कड़वाहट पीछे छोड़ भारत और कनाडा संबंधों को कैसे सुधार रहे?

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दिल्ली की यात्रा करके दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने का प्रयास किया है

भारत के पीएम नरेंद्र मोदी और कनाडा के पीएम कार्नी (फाइल फोटो)
भारत के पीएम नरेंद्र मोदी और कनाडा के पीएम कार्नी (फाइल फोटो)

कुछ समय पहले तक भारत और कनाडा के रिश्तों में काफी तल्खी देखने को मिल रही थी, ऐसा लग रहा था कि दोनों मुल्कों के संबंध सुधरने में अब लंबा वक्त लग सकता है. हालांकि, दोनों देशों के प्रधानमंत्री अब संबंधों को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं.

यह सुधार की शुरुआत कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा से हुई. 2 मार्च को कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता कर अपनी चार दिवसीय ऐतिहासिक यात्रा का समापन किया.

यह आठ सालों में किसी कनाडाई प्रधानमंत्री की भारत की पहली आधिकारिक द्विपक्षीय यात्रा थी. इसी वजह से दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस यात्रा के दौरान विश्वास बहाल करने और सहयोग बढ़ाने के लिए कई समझौतों का एक व्यापक पैकेज तैयार किया था.  

उनकी इस यात्रा की सबसे खास बात यह थी कि व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) की वार्ताओं के लिए टर्म ऑफ रेफरेंस पर दोनों नेताओं ने दस्तखत किए. इस समझौते के मुताबिक, दोनों सरकारों का लक्ष्य 2026 के अंत तक वार्ता पूरी कर समझौता अंतिम रूप देना और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक बढ़ाना है.

इस यात्रा के परिणामस्वरूप भारत के नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को समर्थन देने के लिए लगभग 2.6 अरब डॉलर का एक महत्वपूर्ण 10-वर्षीय यूरेनियम आपूर्ति समझौता भी हुआ. इसके अलावा, दोनों पक्षों ने क्रिटिकल मिनरल्स, क्लीन एनर्जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रक्षा वार्ता और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में नई साझेदारियों की घोषणा की. इससे भी खास बात यह है कि दोनों सरकारों ने अपने मिशनों में पूर्ण राजनयिक कर्मचारियों की नियुक्ति बहाल करने और खुफिया एवं कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सहयोग को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई.  

इन घोषणाओं को 2023 में हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद दोनों देशों के संबंधों में उल्लेखनीय सुधार के रूप में देखा जा रहा है. जस्टिन ट्रूडो के बाद कनाडा के प्रधानमंत्री बने मार्क कार्नी ने पीएम मोदी को अल्बर्टा में G7 शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया.

साथ ही, 2023 के संकट के बाद से गंभीर रूप से तनावपूर्ण रहे राजनयिक चैनलों को बहाल करने के लिए बेहद शांतिपूर्ण तरीके से प्रयास शुरू किए गए. 2023 में ब्रिटिश कोलंबिया में सिख अलगाववादी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद यह टकराव शुरू हुआ था.

ट्रूडो ने कनाडा की संसद को बताया कि खुफिया एजेंसियों को हत्या से जुड़े मामले में भारतीय एजेंटों का लिंक मिला है. भारत ने इस आरोप को निराधार और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया था. इन आरोपों के जवाब में भारत ने कनाडा पर खालिस्तान समर्थक चरमपंथी समूहों को स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति देने का आरोप लगाया.

इसका तत्काल और गंभीर परिणाम सामने आया. दोनों सरकारों ने एक-दूसरे के जवाब में वरिष्ठ राजनयिकों को वापस लौटने का आदेश दिया और भारत ने कनाडा से नई दिल्ली में अपनी राजनयिक उपस्थिति कम करने की मांग की. भारतीय राजनयिकों की सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए कनाडाई नागरिकों के लिए वीजा सेवाएं अस्थायी रूप से निलंबित कर दी गईं, जबकि कनाडा ने भारत से अपने कई अधिकारियों को वापस बुला लिया.

उच्च स्तरीय राजनीतिक गतिविधियां ठप्प हो गईं और व्यापारिक वार्ताएं रोक दी गईं. इस राजनयिक गतिरोध ने सीमा पार आवागमन पर निर्भर छात्रों, परिवारों और व्यवसायों के लिए अनिश्चितता पैदा कर दी और आधुनिक भारत-कनाडा संबंधों में सबसे गहरा आघात पहुंचाया.

