चीन-पाकिस्तान से निपटने के लिए भारतीय नौसेना को क्यों चाहिए स्कॉर्पीन पनडुब्बियां?
सैन्य विशेषज्ञ चाहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान भारतीय नौसेना के लिए तीन अतिरिक्त स्कॉर्पीन कैटेगरी की पनडुब्बियों की खरीद पर बातचीत पूरी हो जाए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 जून से 18 जून तक फ्रांस की यात्रा पर जा रहे हैं. इस दौरान वे G-7 समिट में भाग लेंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा से पहले राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर चर्चा तेज हो गई है.
उम्मीद जताई जा रही है कि इस यात्रा के दौरान राफेल डील पर कोई बड़ी घोषणा हो सकती है. इन सबके बीच कुछ रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को नौसेना के लिए तीन अतिरिक्त स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियों की डील को भी अंतिम रूप देने का प्रयास करना चाहिए.
पनडुब्बी डील की घोषणा सबसे पहले जुलाई 2023 में हुई थी जब बैस्टिल दिवस समारोह के लिए प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस गए थे. जनवरी 2025 से यह प्रस्ताव कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की मंजूरी की प्रतीक्षा कर रहा है. इसी बीच खबर है कि अगली पीढ़ी के पारंपरिक पनडुब्बी कार्यक्रम, प्रोजेक्ट 75(I) के लिए रक्षा मंत्रालय तकनीकी बातचीत के अपने आखिरी चरण में है.
इस परियोजना में मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) के जरिए जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS AG & Co.) के साथ साझेदारी में छह पनडुब्बियां बनाने पर बात हो रही है.
हालांकि MDL के जरिए हाल ही में भारत-फ्रांस पनडुब्बी कार्यक्रम के तहत छह कलवरी-श्रेणी की पनडुब्बियों का निर्माण पूरा कर लिया है. अब नौसेना रणनीतिकारों का तर्क है कि मौजूदा उत्पादन प्रणाली, प्रशिक्षित कार्यबल और स्थापित आपूर्ति श्रृंखला का लाभ उठाकर तीन अतिरिक्त स्कॉर्पीन के लिए नए ऑर्डर जल्द मिल सकते हैं.
रक्षा अधिकारियों का कहना है कि प्रस्तावित पनडुब्बियां नौसेना की समुद्री लड़ाई की क्षमता को मजबूत करेंगी. साथ ही इस क्षेत्र में एक नई उत्पादन लाइन शुरू करने से जुड़ी देरी से भी बचा जा सकेगा.
एक वरिष्ठ रक्षा अधिकारी ने बताया कि अगर फ्रांस के साथ ये डील होती है तो इस अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के छह साल के भीतर तीन अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियों की डिलीवरी की जा सकती है. इसके उलट प्रोजेक्ट 75(I) के तहत, भारत की खरीद प्रक्रिया की जटिलता और उत्पादन बुनियादी ढांचे को स्थापित करने में लगने वाले समय को देखते हुए, पहली जर्मन-डिजाइन पनडुब्बी की डिलीवरी में कम से कम एक दशक लगने की संभावना है.
विशेषज्ञों का कहना है कि जब भारतीय पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े का एक बड़ा हिस्सा अब पुराना हो चुका है, ऐसे में स्कॉर्पीन पनडुब्बियां आने से नौसेना को नए सिरे से मजबूती मिलेगी. रक्षा उद्योग से सूत्रों का यह भी कहना है कि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत की पिछली राजकीय यात्रा के दौरान फ्रांस सरकार के अधिकारियों ने प्रस्ताव दिया था कि इन हथियारों से जुड़े परीक्षण केंद्रों और बुनियादी ढांचों की सुविधाओं को बिना किसी अतिरिक्त लागत के उपलब्ध कराया जा सकता है.
प्रस्ताव के समर्थकों का तर्क है कि तीन अतिरिक्त पनडुब्बियों का ऑर्डर देने से भारत में पनडुब्बी क्षमता की कमी को तब तक के लिए पूरा किया जा सकता है जब तक अगली पीढ़ी की पनडुब्बी परियोजनाएं तेजी से आगे नहीं बढ़ जातीं. इससे मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) में पनडुब्बी निर्माण को लेकर विशेषज्ञता भी बनी रहेगी. साथ ही पूरी तरह से नई पनडुब्बी विकसित करने में लगने वाले समय और देरी के बिना, तेजी से और सस्ते में नौसेना की ताकत बढ़ाई जा सकेगी.
