फर्जी डेटा, AI और प्लेगरिज्म : BHU में रिसर्च की साख क्यों डगमगा रही?
AI जनरेटेड कंटेंट, प्लेगरिज्म, डेटा और तस्वीरों में हेरफेर के आरोपों के बीच BHU से जुड़े 75 से ज्यादा शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय जर्नलों से वापस लिए गए या जांच में फंसे

उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में गिने जाने वाले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की अकादमिक साख पिछले कुछ वर्षों में गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है. विश्वविद्यालय से जुड़े प्रोफेसरों और शोधकर्ताओं के 75 से अधिक रिसर्च पेपर अंतरराष्ट्रीय जर्नलों से वापस लिए जा चुके हैं या उन पर जांच चल रही है.
इन मामलों में साहित्यिक चोरी (प्लेगरिज्म), डेटा की दोहराव, वैज्ञानिक तस्वीरों में हेरफेर, संदिग्ध पीयर-रिव्यू, ऑथरशिप विवाद और अब AI टूल्स के दुरुपयोग जैसे आरोप सामने आए हैं. इन रिसर्च पेपर की वापसी केवल तकनीकी त्रुटियों तक सीमित नहीं है बल्कि यह देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में तेजी से बढ़ती ‘रिसर्च पब्लिशिंग कल्चर’ की उस प्रवृत्ति को उजागर करती है जहां गुणवत्ता की जगह संख्या को प्राथमिकता दी जाने लगी है.
खास बात यह है कि इन मामलों का रिकॉर्ड केवल विश्वविद्यालय के भीतर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध निगरानी करने वाले मंचों, जर्नलों और डेटाबेस में सार्वजनिक रूप से दर्ज है.
चार वर्षों में बढ़ीं अनियमितताएं
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 से 2025 के बीच सबसे अधिक गड़बड़ियां सामने आईं. इस दौरान करीब 63 रिसर्च पेपर विभिन्न कारणों से जांच के दायरे में आए या वापस लिए गए. वर्ष 2026 के आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं लेकिन शोध जगत में यह आशंका बढ़ रही है कि AI आधारित कंटेंट निर्माण के प्रसार के बाद ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं.
साल-दर-साल देखें तो 2020 में करीब छह रिसर्च पेपरों में डुप्लीकेट डेटा और वैज्ञानिक तस्वीरों की सत्यता पर सवाल उठे. 2021 में 12 रिसर्च पेपरों में फोटो मैनिपुलेशन के मामले सामने आए, जिनमें विशेष रूप से मैटेरियल साइंस और लाइफ साइंस से जुड़े शोध शामिल थे. वर्ष 2022 में 22 शोधपत्र संदिग्ध या गलत पीयर-रिव्यू प्रक्रिया के कारण विवादों में आए. 2023 में 16 शोधपत्रों में प्लेगरिज्म और बौद्धिक अधिकारों से जुड़े विवाद सामने आए. 2024 में कई बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों ने प्रक्रिया संबंधी खामियों के आधार पर BHU से जुड़े शोधपत्र हटाए. वहीं 2025 में करीब 13 ऐसे रिसर्च पेपर चिह्नित किए गए जिनमें AI की मदद से कंटेंट तैयार किए जाने या डेटा जनरेशन के आरोप लगे.
AI ने बढ़ाई अकादमिक संस्थानों की चिंता
शोध जगत में AI के इस्तेमाल ने नई बहस छेड़ दी है. BHU से जुड़े कई मामलों में यह आरोप सामने आया कि शोधपत्रों का प्रारूप, विश्लेषण और निष्कर्ष AI टूल्स की मदद से तैयार किए गए थे. कुछ मामलों में यह भी पाया गया कि शोध के लिए आवश्यक वैज्ञानिक डेटा वास्तविक प्रयोगों के बजाय AI आधारित टेक्स्ट जनरेशन से निकाला गया. इसी खतरे को देखते हुए देश की शीर्ष रिसर्च फंडिंग एजेंसियों में शामिल ‘अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन’ यानी ANRF ने हाल ही में शोध अनियमितताओं पर सख्त रुख अपनाया है.
4 मई को जारी नए दिशा-निर्देशों में ANRF ने एडवांस्ड रिसर्च ग्रांट के लिए आवेदन करने वाले वैज्ञानिकों से पिछले पांच वर्षों में वापस लिए गए शोधपत्रों और उनके कारणों का पूरा ब्योरा अनिवार्य कर दिया. साथ ही शोध प्रस्तावों में मौलिकता सुनिश्चित करने, AI से तैयार सामग्री के खुलासे और यह घोषणा देने की बाध्यता भी लागू की गई कि पूरा प्रपोजल AI-जनरेटेड नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल BHU जैसे मामलों के कारण नहीं, बल्कि पूरे भारतीय शोध तंत्र में उभरती नई चुनौतियों के मद्देनजर उठाया गया है.
BHU प्रशासन अब इन मामलों को केवल व्यक्तिगत त्रुटि नहीं बल्कि संस्थागत छवि से जुड़ा संकट मान रहा है. विश्वविद्यालय के भीतर अकादमिक गुणवत्ता और डेटा सत्यापन को लेकर निगरानी बढ़ाई गई है. विश्वविद्यालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर BHU की रैंकिंग और साख को बनाए रखने के लिए शोध की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता. इसी कारण कई शोधपत्रों की आंतरिक समीक्षा कराई गई और अनेक मामलों में सुधार या वापसी की प्रक्रिया शुरू हुई. वर्ष 2013 से अब तक करीब 60 शोधपत्रों में गंभीर अनियमितताओं की पुष्टि हो चुकी है. इनमें से कई मामलों में पीयर-रिव्यू टीमों और आंतरिक मूल्यांकन समितियों ने डेटा सत्यापन, निष्कर्षों की प्रामाणिकता और शोध पद्धति को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कीं.