भारत ने बार-बार यह तर्क दिया है कि स्वतंत्र सिख देश की मांग करने वाले कुछ अलगाववादी समूह वहां खुलेआम सक्रिय हैं और उन्होंने कई बार भारतीय दूतावास और अधिकारियों को निशाना बनाया है. हालांकि, कनाडा इस मुद्दे को मुख्य रूप से लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नजरिए से देखता है. कनाडा का कहना है कि शांतिपूर्ण राजनीतिक विरोध की इजाजत कनाडाई कानून के सबों को मिला हुआ है. बशर्ते उसमें हिंसा शामिल न हो.

कनाडा ने भारत पर कथित विदेशी हस्तक्षेप का आरोप लगाया, जबकि भारत ने जोर देकर कहा कि निज्जर केस में कनाडा ने कोई विश्वसनीय सबूत पेश नहीं किया गया है. साथ ही भारत ने कनाडा से भारत को निशाना बनाने वाले चरमपंथी संगठनों के खिलाफ अधिक मजबूती से कार्रवाई करने की मांग की.

कनाडा में घरेलू राजनीतिक परिस्थितियों ने स्थिति को और भी जटिल बना दिया. कनाडा में सिख प्रवासी समुदाय एक प्रभावशाली जनसमूह का प्रतिनिधित्व करता है, विशेष रूप से ब्रिटिश कोलंबिया और ओंटारियो जैसे प्रांतों में. इसके कारण ही यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया. ऐसे में इस मामले पर दोनों सरकारों को न केवल कूटनीतिक पहलुओं बल्कि जटिल घरेलू राजनीतिक दबावों का भी सामना करना पड़ा.

टकराव की गंभीरता के बावजूद, संबंध पूरी तरह से नहीं टूटे. तनाव के चरम पर भी द्विपक्षीय व्यापार जारी रहा, जो 2024 में लगभग 11 अरब कनाडाई डॉलर तक पहुंच गया. हालांकि, इन संकट के कारण राजनयिक मिशनों ने कम कर्मचारियों के साथ काम किया, वीजा प्रक्रिया धीमी हो गई और छात्रों की आवाजाही बाधित हुई.

हालांकि, 2025 तक, दोनों सरकारों ने संबंधों को स्थिर करने के तरीकों का सावधानीपूर्वक पता लगाना शुरू कर दिया था. एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक कदम तब आया जब मोदी और कार्नी ने जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की, जिससे गतिरोध से आगे बढ़कर संबंध बेहतर करने की संभावना बढ़ी.  

कार्नी की नई दिल्ली यात्रा ने इस प्रक्रिया को गति दी है. दोनों नेताओं ने इस यात्रा को एक अनिश्चित वैश्विक परिवेश में साझा आर्थिक और रणनीतिक हितों से प्रेरित एक नई और अधिक महत्वाकांक्षी साझेदारी की शुरुआत के रूप में पेश किया है. आर्थिक साझेदारियों में विविधता लाना, ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करना यात्रा के दौरान प्रमुख चर्चा के विषय थे. इसके अलावा, प्रौद्योगिकी, प्रतिभा और संसाधनों के मामले में साझा लाभ उठाने पर भी दोनों देशों के नेताओं ने जोर दिया.

CEPA और अन्य व्यापार ढांचों पर बातचीत का उद्देश्य आने वाले दशक में द्विपक्षीय व्यापार को तेजी से बढ़ना है. महत्वपूर्ण खनिजों, स्वच्छ ऊर्जा, कृषि, डिजिटल प्रौद्योगिकी और नागरिक परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है. कनाडा को भारत के ऊर्जा परिवर्तन और औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक यूरेनियम और अन्य रणनीतिक संसाधनों के प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में देखा जाता है.

दोनों देशों के आपसी संबंध भी इस रिश्ते का एक महत्वपूर्ण कारक हैं. कनाडा में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की संख्या अब 16 लाख से अधिक है. साथ ही छात्रों एवं पेशेवरों की बड़ी संख्या ने दोनों देशों के बीच गहरे सामाजिक और आर्थिक संबंध स्थापित किए हैं. राजनयिक संकट के दौरान भी ये संबंध मजबूत बने रहे और रिश्तों को पूरी तरह टूटने से बचाने में सहायक रहे.