यह बहस ऐसे समय में हो रही है जब चीन और पाकिस्तान दोनों अपनी पनडुब्बी बेड़े को तेजी से आधुनिक बना रहे हैं. इससे भारत पर क्षेत्रीय समुद्री संतुलन बनाए रखने का दबाव बढ़ गया है. चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है और करीब 70 पनडुब्बियां हैं. इनमें परमाणु ऊर्जा से चलने वाली और आधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियां दोनों शामिल हैं. व्यापक रक्षा सहयोग के जरिए चीन पाकिस्तान की नौसेना क्षमता, खासकर पानी के नीचे की लड़ाई की क्षमता को बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभा रहा है.
इस साझेदारी में एक बड़ा मील का पत्थर 30 अप्रैल को रखा गया जब पाकिस्तान ने चीन के सान्या में अपनी पहली हैंगोर-क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक पनडुब्बी को औपचारिक रूप से कमीशन किया. इस समारोह में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और नौसेना प्रमुख एडमिरल नावेद अशरफ भी मौजूद थे.
पाकिस्तान चीन की मदद से 8 हैंगोर-क्लास पनडुब्बियों के विकास में लगा है. इनमें से चार पनडुब्बियां चीन में बनाई जा रही हैं जबकि बाकी चार पाकिस्तान में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत निर्माणाधीन हैं.
इस कार्यक्रम का रणनीतिक महत्व इस महीने की शुरुआत में तब स्पष्ट हुआ जब पाकिस्तानी नौसेना की नई AIP (वायु-स्वतंत्र प्रणोदन) से लैस हंगोर श्रेणी की पनडुब्बी, चीन निर्मित स्टील्थ युद्धपोतों के साथ कोलंबो पहुंची. इस तैनाती से पाकिस्तानी नौसेना की पनडुब्बियां भारतीय समुद्री सीमा से 130 समुद्री मील से भी कम दूरी पर आ गईं. इससे भारतीय नौसेना के रणनीतिकारों का ध्यान इस ओर गया.
भारत के लिए इस घटनाक्रम ने न केवल पाकिस्तान की बढ़ती पनडुब्बी युद्ध क्षमता को उजागर किया, बल्कि उत्तरी हिंद महासागर में समुद्री शक्ति का प्रदर्शन करने में इस्लामाबाद को सक्षम बनाने में चीनी मदद की बढ़ती भूमिका को भी उजागर किया.
भारत की नौसेना सेना एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रही है. नौसेना के पास 17 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं, जिनमें से कई पुरानी किलो श्रेणी (सिंधुघोष श्रेणी) और शिशुमार श्रेणी की पनडुब्बियां हैं. ये पुरानी पनडुब्बियां आखिरी दौर में है. इनमें से कई पनडुब्बियों के अगले दशक में सेवामुक्त होने की उम्मीद है जबकि लंबे समय तक चलने वाले मेंटेनेंस साइकल के कारण इनकी परिचालन क्षमता और भी प्रभावित होती है. इस कारण ये पनडुब्बियां लंबे समय तक सेवा से बाहर रहती हैं.
हालांकि छह कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियों के शामिल होने से नौसेना मजबूत हुई है लेकिन अब भी पड़ोसी देशों की बढ़ती क्षमता को देखकर इसे और ताकतवर व मजबूत बनाने की जरूरत है. इन चुनौतियों से निपटने के लिए नौसेना ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की स्वदेशी AIP प्रणाली को स्कॉर्पीन बेड़े में शामिल करना शुरू कर दिया है.
इस क्षमता से समुद्री लड़ाई में भारतीय नौसेना की ताकत में सुधार होने की उम्मीद है. इसी के बूते भारत हिंद महासागर क्षेत्र में जरूरत पड़ने पर चीन और पाकिस्तान के पनडुब्बी बलों के विस्तार और आधुनिकीकरण का जवाब देने में सक्षम होगा.