CBSE का तीन-भाषा फॉर्मूला : राष्ट्रीय एकता का माध्यम या नई चुनौती?

अभिभावक तीन-भाषा नीति से बच्चों पर पड़ने वाले दबाव से चिंतित हैं तो विशेषज्ञों का सवाल है कि क्या यह सांस्कृतिक विविधता और शैक्षिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन साध सकती है

सांकेतिक तस्वीर

जब जुलाई में स्कूल दोबारा खुलेंगे तो पूरे भारत में कक्षा-9 के हजारों छात्रों को अपने टाइम टेबल में एक नई चीज़ दिखाई देगी : एक अनिवार्य तीसरी भाषा.

कुछ छात्रों के लिए यह पड़ोसी राज्य की भाषा सीखने, अपनी मातृभाषा से दोबारा जुड़ने या अपनी संस्कृति से अलग किसी नई संस्कृति को जानने का अवसर हो सकता है. 

वहीं कुछ के लिए यह पहले से ही व्यस्त शैक्षणिक कार्यक्रम में जुड़ा एक और विषय लग सकता है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप कक्षा-9 के छात्रों के लिए तीन-भाषा ढांचे को अनिवार्य बनाने के केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के फैसले ने एक बार फिर ऐसी बहस छेड़ दी है, जो कक्षाओं की सीमाओं से कहीं आगे जाती है.

भारत की भाषाई समृद्धि बेहद व्यापक है. हर कुछ सौ किलोमीटर पर लहजे बदल जाते हैं, लिपियां बदल जाती हैं और पूरी तरह अलग भाषाएं सामने आ जाती हैं. फिर भी कई छात्र अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान मुख्य रूप से अंग्रेजी और एक क्षेत्रीय भाषा तक ही सीमित रहते हैं.

सूरत के लांसर्स आर्मी स्कूल के CBSE सेक्शन की प्रिंसिपल प्रीति राजीव नायर कहती हैं, "भारत में 19,500 से अधिक भाषाएं और बोलियां हैं. कोई बच्चा यदि केवल दो भाषाओं तक सीमित रहता है तो वह इस देश के बेहद छोटे हिस्से को ही समझ पाता है. कक्षा-9 में तीसरी भाषा को अनिवार्य बनाने से माध्यमिक स्तर के छात्रों को उस उम्र में व्यवस्थित भाषाई अनुभव मिलता है जब भाषाई पहचान को आत्मसात करने की क्षमता सबसे अधिक होती है."

यह विचार आकर्षक लगता है. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में बहुभाषावाद को अक्सर समुदायों और संस्कृतियों के बीच एक पुल माना जाता है. कई अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि कई भाषाएं सीखने से संज्ञानात्मक लचीलापन, समस्या-समाधान की क्षमता और परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की क्षमता मजबूत होती है.

लेकिन शिक्षा नीतियां अलग-थलग नहीं होतीं. वे वास्तविक कक्षाओं में लागू होती हैं जहां वास्तविक छात्र होते हैं. इनमें से कई छात्र पहले से ही बोर्ड परीक्षा की तैयारी, कोचिंग कक्षाओं, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों और किशोरावस्था के दबावों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे होते हैं. यही वजह है कि अभिभावकों की पहली चिंताओं में एक सवाल यह था कि क्या तीसरी भाषा छात्रों पर अतिरिक्त तनाव बढ़ाएगी?

नायर का मानना है कि नीति में इस चिंता को दूर करने की कोशिश की गई है. तीसरी भाषा कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा का हिस्सा नहीं होगी और इसका मूल्यांकन स्कूल स्तर पर ही किया जाएगा. वे कहती हैं, "घोषित उद्देश्य सीखने पर ध्यान देना है, अंक हासिल करने पर नहीं."

फिर भी बड़ा सवाल बना हुआ है: क्या छात्र वास्तव में एक नई भाषा सीखेंगे या सिर्फ उसका अध्ययन करेंगे? विशेषज्ञों का कहना है कि बहुभाषी शिक्षा के लाभ काफी हद तक इस बात पर निर्भर करते हैं कि उसे कैसे पढ़ाया जाता है. बातचीत, कहानियों और सार्थक सहभागिता के माध्यम से सीखी गई भाषा सोचने के नए रास्ते खोल सकती है. लेकिन यदि भाषा केवल रटने और समय-समय पर होने वाली परीक्षाओं तक सीमित हो जाए तो वह रिपोर्ट कार्ड का एक और विषय बनकर रह सकती है.

