केजरीवाल का जज के ‘पॉलिटिकल कनेक्शन’ पर सवाल उठाना अवमानना या अधिकार?

अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाइ कोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता के बेंच के सामने पेश होने से इनकार कर दिया है. लेकिन, क्या इसके कारण उन्हें दोबारा जेल जाना पड़ सकता है?

दिल्ली हाई कोर्ट की जज स्वर्णकांता के खिलाफ केजरीवाल का सत्याग्रह
दिल्ली हाई कोर्ट की जज स्वर्णकांता के खिलाफ केजरीवाल का सत्याग्रह

"मैं हाई कोर्ट में न खुद पेश होऊंगा और न ही कोई मेरी तरफ से दलील रखेगा." 27 अप्रैल को पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल ने यह बात कही है.

उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच से उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है. अपने फैसले को महात्मा गांधी के सत्याग्रह के फैसले से प्रेरित बताया है.

केजरीवाल के मुताबिक, जस्टिस स्वर्णकांता की बेटी और बेटा मोदी सरकार के वकील के पैनल का हिस्सा हैं. इसलिए उन्हें कम उम्मीद है कि जस्टिस स्वर्णकांता केंद्र के खिलाफ फैसला सुनाएंगी.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जजों के पॉलिटिकल कनेक्शन पर सवाल उठाकर फंस गए केजरीवाल और क्या यह अदालत की अवमानना है? सुप्रीम कोर्ट के वकील और भारतीय संविधान पुस्तक के लेखक विराग गुप्ता के जरिए पूरे मामले को विस्तार से जानते हैं-

क्या केजरीवाल अदालत के खिलाफ इस तरह सत्याग्रह कर सकते हैं?

ब्रिटिश हुकूमत में बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी ने अदालती आदेशों के खिलाफ सत्याग्रह करते हुए जेल जाना पसंद किया था. साल 2014 में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ आपराधिक अवमानना का मुकदमा दर्ज कराया था. IPC की धारा-500 के अनुसार उस मामले में जमानत हो सकती थी लेकिन केजरीवाल ने उस मामले को राजनीति से प्रेरित बताते हुए सत्याग्रह के नाम पर जमानत के लिए 10,000 रुपए का बांड देने से मना कर दिया था.

इन परिस्थितियों में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने 21 मई 2014 के आदेश से केजरीवाल को 2 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था. उसके दस साल बाद केजरीवाल और सत्येन्द्र जैन ने शराब घोटाले में जेल जाने के बावजूद मुख्यमंत्री और मंत्री पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था.

दिल्ली शराब घोटाले को लेकर CBI की विशेष अदालत में केजरीवाल पूरी ताकत से मुकदमे की पैरवी करते नजर आए. अब हाई कोर्ट की अपील में जज के खिलाफ स्टैंड लेकर केजरीवाल सहानुभूति और राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.

केजरीवाल या कोई भी नागरिक अदालत या जजों के खिलाफ सत्याग्रह करके जेल जाने का विकल्प अपना सकता है. हालांकि, सत्याग्रह की आड़ में न्यायिक प्रशासन में बाधा डालना और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को दांव में लगाना पूरी तरह से गलत है.

 
कोर्ट के सामने पेश होने से इनकार करना केजरीवाल के लिए कितना जोखिम भरा है?

27 फरवरी 2026 को CBI की विशेष अदालत के फैसले के जरिए केजरीवाल और दूसरे आरोपी बरी हो चुके हैं. इस मामले में केजरीवाल के अलावा 22 अन्य आरोपी हैं. अन्य पक्षकारों के जवाब और तर्कों के आधार पर हाई कोर्ट में सुनवाई के बाद केजरीवाल के खिलाफ एकतरफा फैसला हो सकता है.

केजरीवाल ने पत्र लिखकर जानबूझकर पेश नहीं होने का निर्णय लिया है, इसलिए उन्हें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के आधार पर सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलेगी. केजरीवाल के पेश नहीं होने के बावजूद जज को गुण-दोष के आधार पर अपील में सुनवाई और फैसला करना होगा. इसके लिए एमीकस क्यूरी यानि स्वतंत्र वकील की नियुक्ति की जा सकती है.

केजरीवाल और सिसोदिया के बाद दुर्गेश पाठक ने भी सुनवाई से अलग करने के लिए पत्र लिखा है. हालांकि इस केस में कुल 23 आरोपियों में से 16 लोगों ने जवाब दायर कर दिया है. 