IMS-BHU में ऑथरशिप विवाद
सबसे चर्चित मामलों में Institute of Medical Sciences (IMS)- BHU के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग का मामला शामिल रहा. अक्टूबर 2022 में प्रसवोत्तर रक्तस्राव (पीपीएच) की इमरजेंसी केयर पर आधारित एक रिसर्च पेपर को अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘क्युरियस’ ने वापस ले लिया था. यह शोध उत्तर भारत के एक टर्शियरी केयर अस्पताल में ‘बंडल अप्रोच’ मॉडल के अध्ययन पर आधारित था. जांच में सामने आया कि शोधकर्ताओं के बीच ऑथरशिप को लेकर विवाद था.
शिकायतकर्ता डॉ. उमा पांडेय ने आरोप लगाया कि जिन शोधकर्ताओं ने मुख्य योगदान दिया, उनके नाम पेपर से हटा दिए गए. आंतरिक जांच में यह भी पाया गया कि शोध में इस्तेमाल आंकड़े अधूरे और त्रुटिपूर्ण थे. फैकल्टी और प्रशासनिक नेतृत्व ने शिकायत को सही माना, जिसके बाद जर्नल ने पेपर को निरस्त कर दिया. यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि इसमें शोध नैतिकता के साथ-साथ अकादमिक श्रेय बांटने की पारदर्शिता पर भी सवाल उठे.
IIT-BHU की संयुक्त रिसर्च पर भी सवाल
अप्रैल 2025 में IIT-BHU और BHU के विज्ञान संकाय के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किए गए एक मेडिकल रिसर्च पेपर को भी गंभीर अनियमितताओं के कारण हटाया गया.
यह शोध गंभीर रूप से जलने वाले घावों के उपचार के लिए ‘थ्रीडी-नैनोफाइब्रोपोरस मैट्रिक्स’ तकनीक पर आधारित था. इसे एल्सेवियर के ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल मैक्रोमोलेक्यूल्स’ में प्रकाशित किया गया था. जांच के दौरान पाया गया कि रिसर्च में इस्तेमाल वैज्ञानिक तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ की गई थी. एक ही माइक्रोस्कोपिक इमेज को अलग-अलग प्रयोगों के परिणाम के रूप में बार-बार प्रस्तुत किया गया. डेटा की विश्वसनीयता पर सवाल उठने के बाद जर्नल ने पेपर वापस ले लिया. वैज्ञानिक समुदाय में यह मामला इसलिए भी गंभीर माना गया क्योंकि मेडिकल रिसर्च में गलत डेटा सीधे स्वास्थ्य संबंधी दावों को प्रभावित कर सकता है.
अगस्त 2025 में दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण और मौसम संबंधी प्रभावों पर आधारित एक शोधपत्र को भी एल्सेवियर के ‘केमोस्फीयर’ जर्नल ने अपने रिकॉर्ड से हटा दिया. यह अध्ययन प्रदूषण जैसे संवेदनशील और जनहित से जुड़े विषय पर आधारित था. जांच में पाया गया कि पेपर में इस्तेमाल मौसम संबंधी आंकड़े और निष्कर्ष वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय नहीं थे. इसके अलावा शोधकर्ताओं के योगदान, संस्थागत संबद्धता और ऑथरशिप संबंधी जानकारियों में भी विसंगतियां मिलीं. विशेषज्ञों के मुताबिक, पर्यावरण और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में इस तरह के संदिग्ध शोध सार्वजनिक नीतियों और वैज्ञानिक विमर्श को गलत दिशा दे सकते हैं.
‘पब्लिश या खत्म हो जाओ’ संस्कृति का दबाव
शोध जगत से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालयों में बढ़ते Publish or Perish यानी ‘पब्लिश या खत्म हो जाओ’ के दबाव ने इस समस्या को गंभीर बनाया है. फैकल्टी प्रमोशन, रैंकिंग, रिसर्च ग्रांट और अकादमिक प्रतिष्ठा के लिए बड़ी संख्या में शोधपत्र प्रकाशित करने की होड़ बढ़ी है. ऐसे माहौल में कई शोधकर्ता कम समय में अधिक पेपर प्रकाशित करने के लिए शॉर्टकट अपनाने लगे हैं. प्लेगरिज्म सॉफ्टवेयर से बचने के लिए AI आधारित री-राइटिंग टूल्स का इस्तेमाल, फर्जी पीयर-रिव्यू नेटवर्क और डेटा मैनिपुलेशन जैसी प्रवृत्तियां वैश्विक स्तर पर भी चिंता का विषय बनी हुई हैं.
BHU के मामलों ने यह भी दिखाया है कि केवल तकनीकी जांच पर्याप्त नहीं है. शोध की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत जवाबदेही, पारदर्शी मूल्यांकन और मजबूत नैतिक निगरानी की जरूरत है. BHU प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में रिसर्च पेपरों की स्क्रीनिंग और डेटा ऑडिट को और सख्त किया जाएगा. विश्वविद्यालय स्तर पर प्लेगरिज्म जांच, AI आधारित कंटेंट डिटेक्शन और शोध डेटा की स्वतंत्र समीक्षा जैसे उपायों पर काम शुरू हो चुका है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल नियम कठोर करने से समस्या खत्म हो जाएगी. शोध विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक अकादमिक संस्थानों में गुणवत्ता से अधिक संख्या को महत्व दिया जाएगा तब तक ऐसी घटनाएं रुकना मुश्किल होंगी.
देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में शामिल BHU के सामने अब केवल रिसर्च पेपर की वापसी का संकट नहीं है, बल्कि अपनी अकादमिक विश्वसनीयता और वैश्विक साख को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी है.