नायर कहती हैं, "यदि तीसरी भाषा केवल सप्ताह में एक पीरियड और रटने वाले अभ्यासों तक सीमित रह जाए तो उससे बहुत कम सुधार होगा. महत्वपूर्ण यह है कि पढ़ाने का तरीका बातचीत, समझ, पढ़ने और लिखने के माध्यम से वास्तविक दक्षता विकसित करे."

भारत की अलग-अलग स्कूली व्यवस्थाओं को देखते हुए यह चुनौती और जटिल हो जाती है. संसाधनों से समृद्ध किसी शहरी स्कूल में छात्रों को प्रशिक्षित शिक्षक और कई भाषा विकल्प मिल सकते हैं. लेकिन किसी छोटे शहर के ऐसे स्कूल में, जहां पहले से ही शिक्षकों की कमी हो, एक और भाषा शुरू करना कहीं अधिक कठिन हो सकता है.

नायर कहती हैं, "शिक्षकों की कमी वास्तविक समस्या है. नीति स्तर पर अच्छी मंशा अपने-आप कक्षा-9 के लिए योग्य शिक्षकों में नहीं बदल जाती."

यह चिंता अब बहस का प्रमुख हिस्सा बन चुकी है. समर्थक और आलोचक दोनों मानते हैं कि सफलता नीति की घोषणा पर नहीं बल्कि उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी. मजबूत भाषाई पहचान वाले राज्यों, खासकर दक्षिण भारत में, इस मुद्दे पर कई सवाल उठे हैं. हालांकि इस ढांचे में छात्रों को तीसरी भाषा चुनने की स्वतंत्रता दी गई है और हिंदी अनिवार्य नहीं है, लेकिन कुछ लोगों को चिंता है कि शिक्षकों की कमी के कारण व्यवहार में विकल्प सीमित हो सकते हैं.

नायर कहती हैं, "चिंता इस बात की है कि क्या स्कूल वास्तव में सार्थक विकल्प देंगे या व्यावहारिक कठिनाइयां चुपचाप उन विकल्पों को सीमित कर देंगी." यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि भाषा केवल एक विषय नहीं होती. वह इतिहास, संस्कृति, स्मृतियों और अपनापन भी साथ लेकर चलती है. कई परिवारों के लिए भाषा से जुड़ी चर्चाएं बेहद व्यक्तिगत होती हैं.

नीति के समर्थकों का तर्क है कि किसी अन्य भारतीय भाषा को सीखने से राष्ट्रीय एकता मजबूत हो सकती है क्योंकि इससे छात्र अपने क्षेत्र से बाहर के लोगों और इलाकों से जुड़ पाते हैं. आलोचकों का कहना है कि ऐसा तभी संभव होगा जब हर छात्र को सार्थक विकल्पों तक समान पहुंच मिले.

नायर कहती हैं, "इस नीति की असली परीक्षा इसकी मंशा नहीं है. असली सवाल यह है कि क्या हर छात्र, चाहे वह कहीं भी पढ़ता हो, वास्तव में अपनी पसंद का विकल्प चुनने का अनुभव करता है."

दिलचस्प बात यह है कि यह बहस ऐसे समय में हो रही है, जब स्कूल AI, कम्प्यूटेशनल थिंकिंग और भविष्य की जरूरतों से जुड़े अन्य कौशल भी शुरू कर रहे हैं. कुछ लोगों को भाषा सीखना और डिजिटल साक्षरता एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती प्राथमिकताएं लग सकती हैं.

लेकिन जैसे-जैसे AI डिवाइस भारतीय भाषाओं को समझने और उनमें सामग्री तैयार करने में अधिक सक्षम हो रही हैं, बहुभाषी क्षमता पुराना कौशल नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण संपत्ति बन सकती है. कई लोगों का मानना है कि भाषा में दक्षता और डिजिटल दक्षता साथ-साथ आगे बढ़ेंगी.

आखिरकार त्रि-भाषा ढांचा केवल एक और विषय जोड़ने का मामला नहीं है. यह इस बात से जुड़ा है कि भारत अपने भविष्य के नागरिकों की कैसी कल्पना करता है- ऐसे युवा, जो विभिन्न संस्कृतियों, समुदायों और विचारों के बीच सहजता से आगे बढ़ सकें.

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