फैसला प्रतिकूल होने पर केजरीवाल जज के फैसले को बहाल करने की मांग के साथ सुप्रीम कोर्ट में नए सिरे से अपनी दलील दे सकते हैं. लेकिन, मुख्य आरोपी के शामिल नहीं होने से मामले की सुनवाई लंबी टल सकती है, जिसका लाभ केजरीवाल को मिल सकता है.

संविधान के अनुच्छेद 22 (1) के मुताबिक, लोगों को मर्जी का वकील और निष्पक्ष ट्रायल का अधिकार है, लेकिन इसकी आड़ में पक्षकारों के जरिए मनमाफिक बेंच के लिए जजों की फोरम शॉपिंग नहीं की जा सकती.

क्या यह अवमानना माना जाएगा?

जस्टिस शर्मा ने 20 अप्रैल के फैसले में जो निष्कर्ष दिए हैं, उसके मुताबिक केजरीवाल के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला बन सकता है. केजरीवाल के आरोप एक जज के बजाय पूरी न्यायिक संस्था को बदनाम करने का प्रयास हैं. जस्टिस शर्मा के मुताबिक, उनकी योग्यता और फैसलों का निर्धारण नेतागिरी से नहीं हो सकता और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ही सक्षम संस्थान है.

हालांकि, बीते दिनों केंद्रीय मंत्री निशिकांत दुबे ने भी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी. लेकिन उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई नहीं की गई. अक्सर नेताओं और रसूखदार लोगों के मामलों में सामान्य तौर पर जज अवमानना की कार्रवाई शुरु करने से बचते हैं. इस मामले में देखने वाली बात यह होगी कि जस्टिस शर्मा इस हवाले से क्या फैसला लेती हैं.
 
जजों को सुनवाई से हटाने के बारे में क्या नियम और परंपराएं हैं?
 
2001 में पश्चिम बंगाल बनाम शिवानंद पाठक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि न्याय सिर्फ होना ही नहीं बल्कि दिखना भी चाहिए. जजों के बच्चे उसी हाई कोर्ट में वकालत कर रहे हैं तो संविधान के अनुच्छेद-222 के अनुसार उनका ट्रांसफर हो सकता है.
 
बच्चों की वकालत के आधार पर जस्टिस वी. शिवरामन नायर ने केरल हाई कोर्ट से ट्रांसफर की मांग की थी. इस तरह कई मामले हैं. CrPC की धारा-479 के मुताबिक, जज मुकदमों को ट्रांसफर कर सकते हैं. सुनवाई से हटने के बारे में स्पष्ट लिखित कानून नहीं है. जजों की व्यक्तिगत धारणाओं या हितों के विरोधाभास से न्याय बाधित नहीं हो, इसके लिए जजों को सुनवाई से हटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अनेक फैसले दिए हैं.
 
2020 में इंदौर विकास प्राधिकरण बनाम मनोहर लाल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जजों की फोरम शॉपिंग या रिक्यूजल (जजों का किसी केस से खुद को अलग करना) प्रणाली का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए.
 
केजरीवाल मामले में सोशल मीडिया से वीडियो वायरल करने के PIL मामले में जस्टिस तेजस करिया ने सुनवाई से अलग होने का फैसला लिया है. इसी तरह से जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने भी कार्ति चिदंबरम मामले में सुनवाई से अलग होने का निर्णय लिया है.
 
शराब घोटाला मामले में सुनवाई की अगली तारीख 4 मई है. इस मामले में जवाब देने के लिए केजरीवाल को नोटिस या समन भेजा सकता है. सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों की सुनवाई जजों के रिटायरमेंट तक उसी बेंच में होती है, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट में गर्मी छुट्टी के बाद रोस्टर बदलने के साथ इस मामले की सुनवाई स्वर्णकांता शर्मा के बजाय किसी अन्य जज की बेंच के सामने हो सकती है.
 
उसके बाद नए जज के सामने केजरीवाल सुनवाई में शामिल होने का निर्णय ले सकते हैं. यह समझ से परे है कि यह सब जानते हुए भी जस्टिस शर्मा और केजरीवाल इस मामले को जरूरत से ज्यादा तूल क्यों दे रहे हैं.

