हैं, “अगर सोर्स यानी जहां सवाल तैयार हो रहे हैं वहीं खामी है तो सिर्फ डिलीवरी का तरीका बदलने से समस्या हल नहीं होगी. ऐसे में सवाल बनाने की प्रक्रिया में बहुत मजबूत निगरानी, विकेंद्रीकरण और जवाबदेही होनी चाहिए.”

दोनों विशेषज्ञों का जोर है कि सुधार सिर्फ कागज को स्क्रीन से बदलने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. इसके अलावा, सुरक्षित पेपर बनाने की व्यवस्था, सख्त नियम और लगातार निगरानी भी उतनी ही जरूरी हैं. सबसे बड़ी चुनौती परीक्षा के कई शिफ्ट्स में निष्पक्षता बनाए रखने की भी होगी.

वर्तमान में NEET एक ही सत्र में OMR शीट पर होती है लेकिन CBT फॉर्मेट में इतने ज्यादा छात्रों और सीमित परीक्षा केंद्रों के कारण परीक्षा कई सत्रों में करनी पड़ेगी. इससे एक नई समस्या पैदा हो गई है. डॉ. आनंद मणि कहते हैं, “अगर परीक्षा कई शिफ्ट में होगी तो सभी शिफ्ट में प्रश्नों की कठिनाई का स्तर बिल्कुल बराबर रखना बेहद मुश्किल हो जाएगा.”

ऐसे में NTA को JEE Main की तरह नॉर्मलाइजेशन का तरीका अपनाना पड़ सकता है जिसमें हर शिफ्ट की कठिनाई और छात्रों के प्रदर्शन के आधार पर अंकों को समायोजित किया जाता है. यही सबसे बड़ी चिंता की बात है. वेंकट रामन उमाकांत कहते हैं, “इस प्रक्रिया में एक ही नंबर वाले दो छात्रों की रैंक बहुत अलग-अलग हो सकती है. NEET में छोटा सा फर्क भी रैंक में हजारों नंबर का अंतर कर सकता है.”

इसलिए विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से नहीं की गई तो अदालती मामलों की संख्या और जनता की आलोचना बहुत बढ़ जाएगी. डॉ. आनंद मणि कहते हैं, “हम पहले ही JEE Main जैसी परीक्षाओं में छात्रों को शिकायत करते देख चुके हैं कि एक शिफ्ट आसान थी और दूसरी बहुत कठिन. NEET में हर चार नंबर के अंतर से एडमिशन पर बड़ा फर्क पड़ सकता है इसलिए निष्पक्षता न होने की आशंका मात्र से भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं."

दोनों विशेषज्ञों का मानना है कि NTA की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह होगी कि सभी शिफ्ट में सवालों की क्वालिटी एक समान हो, कठिनाई का स्तर बराबर रहे और रैंकिंग का तरीका पूरी तरह पारदर्शी हो. शहरी छात्र तो अब ऑनलाइन मॉक टेस्ट के जरिए तैयारी कर रहे हैं लेकिन लाखों NEET की तैयारी कर रहे छात्र अभी भी हैंडरिटन नोट्स, किताबों और ऑफलाइन कोचिंग क्लासों के भरोसे तैयारी करते हैं.

ग्रामीण इलाकों या कम डिजिटल सुविधा वाले छात्रों के लिए असली चुनौती कंप्यूटर स्क्रीन हो सकती है. वेंकट रामन उमाकांत कहते हैं, “बहुत से छात्रों को कंप्यूटर और CBT इंटरफेस का ज्यादा अनुभव नहीं होता. ऐसे में उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से नुकसान हो सकता है.” डॉ. आनंद मणि भी इससे सहमत हैं. उन्होंने जोर देकर कहा, “कुछ छात्रों के लिए NEET पहली बार ऐसा मौका हो सकता है जब वे परीक्षा में कंप्यूटर के सामने बैठेंगे. यह उनके साथ अन्याय होगा.”

डॉ. आनंद मणि के मुताबिक, “NTA और एडटेक कंपनियों को हाथ से हाथ मिलाकर काम करना होगा. छात्रों को पहले से ठीक वैसा ही अभ्यास करना चाहिए जैसा असली परीक्षा में होगा. इंटरफेस कैसे चलाना है, जवाब कैसे मार्क करें, रिव्यू कैसे करें और समय पर कैसे सभी सवालों का जवाब दें, सबकुछ पहले से बताना होगा."

यह बदलाव छात्रों के व्यवहार और तैयारी के तरीके को भी बदल सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि CBT फॉर्मेट OMR वाली परीक्षा की कुछ कमियों को कम कर सकता है. छात्रों को अब गोले भरने में समय बर्बाद नहीं करना पड़ेगा. डॉ. आनंद मणि कहते हैं, “CBT मोड में छात्र 10-15 मिनट तक का समय बचा सकते हैं, जो पहले OMR शीट पर गोले भरने में लग जाता था.”

जो छात्र कई सालों से पेन-पेपर वाली तैयारी करते आए हैं उन्हें कंप्यूटर परीक्षा में शुरू में दिक्कत हो सकती है. जो नए छात्र पहले से ही कंप्यूटर और डिजिटल दुनिया में रहते हैं, वे जल्दी आराम से परीक्षा दे सकेंगे. इन बदलावों की कोशिश के बीच छात्र थोड़ी सावधानी के साथ उम्मीद लगाए बैठे हैं.

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