पिछले वित्त वर्ष में केंद्र सरकार 20 में 16 योजनाओं का पैसा ही खर्च नहीं कर पाई!
भारत सरकार ने हर साल की तरह इस बार भी बजट 2026 में सामाजिक योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपए खर्च करने की बात कही है, लेकिन सवाल है कि क्या यह पैसा वाकई खर्च हो पाएगा

1 फरवरी 2026 को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में करीब 53.47 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया. 'इंडियास्पेंड' वेबसाइट के मुताबिक, इस बार के बजट में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सामाजिक क्षेत्र के बजट का हिस्सा पिछले एक दशक में दूसरी बार सबसे कम यानी GDP का 2.5 फीसद है.
इससे पहले सिर्फ वित्त वर्ष 2024-25 और 2025-26 में ही सामाजिक क्षेत्र का बजट इससे कम यानी GDP का 2.3 फीसद था. एक तरफ सामाजिक क्षेत्रों से जुड़ी बजट कम हो रही है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक योजनाओं के लिए पास हुआ पैसा वापस लौट जा रहा है.
हमारी रिसर्च से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्र की 20 बड़ी सामाजिक योजनाओं में से 16 का पैसा खर्च हुए बिना वापस लौट गया. सिर्फ दो सामाजिक योजनाएं 'मनरेगा' और 'पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना' पर ही आवंटित पैसे से ज्यादा खर्च हुआ है. जबकि प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना का 40 फीसद से ज्यादा पैसा खर्च ही नहीं हो पाया.
बजट 2026 के सरकारी डॉक्यूमेंट्स से पता चलता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और गरीबी मिटाने के लिए जारी पैसे को खर्च करने में सरकार विफल साबित हुई है. ऐसे में जानते हैं कि आमलोगों की जिंदगी बदलने वाली इन योजनाओं पर सरकार घोषित की गई राशि खर्च क्यों नहीं कर पाई.
हमने जिन 20 सामाजिक योजनाओं पर रिसर्च की, उनमें पीएम पोषण, आयुष्मान भारत, पीएम शहरी आवास योजना 2.0, स्वच्छ भारत मिशन, एसबीएम ग्रामीण योजना, पीएम अनुसूचित जाति अभियान, पीएम वनबंधु कल्याण योजना, मिशन शक्ति, मिशन वात्सल्य, पीएम ग्राम सड़क योजना, समग्र शिक्षा अभियान जैसे प्रमुख योजनाएं भी शामिल हैं.
तीन से चार योजनाओं को अगर छोड़ दिया जाए, तो इनमें से ज्यादातर योजनाओं के पैसे वापस सरकारी खजाने में लौट गए हैं.
इन योजनाओं पर कुल कितना पैसा आवंटित हुआ और कितना वापस लौटा?
इन सभी 20 सामाजिक योजनाओं पर केंद्र सरकार ने पिछले बजट में कुल 6.21 लाख करोड़ रुपए आवंटित किए थे. इनमें से 5.30 लाख करोड़ रुपए सरकार ने खर्च कर दिए. इस तरह कुल 90 हजार करोड़ से ज्यादा पैसा सरकार के खजाने में वापस लौट गया.
अगर सरकार पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना और मनरेगा पर अतिरिक्त 27 हजार करोड़ रुपए नहीं खर्च करती तो सरकारी खर्च का यह आंकड़ा और कम होता.
हैरानी की बात तो ये है कि जल जीवन मिशन जैसी महत्वपूर्ण योजना पर सरकार ने खर्च करने के लिए 67,000 करोड़ रुपये आवंटित किए थे, लेकिन 25 फीसद भी खर्च नहीं हुए. बजट के आंकड़ों से पता चलता है कि सरकार ने इस योजना पर केवल 17,000 करोड़ रुपये ही खर्च किए हैं.
जिन योजनाओं के पैसा वापस लौट गए, वे आम लोगों के लिए कितनी अहम?
भारत सरकार जिन सामाजिक योजनाओं पर पिछले साल सबसे कम खर्च कर पाई, उनमें जल जीवन मिशन, आयुष्मान भारत योजना, आयुष्मान भारत इंफ्रा योजना, पीएम ग्रामीण और शहरी आवास योजना आदि.
अगर जल जीवन मिशन की ही बात करें तो 2019 में लागू होने वाली इस योजना का उद्धेश्य हर घर तक शुद्ध पानी पहुंचाना है. इससे ना सिर्फ प्रदूषित पानी पीने से होने वाली बीमारी को रोका जा सकता है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होने वाले पैसे को बचाया जा सकता है.
एक रिपोर्ट मुताबिक, करीब 38 लाख भारतीय हर साल पानी के कारण होने वाली बीमारियों के शिकार होते हैं. वहीं, हर साल करीब 15 लाख बच्चे डायरिया से मर जाते हैं.
