AI डेटा सेंटर्स में अरबों डॉलर का निवेश कहीं भारत में भीषण जल संकट तो पैदा नहीं कर देगा?
दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों गूगल, अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट ने भारत में AI डेटा सेंटर के लिए अरबों डॉलर निवेश करने का फैसला किया है

दुनिया की तीन बड़ी टेक कंपनियों गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन का मुख्यालय भले ही अमेरिका में हो, लेकिन इन तीनों कंपनियों ने भारत में AI लैब और डेटा सेंटर बनाने का फैसला किया है.
इन टेक कंपनियों ने यह फैसला ऐसे वक्त में लिया है, जब अमेरिका और चीन के बीच AI को लेकर जबरदस्त होड़ चल रही है. इस होड़ में जीत चाहे जिसकी भी हो, पर भारत भी इसका अहम गवाह बनने वाला है.
हम उस लड़ाई के गवाह बनने जा रहे हैं, जो हमारे देश की छह में से कुछ ऋतुओं को हमेशा के लिए हमसे छीन सकती है. क्या पता वह बसंत हो या फिर हेमंत या शिशिर! डर इस बात का भी है कि ये डेटा सेंटर हमारी नदियों और तालाबों को कहीं सूखा ना दे.
ऐसा हुआ तो सबकुछ होने के बावजूद हम पानी के लिए तड़पने लगेंगे. ठीक वैसे ही जैसे ढाई हजार साल पहले जब सिंधु घाटी सभ्यता अपने विकास के चरम पर थी, तब रहस्यमय तरीके से अचानक इसने अपनी चमक खो दी. यह सभ्यता ही विलुप्त हो गई. कई इतिहासकार मानते हैं कि जल संकट के कारण इस सभ्यता का अंत हुआ था.
ऐसे में सवाल उठता है कि जब भारत का बड़ा हिस्सा जल संकट से जूझ रहा है, तब AI डेटा लैब से जल संकट का खतरा कितना बड़ा है और यह कैसे देश के मौसम चक्र व ऋतुओं को प्रभावित कर सकता है?
दो किस्सों से समझें कैसे डेटा सेंटर्स ने लोगों को कर दिया पानी के लिए बेहाल
पहला किस्सा: अमेरिका के जॉर्जिया में पीने के पानी की किल्लत
2018 में अमेरिका के जॉर्जिया में फेसबुक ने 7.5 करोड़ डॉलर की लागत से एक विशाल डेटा सेंटर बनाने का फैसला किया.
इस खबर को सुनते ही न्यूटन काउंटी के लोग बेहद खुश हुए. उन्हें लगा कि अब उनके बच्चों को रोजगार के नए मौके मिलेंगे, लोगों की आमदनी बढ़ेगी. हुआ भी कुछ ऐसा ही. कुछ साल तक सबकुछ अच्छा चलता रहा.
अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट मुताबिक, महज कुछ साल बाद इस डेटा सेंटर के कारण न्यूटन काउंटी में आसपास के कुएं सूख गए. हालात ये हो गए कि यहां रहने वाले लोगों के घरों के नल तक सूखने लगे.
पड़ताल में पता चला कि AI सेंटर रोजाना 5 लाख गैलन पानी इस्तेमाल करता था, जो पूरी न्यूटन काउंटी के कुल दैनिक पानी उपयोग का लगभग 10 फीसद था.
इस तरह मेटा का विशाल डेटा सेंटर यहां के जल संसाधनों पर गंभीर दबाव डाल रहा है. परिणाम ये हुआ कि गर्मी के महीनों में पहले जिन क्षेत्रों में 100 फीट की गहराई पर पानी था, अब वहां 300 फीट तक खुदाई करने पर भी पानी नहीं मिलता. अब यहां के लोगों को डर है कि आने वाले समय में कहीं पानी की कमी के कारण उन्हें यहां से दूसरे जगहों पर जाने को मजबूर ना हो पड़े.
दूसरा किस्सा: ओरेगॉन में गूगल ने पैदा किया संकट
अमेरिकी राज्य ओरेगॉन बड़ी कंपनियों के डेटा सेंटर का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा है. जब शहर में पानी की किल्लत होने की आशंका जाहिर होने लगी, तो एक मीडिया संस्थान 'द ओरेगोनियन' ने गूगल को चैलेंज करके पूछा कि कंपनी यह बताए कि ओरेगॉन में स्थित गूगल का एक डेटा सेंटर कितना पानी खर्च करता है.
