रटंत विद्या से तर्क बुद्धि तक; CBSE पढ़ने-पढ़ाने के तरीके में कैसे बदलाव ला रहा?

2026-27 का पाठ्यक्रम याद करने की प्रमुखता वाली प्रणाली से हटकर सोचने, उसे लागू करने और ढलने की क्षमता को महत्व देने की दिशा में एक साहसिक कदम है

CBSE के सिलेबस में बदला राष्ट्रीय शिक्षा नीति के हिसाब से हो रहा है

किसी केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से संबद्ध स्कूल में कदम रखें और आपको बारीक बदलाव दिखने शुरू हो सकते हैं. परीक्षाएं और अंक अभी भी एक वास्तविकता हो सकते हैं और शिक्षक सिलेबस पर जोर देते दिख सकते हैं. फिर भी, इन सबके नीचे, सीखने के तरीके की व्यापक धारणा बदल रही है.

2026-27 के CBSE पाठ्यक्रम को रटने वाली प्रणाली से हटकर एक ऐसी प्रणाली की ओर निर्णायक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जो सोच, व्यावहारिक उपयोग और अनुकूलन क्षमता को महत्व देती है. यह न केवल छात्रों के पढ़ने के तरीके को, बल्कि दुनिया को समझने के उनके नजरिए को भी फिर से परिभाषित कर सकता है.

दशकों तक, स्कूल में सफलता का मतलब याद करने की कला में माहिर होना था. नोट्स, दोहराव और आखिरी समय में किया गया रिवीजन ही सीखने की परिभाषा थी. अब, उस मॉडल पर सवाल उठाए जा रहे हैं.

करियर काउंसलिंग फर्म 'IC3 मूवमेंट' के संस्थापक गणेश कोहली कहते हैं, "क्षमता-आधारित शिक्षा उस प्रणाली के लिए एक सुधार है, जिसने लंबे समय तक तर्क के बजाय याद रखने की क्षमता को पुरस्कृत किया है. अब छात्रों का मूल्यांकन उनकी सोचने, लागू करने और व्याख्या करने की क्षमता के आधार पर किया जाएगा."

इसका मतलब है कि परीक्षाएं भी बदल रही हैं. अब मूल्यांकन के लगभग 50 प्रतिशत प्रश्न क्षमता-केंद्रित (केस-आधारित, डेटा-संचालित और व्यवहारिक) होने के कारण, यह बदलाव संरचनात्मक है. अब सीखना केवल पाठ्यक्रम खत्म करने के बारे में नहीं है, बल्कि इसके साथ अर्थपूर्ण तरीके से जुड़ने के बारे में है.

साई इंटरनेशनल एजुकेशन ग्रुप के डायरेक्टर-न्यू एज लर्निंग, विशाल आदित्य साहू कहते हैं, "सीखने के परिणामों, शिक्षण पद्धति और मूल्यांकन के बीच यह तालमेल एक सतही बदलाव के बजाय सिस्टेमिक रिडिजाइन को दिखाता है."

सुधार का नजरिया

CBSE पाठ्यक्रम का यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप है, जो शिक्षा को क्षमता-निर्माण के रूप में देखती है. यह बदलाव जानबूझकर चरणों में किया जा रहा है. साहू कहते हैं, "सुधार चरणबद्ध हैं लेकिन परिवर्तनकारी हैं. विचार यह है कि स्कूलों को ढलने के लिए समय दिया जाए और साथ ही लगातार सीखने के नए तौर-तरीकों की ओर बढ़ा जाए."

एआई (AI) मॉड्यूल को धीरे-धीरे शामिल करने से लेकर भाषा की जरूरतों में बदलाव तक, यह चरणबद्ध शुरुआत महत्वाकांक्षा और संस्थागत तैयारी के बीच संतुलन को दर्शाती है. क्योंकि वास्तविक बदलाव को नीति से ऊपर उठकर कक्षाओं में दिखना चाहिए.

बुनियादी साक्षरता को फिर से परिभाषित करना

सबसे गहरा बदलाव इस बात में है कि बुनियादी साक्षरता की कल्पना कैसे की जा रही है. अगर पहले पढ़ाई में अच्छा होने का मतलब पढ़ना, लिखना और गणित के सवाल हल करना था, तो अब वह परिभाषा अधूरी लगती है. छात्रों को AI, कोडिंग और कम्प्यूटेशनल सोच से पहले की तुलना में बहुत जल्दी परिचित कराया जा रहा है. इसका लक्ष्य उन्हें एक जटिल दुनिया में स्पष्ट रूप से सोचने में मदद करना है. साहू समझाते हैं, "बुनियादी साक्षरता में अब तार्किक सोच, पैटर्न की पहचान और तकनीक के साथ नैतिक जुड़ाव भी शामिल है."

कोहली इसमें एक महत्वपूर्ण बात जोड़ते हैं, "छात्र पहले से ही खोजने और निर्णय लेने के लिए AI का उपयोग कर रहे हैं. मुद्दा यह है कि क्या उन्हें यह सिखाया जा रहा है कि वे जो देखते हैं उस पर सवाल कैसे उठाएं और अपने विवेक का उपयोग कैसे करें."

सरल शब्दों में, अब यह केवल उत्तर खोजने के बारे में नहीं है. यह पूछने के बारे में है: क्या इसका कोई मतलब है? क्या मैं इस पर भरोसा कर सकता हूं? मैं क्या छोड़ रहा हूं?

