बुलेट ट्रेन का 'भारतीय अवतार' जो होगा शिंकानसेन से सस्ता और सुविधाओं में बेमिसाल!
भारत में बना B-28 ट्रेनसेट विदेशी कंपनियों पर बुलेट ट्रेन को लेकर निर्भरता खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम है

पिछले दस साल से भारत बुलेट ट्रेन गलियारा बनाने की कोशिश कर रहा था. विदेशों से समझौते किए गए, जिससे पैसे का इंतजाम हुआ. इसके बाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर निर्माण काम भी शुरू हो गया, लेकिन खुद बुलेट ट्रेन बनाने की कोशिश नहीं की गई थी.
अब यह बदलाव शुरू हो गया है. पिछले हफ्ते बेंगलुरु में एक नए कारखाने का उद्घाटन करते हुए रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने B-28 ट्रेनसेट (बुलेट ट्रेन का एक प्रोटोटाइप) बनाने की घोषणा की. यह भारत के लिए हाई-स्पीड बुलेट ट्रेन खुद से बनाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है.
B-28 ट्रेनसेट चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्टरी (ICF) और बेंगलुरु स्थित BEML ने मिलकर बनाया है. इनमें ICF डिजाइन विशेषज्ञता दे रही है, जबकि BEML इसका निर्माण करेगी. यह भारत का पहला पूरी तरह स्वदेशी हाई स्पीड वाला ट्रेनसेट होगा, जो आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत तैयार किया जा रहा है. बता दें कि वंदे भारत ट्रेनें, जिनकी अधिकतम गति 180 किमी प्रति घंटा है, उन्हें ‘सेमी हाई-स्पीड’ ट्रेन की श्रेणी में रखा जाता है.
B-28 ट्रेनसेट के लिए सरकार ने ₹866.87 करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट किए हैं. इसके तहत दो ट्रेनसेट बनाया जाना है. हर ट्रेनसेट में 8 कोच होंगे. इसका लक्ष्य ऐसे कोच का निर्माण करना है, जो 280 किमी प्रति घंटा की गति से बिना किसी समस्या के चल सके.
हालांकि, इसे 249 किमी प्रति घंटा की गति से ही चलाया जाएगा. परफॉर्मेंस के लिहाज से B-28 दुनिया के कई हाई-स्पीड ट्रेन सिस्टम के जैसा ही है. इसके बावजूद यह कोच जापान के सबसे तेज शिंकानसेन ट्रेनों जितना बेहतर अभी नहीं हो सकेगा, जो 350 किमी प्रति घंटा तक की रफ्तार पकड़ सकते हैं.
‘मेड इन इंडिया’ यह कोच क्यों मायने रखता है?
यह कोच इसलिए मायने रखता है, क्योंकि इसका पहला फायदा लागत और दूसरा नियंत्रण है. B-28 ट्रेनसेट के एक कोच की अनुमानित कीमत ₹27.86 करोड़ है. वहीं, जापान के ऐसे ही शिंकानसेन कोच की कीमत ₹46-48 करोड़ के आसपास बताई जाती है. मतलब एक कोच की कीमत पर लगभग 40 फीसद का अंतर है. जब भारत सात और बुलेट ट्रेन गलियारों का निर्माण करने की योजना बना रहा है, तो इस अंतर से होने वाली बचत बहुत बड़ी हो सकती है.
हालांकि, इसका महत्व सिर्फ प्रति कोच की कीमत तक सीमित नहीं है. हाई-स्पीड रेल कार्यक्रम में विदेशी तकनीक और फाइनेंसिंग पर अत्यधिक निर्भरता ने भारतीय विनिर्माण को तकनीकी रूप से आगे बढ़ने और प्रेसिजन इंजीनियरिंग में महारत हासिल करने की राह को प्रभावित किया है. इसके अलावा कुछ हद तक सीमित भी किया है. प्रेसिजन इंजीनियरिंग का मतलब मैकेनिकल इंजीनियरिंग की एक विशेष शाखा है जो अत्यधिक सटीकता और सूक्ष्म सहनशीलता (Tight Tolerances) वाले कल-पुर्जों के डिजाइन, विकास और निर्माण पर केंद्रित है.
मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन गलियारे के लिए जापान के साथ शिंकानसेन ट्रेनों पर हुई चर्चाएं लागत में बढ़ोतरी के साथ ही बाहरी तकनीक से जुड़ी शर्तों के कारण जटिल हो गई थीं. इसके कारण ही इन प्रोजेक्ट पर काम कई सालों तक चलती रहीं. B-28 के साथ भारत का लक्ष्य तकनीक, सप्लाई चेन और विस्तार की गति पर पूरा नियंत्रण रखना है. इस तरह एक नई विनिर्माण उद्योग की नींव रखने का प्रयास हो रहा है.
