पुतिन-जिनपिंग की नजदीकी से भारत-अमेरिका बेचैन क्यों?

बीसवीं सदी के बड़े हिस्से में चीन और सोवियत रूस के बीच संबंधों में विश्वास कम, संदेह अधिक था लेकिन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया उन्हें धीरे-धीरे करीब ले आई

Putin with Xi Jinping
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बीजिंग में मुलाकात

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बीजिंग पहुंचे. चीनी सैनिक सावधान मुद्रा में खड़े थे. सैन्य बैंड दोनों देशों के राष्ट्रगान बजा रहा था. छोटे-छोटे बच्चे झंडियां लहराते हुए 'वेलकम, वेलकम' चिल्ला रहे थे. शी जिनपिंग ने पुतिन का स्वागत उसी 'ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल' में किया, जहां कुछ दिन पहले डोनाल्ड ट्रंप बैठे थे.

दृश्य केवल कूटनीति का नहीं था. शक्ति संतुलन का प्रदर्शन भी था. जैसे चीन दुनिया को यह बताना चाहता हो कि वह किसी एक ध्रुव का हिस्सा नहीं है. बहुध्रवीय विश्व में स्वयं भी एक ध्रुव है. वह एक ही सप्ताह में अमेरिका और रूस, दोनों के राष्ट्रपतियों की मेजबानी कर सकता है और दोनों से समान आत्मविश्वास के साथ बात कर सकता है.

दरअसल, 2026 में चीन-रूस संबंधों को समझने का सबसे सही दृश्य शायद यही है. दो साम्राज्यवादी स्मृतियों वाले राष्ट्र जो इतिहास में कभी प्रतिद्वंद्वी थे, आज 'ट्रीटी ऑफ गुड नेबरलिनेस एंड फ्रेंडली कोऑपरेशन' की 25वीं सालगिरह पर साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं. न पूरी तरह मित्र. न पूरी तरह विरोधी. न औपचारिक सहयोगी. फिर भी इतने निकट कि पूरी दुनिया उनकी ओर देख रही है.

संदेह से साझेदारी तक की यात्रा

बीसवीं सदी के बड़े हिस्से में चीन और सोवियत रूस के बीच संबंधों में विश्वास कम, संदेह अधिक था. दोनों कम्युनिस्ट थे लेकिन दोनों की कल्पना अलग थी. माओ का चीन और सोवियत संघ कई बार वैचारिक और सैन्य टकराव के कगार तक पहुंचे.

4300 किलोमीटर लंबी साझा सीमा तनाव-सहयोग की रेखा बनी रही. संदेह की दीवार की तरह. शीत युद्ध के दौरान दोनों देशों के बीच सीमा विवाद इतना गहरा गया कि दुनिया को आशंका होने लगी कि दोनों शक्तियां किसी विनाशकारी युद्ध में न उतर पड़ें. लेकिन इतिहास अक्सर विचारधारा के साथ परिस्थितियों से भी बदलता है.

साल 1991 में सोवियत संघ टूट गया. रूस आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता में फंस गया. दूसरी ओर चीन आर्थिक उदय की ऐसी यात्रा पर निकल चुका था, जिसने आने वाले दशकों में पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था का नक्शा बदल दिया.

बीते तीन-चार दशकों में चीन सैन्य के साथ-साथ आर्थिक मोर्चे पर बड़ी तेजी से मजबूत हुआ है

धीरे-धीरे दोनों देशों ने महसूस किया कि अमेरिकी-प्रधान वैश्विक व्यवस्था में उनके हित कई जगह एक-दूसरे से टकराने के बजाए मिलते हैं.

साल 2001 में 'ट्रीटी ऑफ गुड नेबरलिनेस एंड फ्रेंडली कोऑपरेशन' पर हस्ताक्षर हुए. यह किसी वैचारिक भाईचारे का समझौता नहीं था. यह व्यावहारिक राजनीति का दस्तावेज था. एक ऐसी साझेदारी, जिसका आधार थाः साझी भू-राजनीतिक चिंता और पश्चिमी दबाव का साझा अनुभव.

फिर 2022 का साल आया. रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया. पश्चिमी देशों ने रूस पर एक के बाद एक कई प्रतिबंध लगाए. यूरोपीय बाजार उसके लिए बंद हो गए. तकनीकी आपूर्ति रुक गई. रूस अचानक अंतरराष्ट्रीय अलगाव में धकेल दिया गया. और तब मॉस्को ने मुड़कर बीजिंग की ओर देखा.

असमान रिश्ते की जटिलता

विश्लेषक मानते हैं कि वैश्विक प्रभाव के बावजूद यह रिश्ता बराबरी का नहीं है. चीन, रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है लेकिन रूस चीन के कुल व्यापार का पांच प्रतिशत भी नहीं है. चीन की अर्थव्यवस्था रूस से कई गुना बड़ी है.

जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में रूसी एवं मध्य एशियाई केंद्र में प्रो. संजय पाण्डेय कहते हैं कि जैसी तत्परता रूस की है, वैसी चीन की नहीं दिखती. रूस-यूक्रेन युद्ध को चार साल हो चुके हैं लेकिन नतीजे रूसी अनुमान के विपरीत हैं. प्रतिबंधों के बीच कोई देश बहुत समय तक नहीं रह सकता इसलिए उसे निकटतम पड़ोसी चीन की ओर देखना पड़ा.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार रूस अपनी प्रतिबंधित तकनीकी ज़रूरतों का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चीन से ले रहा है. वे तकनीकी पुर्जे भी, जो यूक्रेन युद्ध में उसके सैन्य ढांचे के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं.

रूस का SU-57 फाइटर जेट. अब रूस कई तरह के सैन्य कलपुर्जे भी चीन से मंगा रहा है

कार्नेगी रशिया यूरेशिया सेंटर के विश्लेषक अलेक्ज़ेंडर गाबुएव ने वाशिंगटन पोस्ट में लिखा, “रूस के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों को नजरअंदाज करने की क्षमता अगर किसी एक देश में है तो वह चीन है. दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ) की सप्लाई के जरिए अमेरिका पर उसका अपना दबाव और प्रभाव है. पुतिन अब उस स्थिति में नहीं हैं कि शी को बता सकें कि चीन को क्या करना चाहिए. चीन का पलड़ा बहुत भारी है.”

यहां दिलचस्प बात यह है कि चीन यूक्रेन की ड्रोन इंडस्ट्री का भी सप्लायर है. जाहिर है रूस नहीं चाहेगा कि चीन यूक्रेन को आपूर्ति करे. वहीं चीन भी रूस के युद्ध चक्र में फंसना नहीं चाहेगा. फिर भी रूस के पास कुछ ऐसा है जिसकी चीन को बेहद ज़रूरत है. ऊर्जा.

पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता, ईरान के आसपास युद्ध का माहौल और होर्मुज संकट ने चीन की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं. ऐसे समय में रूस चीन को रियायती दरों पर तेल और गैस दे रहा है. पॉवर ऑफ साइबेरिया-2 गैस पाइपलाइन जो वर्षों से अटकी हुई थी, अब फिर आगे बढ़ती दिख रही है.

चीन के लिए यह केवल व्यापार नहीं, रणनीतिक सुरक्षा है. इसके अलावा यूक्रेन का युद्ध आधुनिक सैन्य तकनीक की जीवित प्रयोगशाला बन चुका है. वह बता रहा है कि ड्रोन कैसे युद्ध बदल रहे हैं, प्रतिबंधों के बीच अर्थव्यवस्था कैसे चलती है और पश्चिमी हथियारों का मुकाबला कैसे किया जाता है. ताइवान को लेकर चीन की अपनी चिंताएं हैं और यूक्रेन उसके लिए केवल एक युद्ध नहीं, एक अध्ययन भी है.

दो अतियों के बीच

पश्चिमी विश्लेषण अक्सर इस रिश्ते को दो अतियों में बांट देता है. या तो इसे 'तानाशाहियों का गठबंधन' कहा जाता है या 'मजबूरी की दोस्ती' जो कभी भी टूट सकती है. लेकिन सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं है. चीन ने यूक्रेन युद्ध का खुला समर्थन नहीं किया. रूस ने ताइवान को लेकर चीन के हर दावे पर सैन्य प्रतिबद्धता नहीं दिखाई. दोनों ने अपने रिश्ते को इतनी लचक के साथ बनाए रखा है कि वे एक-दूसरे के साथ भी रह सकें और अपनी स्वतंत्रता भी बचाए रखें.

रूस ने अभी भी ताइवान के मामले में चीन के साथ सैन्य सहयोग का वादा नहीं किया है

लेकिन यह भी सच है कि संयुक्त सैन्य अभ्यास लगातार बढ़ रहे हैं. 'सी ऑफ जापान' में अभ्यास हों या सामरिक सहयोग, दोनों देशों ने धीरे-धीरे जता दिया है कि वे केवल आर्थिक साझेदार नहीं हैं.

उनके बीच एक और समानता है, शासन की शैली. इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र में दोनों कई बार एक-दूसरे पर चुप्पी साध लेते हैं. रूस शिनजियांग पर चीन की आलोचना नहीं करता, चीन रूस से जुड़े मामलों जैसे यूक्रेन आक्रमण पर मुंह नहीं खोलता. यह संबंध केवल हितों का नहीं, सत्ता-प्रणालियों की समानता का भी है.

अमेरिका : कितना दूर-कितना पास

इस पूरी कहानी में अमेरिका की भूमिका गजब की है. अमेरिका का दबाव ही चीन और रूस को करीब ला रहा है लेकिन वही दबाव चीन को इतना सतर्क भी बनाए हुए है कि वह रूस के साथ पूरी तरह खड़ा नहीं हो सकता.

डोनाल्ड ट्रंप की अप्रत्याशित विदेश नीति ने इस समीकरण को जटिल बना दिया है. ट्रंप कुछ दिन पहले बीजिंग गए. फिर पुतिन पहुंचे. शी जिनपिंग दोनों से अलग-अलग अंदाज में मिले लेकिन संदेश एक ही था, चीन किसी का स्थाई मित्र या शत्रु नहीं बल्कि अपने आप में एक शक्ति है.