जजों के राजनीतिक कनेक्शन पर क्या पहले भी सवाल खड़े हुए हैं?

कई लोग नेता से जज बने और कई लोग जज से रिटायरमेंट के बाद नेतागिरी में आए. वर्तमान में भी सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के अनेक जज अधिवक्ता परिषद और दूसरे संगठनों से जुड़े हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर यादव विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में गए थे.
 
विपक्षी दलों ने उनके खिलाफ महाभियोग की नोटिस दिया था, लेकिन प्रक्रिया शुरु होने से पहले वे रिटायर हो गए. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने साल-2015 के फैसले में NJAC कानून को रद्द करते हुए कॉलेजियम की मान्यता को बरकरार रखा था. उसके मुताबिक, सरकार सबसे बड़ी मुकदमेबाज है, इसलिए कानून मंत्री को जजों की नियुक्ति के आयोग में शामिल होना गलत है.
 
हालांकि, कॉलेजियम प्रणाली में भी कई जजों की नियुक्ति सरकार से जुड़े लोगों की होती है. के. एन. गोविंदाचार्य ने NJAC मामले में अर्जी लगाकर संविधान की तीसरी अनुसूची के अनुसार यह मांग की थी कि मेमोरण्डम ऑफ प्रोसिजर (MoP) में बदलाव करके जजों की नियुक्ति में राजनीतिक दखलंदाजी और भाई-भतीजावाद को रोका जाए. इस विवाद के बाद न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखने के लिए MoP में बदलाव करने की जरूरत है.

जस्टिस शर्मा के बच्चों के सरकारी वकील बताकर सत्याग्रह का फैसला कितना सही?

जजों के बच्चे या रिश्तेदार बड़े वकीलों या लॉ फर्मों में नौकरी करते हैं. 2009 में सुप्रीम कोर्ट के जज आर. वी. रविधरन ने केजी बेसिन मामले में अंबानी बंधुओं के खिलाफ चल रहे मुकदमें से खुद को अलग कर लिया था क्योंकि उनकी बेटी उस लॉ फर्म में काम कर रही थीं, जो एक पक्ष को कानूनी सलाह दे रही थी. लेकिन, नैतिकता के ऐसे मापदंड अब खत्म हो रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज के बेटे को लॉ ऑफिसर बनाने के खिलाफ राजस्थान हाई कोर्ट में याचिका दायर हुई थी. जिन संस्थाओं और सरकारी विभागों के खिलाफ जज मुकदमा सुनते हैं, वहां पर जजों के बच्चों और रिश्तेदारों की नियुक्ति हितों का सीधा टकराव है.

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने सरकारी वकीलों की नियुक्ति में राजनीतिक पक्षपात और सिफारिश के कल्चर के खिलाफ कई बार आदेश दिए लेकिन सिस्टम में कोई सुधार नहीं हो रहा. दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने पार्टी से जुड़े लोगों को सरकारी वकील बनाया था.

अरुण जेटली ने केजरीवाल के खिलाफ अवमानना का मामला दायर किया था. उस मुकदमें में केजरीवाल की पैरवी के लिए वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने 3.8 करोड़ रुपए का बिल बनाया था जिसे कम करके 2 करोड़ रुपए किए गए. विवाद बढ़ने के बाद जेठमलानी ने कहा कि वे पूरा बिल माफ कर रहे हैं.

नेताओं की साख तो देश में काफी कमजोर है लेकिन जजों के इंसाफ पर लोगों को अभी भी भरोसा है. ऐसे में शराब घोटाले मामले की अपील में सुनवाई से जुड़े विवाद के बाद जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चे सरकारी पैनल से त्यागपत्र देकर नैतिकता का श्रेष्ठ मापदंड स्थापित कर सकते थे. जजों के बच्चों को वकील बनने का पूरा अधिकार है. लेकिन जजों और नेताओं के प्रभाव से उन्हें सरकारी मुकदमे मिलना अनीतिपूर्ण होने के साथ इंसाफ के रास्ते में सबसे बड़ा अवरोध है.

ऐसे में दिल्ली में OTT की तर्ज पर चल रहे इस ड्रामे से सबक लेते हुए जज और सरकारी वकीलों की नियुक्ति प्रणाली को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने की जरूरत है जिससे न्याय के मंदिर में सभी का भरोसा और बढ़ सके.

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