इसके अलावा, इंदौर की हाल की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्वच्छ नल जल की उपलब्धता कितनी महत्वपूर्ण है, फिर भी इसे प्राथमिकता नहीं दी गई है. ऐसे में जल जीवन मिशन का पैसा बिना खर्च हुए लौटना बेहद चिंताजनक है.
इसी तरह आयुष्मान भारत इंफ्रा के जरिए सरकार ने अस्पताल और दूसरी सुविधाओं के लिए 4200 करोड़ रुपए आवंटित किए थे. लेकिन, 2400 करोड़ रुपए ही खर्च हो पाए. जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी अपने देश की स्थिति किसी से छिपी नहीं है.
हर सरकारी अस्पताल में मरीजों की लंबी लाइनें लगती है. कई बार तो गंभीर बीमारियों वाले मरीजों को इलाज के लिए महीनों इंतजार करना होता है. इसके बावजूद सरकार के जरिए आवंटित पैसा वापस लौट जा रहा है.
इसी तरह महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए शुरू की गई मिशन शक्ति योजना में केंद्र सरकार के 1150 करोड़ रुपए वापस लौट गए. केंद्र सरकार ने पिछले साल पीएम सड़क योजना पर 19 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन सरकार सिर्फ 11 हजार करोड़ रुपए खर्च कर पाई. जबकि सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट किसी देश की इकोनॉमी में सबसे अहम भूमिका निभाता है. ऐसे में इन विभागों का पैसा वापस लौटना सरकार की विफलता को ही दिखाता है.
क्यों सरकारी योजनाओं के लिए आवंटित पैसे खर्च नहीं हो पाते?
भारत सरकार का बजट खासकर सामाजिक और केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं में पूरी तरह खर्च नहीं हो पाता, इसे अंडरस्पेंडिंग कहते हैं. यह समस्या लंबे समय से चली आ रही है और 2025-26 वित्त वर्ष में तो करीब 1 लाख करोड़ से ज्यादा सामाजिक योजनाओं के फंड्स इस्तेमाल में नहीं लाए जा सके.
पिछले एक दशक में अलग-अलग योजनाओं के लिए आवंटित बजट के वापस होने वाले पैसों का आंकड़ा चौंका देने वाला है.अकेले सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपी-लैड) में ही 16वीं लोकसभा के दौरान 1,734.42 करोड़ रुपये की राशि इस्तेमाल हुए बिना लौट गई, जो पिछली लोकसभा के मुकाबले दोगुने से भी अधिक था.
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर दीपा सिन्हा एक इंटरव्यू में बताती हैं कि सरकारी बजट का पैसा बिना खर्च हुए वापस लौट जाने की कई वजह हो सकती हैं. इनमें जटिल कागजी व्यवस्था बड़ी वजह है, इसके अलावा देरी से अप्रूवल, विभागों के बीच कोऑर्डिनेशन की कमी और रियल-टाइम ट्रैकिंग न होने से भी फंड रिलीज में देरी होती है.
कई एक्सपर्ट्स बताते हैं कि केंद्र की सख्त मॉनिटरिंग और पेचीदा नियमों के कारण ग्राउंड लेवल पर योजनाओं को लागू करने में स्पीड कम हो जाती है. इसके कारण भी खर्च हुए बिना पैसा वापस लौट जाती है.
2022 में सिंगल नोडल एजेंसी फ्रेमवर्क यानी SNA फ्रेमवर्क के तहक सभी योजनाओं से जुड़े फंड्स एक अकाउंट में जाते हैं और यहां से अगली किश्त तभी मिलती है, जब 75 फीसद पिछले फंड्स खर्च हो जाएं. हालांकि, कंप्लायंस में देरी से फंड ब्लॉक हो जाते हैं. कई मामलों में इस वजह से भी खर्च हुए बिना पैसा वापस लौट जाता है.
इसके अलावा, सामाजिक योजनाओं का पैसा खर्च नहीं होने का एक कारण केंद्र और राज्यों के बीच का टकराव भी है.
इस तरह की सरकारी नाकामियों का किसी देश के विकास पर क्या असर पड़ता है?
सामाजिक योजनाओं जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, गरीबी उन्मूलन, पोषण आदि पर पैसा खर्च न होने से देश को बहुत गंभीर आर्थिक, सामाजिक और मानव विकास संबंधी नुकसान होते हैं.
यह सिर्फ पैसा बचाने का मामला नहीं है, बल्कि मानव पूंजी का नुकसान है. अगर सही से पैसा सामाजिक योजनाओं पर खर्च नहीं हो तो लंबे समय में विकास का कार्य बाधित होता है.
विकासशील देशों में यह समस्या और भी गंभीर होती है, क्योंकि गरीबी, असमानता और कमजोर बुनियादी ढांचा पहले से ही चुनौतीपूर्ण हैं. इन योजनाओं पर पैसा खर्च न होने से लोगों की जिंदगी नहीं बदलती और गरीबी बनी रहती है. साथ ही देश की लंबी अवधि की आर्थिक मजबूती प्रभावित होती है.