पुतिन से ठीक कुछ दिन पहले डोनाल्ड ट्रंप चीन पहुंचे थे

जेएनयू में रूसी एवं मध्य एशियाई केंद्र के प्रो. संजय पाण्डेय कहते हैं कि चीन बार-बार यह दिखा रहा है कि वह अब सत्ता का केंद्र है. यही कारण है कि ट्रंप जिस तेवर के साथ दूसरे नेताओं से मिलते हैं, चीन में उनके तेवर वैसे नहीं थे. यूरोप के कई नेता चीन के दरवाजे पर जा चुके हैं और ट्रंप को चीन की शक्ति का अच्छे से अंदाजा है.

उधर चीन भी अमेरिका के साथ व्यापार और निवेश चाहता है. वह रूस के लिए पश्चिम से अपने सारे रास्ते बंद नहीं करेगा. इसलिए चीन लगातार संतुलन साधता दिखता है. रूस के साथ खड़ा भी है, दूरी भी बनाए है. कभी यह कल्पना की जाती थी कि अमेरिका चाहे तो रूस को चीन से अलग कर सकता है. अब यह कल्पना भी नहीं बची. चीन और रूस साथ रहें, इसके लिए साझा हितों की अब पर्याप्त वजहें हैं.

भारत की स्थिति

इस पूरे भू-राजनीतिक त्रिकोण में भारत की स्थिति सबसे जटिल है. भारत शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में चीन और रूस दोनों के साथ बैठता है. रूस से रक्षा उपकरण खरीदता है. यूक्रेन युद्ध के बाद सस्ते रूसी तेल का लाभ भी उठाता है. लेकिन चीन के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण हैं. सीमा विवाद, 2020 की गलवान झड़प और पाकिस्तान के साथ चीन की गहरी साझेदारी भारत की चिंताओं को लगातार बढ़ाती हैं.

इसी बीच भारत ने अमेरिका के साथ अपने संबंध भी मजबूत किए हैं. क्वाड (QUAD) समूह में उसकी सक्रियता बढ़ी है.

प्रो. संजय पाण्डेय के अनुसार भारत के लिए चीन-रूस की गहराती साझेदारी एक बेचैनी पैदा करेगी. वे कहते हैं, "2022 के बाद रूस का झुकाव चीन की ओर अधिक हो गया है. पहले वह भारत और चीन के रिश्तों में बैलेंस साधता था लेकिन अब अलग-अलग देखता है. वह भारत से नजदीकी तो रखेगा लेकिन चीन की कीमत पर नहीं. भारत ने अमेरिका के कहने पर रूसी तेल में कटौती की. इससे भी अच्छा संकेत नहीं गया."

लद्दाख में भारत-चीन नियंत्रण रेखा पर भारतीय और चीनी सैनिक

मतलब साफ है कि चीन की आर्थिक शक्ति और रूस की सैन्य क्षमता अगर लंबे समय तक एकसाथ बनी रहती है तो भारत के लिए नॉर्दर्न फ्रंट और जटिल हो सकता है. भारत रूस को नाराज भी नहीं कर सकता और चीन से सीधी टक्कर लेने की स्थिति में भी नहीं है. इसलिए भारत फिलहाल वही कर रहा है जो उसकी विदेश नीति दशकों से करती आई है. संतुलन. रूसी तेल भी खरीदना, अमेरिका से सैन्य सहयोग भी बढ़ाना और बहुध्रुवीय दुनिया में अपने लिए जगह भी बनाए-बचाए रखना.

टिक सकेगा संबंध?

अंततः इस रिश्ते की स्थिरता इस सरल से गणित पर टिकी है कि रूस और चीन दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है और फिलहाल उनके पास कोई बेहतर विकल्प नहीं है. दोनों नेता, दोनों देशों के बीच हुई संधि की 25वीं सालगिरह पर मिले हैं. हालांकि अंतरराष्ट्रीय मामलों के कई जानकार मानते हैं कि दोनों देश एक-दूसरे की छाया में रहना पसंद नहीं करेंगे इसलिए भविष्य में तनाव पैदा हो सकता है. 

फिलहाल तो शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन साम्राज्यवादी उद्यानों में साथ टहल रहे हैं. इतिहास और शक्ति पर बातचीत कर रहे हैं. साझेदारी का मजबूत भविष्य गढ़ रहे हैं. ऐसे में भारत और अन्य देशों को समझना होगा कि दुनिया जब पश्चिम बनाम पूर्व, लोकतंत्र बनाम अधिनायकवाद, मुक्त व्यापार बनाम आर्थिक राष्ट्रवाद जैसी कई दरारों में बंट रही है तब बीजिंग-वाशिंगटन के बाद बीजिंग-मॉस्को का यह समीकरण केवल कूटनीतिक समाचार की तरह नहीं पढ़ा जा सकता.

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