सुरक्षा सहयोग लंबे समय बाद एक बार फिर सतर्कता के साथ, धीरे-धीरे शुरू हो रहा है. आतंकवाद विरोधी समन्वय, चरमपंथी नेटवर्क की निगरानी और खुफिया सहयोग को मजबूत करने पर चर्चाएं फिर से शुरू हो गई हैं. पिछले दो वर्षों के तनाव के बाद दोनों देश आपसी विश्वास को फिर से कायम करने की कोशिश कर रहे हैं.  

कनाडा के कई सीनियर नेताओं ने भी संकट के दौरान इन यात्राओं को लेकर अपने विचार व्यक्त किए हैं. 2015 से 2017 तक कनाडा के विदेश मंत्री रहे स्टीफन डायोन ने अब कहा है कि निज्जर हत्याकांड से जुड़े आरोपों को अधिक सावधानी से संभाला जा सकता था. डायोन का कहना है कि कनाडा को अपनी वैश्विक साझेदारियों में विविधता लाने की आवश्यकता है और वह केवल संयुक्त राज्य अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकता, इसलिए भारत के साथ स्थिर संबंध रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं.

डायोन ने इस बहस को आकार देने वाले विभिन्न कानूनी ढांचों पर भी बात की है. वह बताते हैं कि कनाडा में अलगाववाद अपने आप में गैरकानूनी नहीं है. वह इस बात पर जोर देते हैं कि कनाडाई कानून हिंसा, आतंकवाद या हिंसक कृत्यों की योजना बनाने पर रोक लगाता है.

भारत ने ट्रूडो के पहले के आरोपों की कड़ी आलोचना करते हुए उन पर राजनीतिक लाभ के लिए जानबूझकर भारत को बदनाम करने का आरोप लगाया और इस विवाद को घरेलू वोट बैंक की राजनीति से जोड़ा. दोनों देशों के नेताओं के बयानों ने 2023 के दौरान पनपे अविश्वास की गहराई को उजागर किया था.

फिर भी, पिछले एक साल में हुए राजनयिक प्रयासों से पता चलता है कि दोनों पक्ष आगे बढ़ने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं. मोदी और कार्नी अब तक जी20 शिखर सम्मेलन सहित प्रमुख बहुपक्षीय सम्मेलनों के दौरान दो बार मिल चुके हैं. विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी जून 2025 के बाद से अपनी कनाडाई समकक्ष अनीता आनंद से पांच बार मिल चुके हैं, जो राजनयिक प्रयासों में नए सिरे से हो रही प्रगति को दर्शाता है.

राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी मामलों पर बातचीत फिर से शुरू हो गए हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अपनी कनाडाई समकक्ष नताली जी. ड्रोइन से दो बार मुलाकात की है, जिसमें डोभाल की हाल ही में कनाडा यात्रा भी शामिल है. कूटनीतिक गतिरोध के चरम पर भी वहां रह रहे भारतीय प्रवासी, छात्र और दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच आपसी जुड़ाव ने स्थिति को संभाले रखा. अब यही कारक संबंधों को नए सिरे से संवारने में मददगार साबित हो रहे हैं.

फिर भी, आगे का रास्ता नाजुक बना हुआ है. निज्जर की हत्या की जांच कनाडा की अदालतों में जारी है. खालिस्तान से संबंधित सक्रियता को लेकर राजनीतिक संवेदनशीलता अभी भी बनी हुई है. नतीजतन, कई विश्लेषक वर्तमान स्थिति को पूर्ण सुलह नहीं मानते, बल्कि सावधानीपूर्वक आगे बढ़ने की चेतावनी दे रहे हैं.

एक्सपोर्ट डेवलपमेंट कनाडा के उपाध्यक्ष तुषार हांडीकर बताते हैं कि कनाडा, भारत के लिए विकास का एक बहुत ही स्थिर भागीदार है. साथ ही वह इस बात पर जोर देते हैं कि पूरी क्षमता का लाभ उठाने के लिए व्यापार बाधाओं को दूर करना जरूरी है. शिक्षा और आर्थिक तौर पर जुड़े होने के कारण इन दोनों लोकतांत्रिक देशों के लिए संबंधों को फिर से मजबूत करने के कई मजबूत वजह हैं. जैसा कि कार्नी ने अपनी यात्रा के दौरान कहा, 'यह क्षण न केवल एक रिश्ते को फिर से शुरू करने का है, बल्कि नई महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए दूरदर्शिता के साथ एक साझेदारी के विस्तार का भी है."

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