भाषा, संज्ञान और संस्कृति

संशोधित त्रि-भाषा फॉर्मूला एक और बड़ा सुधार है. इसका उद्देश्य संज्ञानात्मक विकास (cognitive growth) को मजबूत करते हुए बहुभाषी दक्षता को बढ़ाना है. शोध बताते हैं कि बहुभाषावाद याददाश्त, समस्या सुलझाने की क्षमता और मानसिक लचीलेपन को बढ़ाता है. हालांकि, इस कदम का प्रभाव काफी हद तक इसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा.

कोहली कहते हैं, "भाषा इस बात को आकार देती है कि छात्र कैसे सोचते हैं, खुद को व्यक्त करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं. यदि इसे केवल नियम पालन के रूप में देखा गया, तो यह दबाव बढ़ा सकता है. यदि सोच-समझकर लागू किया गया, तो यह सीखने को गहरा बना सकता है."

विबग्योर (VIBGYOR) ग्रुप ऑफ स्कूल्स की वाइस-चेयरपर्सन कविता केरवाला इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए कहती हैं, "बहुभाषावाद सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करता है और मानसिक फुर्ती बढ़ाता है, जो इस जटिल दुनिया में एक आवश्यक क्षमता है."

लेकिन कई सुधारों की तरह, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि छात्र इसे कैसे महसूस करते हैं. अगर यह केवल एक खानापूर्ति बन गया, तो इसमें दबाव बढ़ने का जोखिम है. अगर यह सार्थक रहा, तो यह जीवन भर के लिए एक लाभ बन सकता है. शायद, असली बदलाव इस बात में नहीं है कि छात्र कितनी भाषाएं सीखते हैं, बल्कि इसमें है कि वे उनके साथ कितनी गहराई से जुड़ते हैं.

परीक्षाओं पर पुनर्विचार

अगर आप छात्रों से पूछें कि स्कूली जीवन को क्या परिभाषित करता है, तो अधिकांश एक शब्द कहेंगे: परीक्षा. अच्छी खबर यह है कि परीक्षाएं भी बदल रही हैं. अब उनमें अनुमान लगाना मुश्किल होगा और वे अधिक अनुप्रयोग-आधारित (application-based) और वास्तविक जीवन की सोच को दर्शाने वाली बन रही हैं.

अगर मूल्यांकन का स्वरूप बदलता है, तो तैयारी को भी उसी के अनुरूप बदलना होगा. क्षमता-आधारित प्रश्नों के लिए वैचारिक स्पष्टता, विश्लेषणात्मक सोच और अपरिचित संदर्भों में ज्ञान को लागू करने की क्षमता की आवश्यकता होती है.

कोहली कहते हैं, "मूल्यांकन सुधार के साथ-साथ ईकोसिस्टम में भी सुधार होना चाहिए. अन्यथा, छात्र दो प्रणालियों के बीच फंस जाएंगे- एक जो सोचने को महत्व देती है और दूसरी जो अभी भी उन्हें रटने के लिए प्रशिक्षित करती है."

डिजिटल मूल्यांकन और निरंतर मूल्यांकन मॉडल एक बार की उच्च-जोखिम वाली परीक्षाओं से हटकर निरंतर सीखने की ओर बढ़ने का संकेत देते हैं. यदि इसे अच्छी तरह से लागू किया गया, तो यह परीक्षा की घबराहट को कम कर सकता है और गहरी भागीदारी को प्रोत्साहित कर सकता है. लेकिन इसके लिए कक्षाओं, कोचिंग सेंटरों और घर में सोच बदलने की आवश्यकता होगी.

वैश्विक अवधारणा और भारत के क्लासरूम

सीखने की वैश्विक शैलियों की ओर भी एक स्पष्ट झुकाव दिख रहा है: अधिक सवाल-जवाब, लचीलापन और अंतःविषय (interdisciplinary) सोच. लेकिन CBSE कैम्ब्रिज या इंटरनेशनल बोर्ड बनने की कोशिश नहीं कर रहा है. यह उन विचारों को भारतीय कक्षाओं के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रहा है जहां विविधता बहुत अधिक है, संसाधन अलग-अलग हैं और सांस्कृतिक संदर्भ का बहुत महत्व है.

केरवाला कहती हैं, "CBSE भारतीय वास्तविकताओं से जुड़े रहते हुए वैश्विक मानकों के साथ तालमेल बिठा रहा है." यह दोहरा दृष्टिकोण इस प्रणाली की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बन सकता है.

इन सुधारों के पीछे का इरादा स्पष्ट है: एक अधिक लचीला, प्रासंगिक और भविष्य के लिए तैयार शिक्षा तंत्र बनाना. लेकिन केवल इरादा ही काफी नहीं है. सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि शिक्षकों को शिक्षण पद्धति बदलने के लिए तैयार किया जाए, स्कूल अंतःविषय सीखने का समर्थन करें, माता-पिता और कोचिंग सिस्टम अपेक्षाओं को संभालें और छात्रों को दबाव के बजाय मार्गदर्शन दिया जाए. आखिरकार, 'मुझे बताओ कि क्या लिखना है' से 'मुझे बताओ कि तुम क्या सोचते हो' तक के बदलाव में समय लगता है.

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