यह मामला गूगल के लिए तब थोड़ा पेचीदा हो गया, जब अखबार इस मामले को लेकर कोर्ट चला गया. एक साल तक गूगल ने इस मामले को आगे बढ़ाया, लेकिन आखिर में इस मीडिया संस्थान के आगे गूगल को झुकना पड़ा.
इसके बाद गूगल ने आधिकारिक तौर पर दिसंबर 2022 में एक रिपोर्ट जारी कर डेटा सेंटर में पानी के इस्तेमाल होने की जानकारी दी. इसमें 2021 के पूरे वर्ष के डेटा सेंटर्स के पानी के उपयोग की जानकारी दी गई है. इस रिपोर्ट मुताबिक, ओरेगॉन के 'द डेल्स' शहर में गूगल के डेटा सेंटर्स ने 2021 में 274.5 मिलियन गैलन (लगभग 1.04 अरब लीटर) पानी का इस्तेमाल किया, जो शहर के कुल पानी उपयोग का लगभग 29 फीसदी था. यह पानी मुख्य रूप से सर्वर को ठंडा करने के लिए इस्तेमाल हुआ.
डेटा सेंटर और AI लैब में पानी की बड़ी मात्रा में जरूरत क्यों पड़ती है?
AI लैब और डेटा सेंटर में पानी का इस्तेमाल मुख्य तौर पर दो तरह से होता है-
मशीनों को ठंडा करने के लिए: इन लैब और डेटा सेंटर में बड़े-बड़े सर्वर्स लगे होते हैं, जिनमें लगातार बिजली चलती है. इससे ये मशीन बहुत गर्म हो जाती हैं. इन्हें ठंडा रखने के लिए साफ ताजा पानी बहुत अहम होता है. कुछ सिस्टम में इस्तेमाल किए गए पानी का 80 फीसद तक हिस्सा भाप बनकर हवा में उड़ जाता है.
बिजली पैदा करने के लिए: AI से सवाल पूछने पर सामान्य ऑनलाइन सर्च के मुकाबले कहीं ज्यादा कंप्यूटिंग पावर की जरूरत होती हैं. इस वजह से इनमें बिजली की खपत भी ज्यादा होती है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, AI से किया गया एक सवाल गूगल पर किए गए एक सर्च के मुकाबले करीब 10 गुना ज्यादा बिजली खर्च करता है. बिजली पैदा करने के लिए पावर प्लांट में पानी का इस्तेमाल होता है.
AI 10 सवालों के जवाब देने में आधा लीटर तक पानी खर्च करता है
अमेरिका के कैलिफोर्निया और टेक्सस में की गई एक रिसर्च में पाया गया कि ChatGPT‑3 मॉडल से 10 से 50 सवालों के जवाब देने में लगभग आधा लीटर पानी लगता है. इसका मतलब है कि हर जवाब के लिए करीब 2 से 10 चम्मच पानी की खपत होती है.
पानी की जरूरत इस पर भी निर्भर करती है कि जवाब कितना लंबा है, जवाब कहां प्रोसेस हो रहा है और कैलकुलेशन में किन चीजों को शामिल किया गया है.
हालांकि ओपन AI के CEO सैम ऑल्टमैन का कहना है कि ChatGPT से किए गए एक सवाल का जवाब पाने में लगभग एक चम्मच के पंद्रहवें हिस्से जितना पानी लगता है.
AI लैब में समुद्री पानी नहीं, बल्कि पीने वाले पानी का ही इस्तेमाल क्यों होता है?
अमेरिकी संस्था पर्यावरण और ऊर्जा अध्ययन संस्थान (EESI) की रिसर्च मुताबिक, चार प्रमुख वजहों से सी-वॉटर या समुद्री पानी के बजाय ग्राउंड वॉटर का इस्तेमाल होता है-
कोरोजन (जंग लगना) का खतरा: सी-वॉटर में नमक (सोडियम क्लोराइड) होता है, जो मेटल पाइप्स, हीट एक्सचेंजर्स और कूलिंग टावर्स को तेजी से खराब कर देता है. फ्रेशवाटर न्यूट्रल pH वाला होता है, जो सिस्टम को सुरक्षित रखता है.