कहां और कैसे बनेगा यह रेलवे कोच?
BEML का आदित्य प्लांट बेंगलुरु के टिप्पासंद्रा कैंपस में स्थित है. यह प्लांट इस बड़े प्रोजेक्ट के तहत हाई-स्पीड रेल कोच बनाने के लिए डिजाइन किया गया है. इसमें रोबोटिक लेजर वेल्डिंग सिस्टम लगाए गए हैं, जो लगभग 250 किमी प्रति घंटा की रफ्तार के लिए जरूरी उच्च-शक्ति वाली संरचना बनाने में सक्षम हैं.
इसमें ऑटोमेशन का स्तर काफी ज्यादा है जो इसे सालाना लगभग 100 हाई-स्पीड कोच बनाने की क्षमता देती है. यह प्लांट B-28 ट्रेनसेट को हाई-स्पीड रेल के लिए जरूरी और मुश्किल आंतरिक सिस्टम से लैस करेगा. यहां बनाए जा रहे कोच पूरी तरह सील्ड और प्रेशराइज्ड हैं. इनमें एडवांस्ड HVAC (हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग) और एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम लगाया गया है, जो तेजी से टनल में प्रवेश करते समय यात्रियों को सुरक्षित रखता है और भारत की तेज गर्मी व धूल से महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक्स को बचाता है.
ट्रेन के अंदर IGBT-आधारित डिस्ट्रीब्यूटेड ट्रैक्शन सिस्टम लगा है, जो कोच को तेज एक्सेलरेशन (गति में बढ़ोतरी) देता है. साथ ही माइक्रोप्रोसेसर-नियंत्रित ब्रेक सिस्टम है, जो बहुत तेज गति से चलती ट्रेन को सुरक्षित तरीके से रोक सकता है.
पूरे निर्माण प्रक्रिया को सुरक्षित और आसान बनाने के लिए प्लांट में स्मार्ट सेफ्टी प्रोटोकॉल बनाया गया है. यह प्रोटोकॉल सीधे निर्माण प्रक्रिया में शामिल किया गया है. इससे B-28 ट्रेनसेट ETCS लेवल-2 सिग्नलिंग सिस्टम से लैस होगा और EN 45545 जैसे सख्त फायर सेफ्टी मानकों को भी पूरा करेगा.
यह ट्रेन कब चलेगी?
ट्रेन के निर्माण का काम पहले ही शुरू हो गया है. पहला प्रोटोटाइप ट्रेनसेट मार्च 2027 तक बनाने का सरकारी लक्ष्य है. मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन गलियारे का 97 किलोमीटर लंबा सूरत-वापी हिस्सा अगले साल अगस्त तक चालू हो जाने की उम्मीद है. हालांकि, यह लक्ष्य काफी महत्वाकांक्षी माना जा रहा है.
भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट अक्सर समय से पीछे चलते हैं और बजट भी बढ़ जाता है. हाई-स्पीड रेल जैसा जटिल प्रोजेक्ट और भी ज्यादा देरी का शिकार हो सकता है.
आपके लिए क्या फायदा?
B-28 ट्रेन में सिर्फ चेयर कार होगी, जिसमें सीटें पीछे झुक सकेंगी और चारों ओर घूम भी सकेंगी. दिव्यांग यात्रियों के लिए खास व्यवस्था रहेगी. साथ ही आधुनिक इंफोटेनमेंट सिस्टम और अन्य सुविधाएं भी होंगी.
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, प्रस्तावित चेन्नई-बेंगलुरु बुलेट ट्रेन गलियारा दोनों शहरों के बीच की दूरी को मात्र 73 मिनट में तय कर देगा. इससे यात्रा इतना कम समय में और आरामदायक होगा कि दक्षिण भारत के दो बड़े शहर एक ही शहर बन जाएंगे. इस कॉरिडोर पर अभी काम चल रहा है.
B-28 को इसलिए भी महत्व दिया जा रहा है क्योंकि मुंबई-अहमदाबाद प्रोजेक्ट से भारतीय इंजीनियरों को बुलेट ट्रेन बनाने का अनुभव मिल चुका है. B-28 के साथ भारत अब बुलेट ट्रेन गलियारे पूरी तरह खुद डिजाइन करने, बनाने और चलाने में आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहा है.