कूलिंग की दक्षता कम होना: मशीन को ठंडा करने के लिए जब पानी डालते हैं, तो पानी वाष्प बनकर गर्मी सोखता है. सी-वॉटर में नमक वाष्पीकरण को रोकता है, जिससे कूलिंग इफेक्ट 2.8 फीसद से 40 फीसद तक कम हो जाता है.
डिसैलिनेशन (नमक हटाने) की चुनौतियां: सी-वॉटर यूज करने के लिए पहले डिसैलिनेशन प्लांट लगाना पड़ता है, जो बहुत महंगा है.
भौगोलिक और रिलायबिलिटी: ज्यादातर डेटा सेंटर्स इनलैंड (समुद्र से दूर) बनते हैं, जहां सी-वॉटर पहुंचाना महंगा है. यहां नदियों या ग्राउंडवॉटर के रूप में ताजा पानी आसानी से उपलब्ध होता है.
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रोफेसर डॉ. शाओलेई रेन के मुताबिक, यह सस्ता और सुरक्षित है, इसलिए ठंडा पानी का इस्तेमाल होता है.
भारत में पानी की किल्लत के बीच AI लैब क्यों खतरनाक साबित हो सकती हैं?
विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने 15 जनवरी 2025 को जारी एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि भारत के कई इलाकों में अगले दो सालों (2025 से 2027 तक) के दौरान जल आपूर्ति की कमी सबसे गंभीर समस्या के रूप में उभरकर सामने आ सकती है.
वहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की वार्षिक ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट के 20वें संस्करण में भारत को मैक्सिको, मोरक्को, ट्यूनीशिया और उज्बेकिस्तान के साथ उन पांच देशों में शामिल किया गया है, जहां आने वाले सालों में सबसे ज्यादा पानी का संकट होने वाला है.
भारत उन देशों में शामिल है, जो सबसे ज्यादा भूजल का इस्तेमाल करता है. 2021 में इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा था कि भूजल बहुत बड़ी चुनौती है क्योंकि इस पर हमारी निर्भरता दुनिया में सबसे ज्यादा है.
देश भर में लगभग 1,580 (कुल 7,197 में से) विकास खंडों में भूजल का अत्यधिक या गंभीर रूप से दोहन हुआ है. भारत के 735 में से 257 जिलों में गहरा जल संकट है. अपने दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री ने पानी से जुड़े सभी विभागों और मंत्रालयों को एक मंत्रालय के अधीन कर दिया है. हमने प्राकृतिक जलस्रोतों (एक्विफर) को चिह्नित करने के कार्यक्रम को गति दी है और इस डेटा के आधार पर, हम एक पुनर्भरण (रिचार्ज) तंत्र पर काम करेंगे. हमारा जोर जल संसाधनों की दीर्घकालिकता पर है.
ऐसे में साफ है कि अगर डेटा सेंटर के लिए भूजल का इस्तेमाल बढ़ा तो देश में पीने के पानी की भारी किल्लत होने की आशंका है.
भारत में डेटा सेंटर चलाने वाली कंपनियां तोड़ रही नियम-कानून
डाउन टू अर्थ वेबसाइट के मुताबिक, देश के प्रमुख डेटा सेंटर ऑपरेटर जैसे एनएक्सट्रा (एयरटेल), अदानीकॉनैक्स, एसटीटी जीडीसी इंडिया, एनटीटी, सीआरटीएलएस और सिफी टेक्नोलॉजीज अपनी पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) रिपोर्टों में पानी के इस्तेमाल की पूरी जानकारी नहीं दे रहे हैं. यह एक गंभीर अपराध है.
एयरटेल की Nxtra आठ भारतीय शहरों में 15 हाइपरस्केल डेटा सेंटर चलाती हैं. 2025 की ESG रिपोर्ट में कंपनी ने कुल 216,357 किलोलीटर (KL) जल खपत का खुलासा किया. हालांकि, Nxtra ने 2023 या 2024 के लिए जल खपत के आंकड़े जारी नहीं किए हैं. अदाणी समूह और एजकॉनेक्स की संयुक्त डेटा कंपनी अदानीकॉनेक्स ने भी इस बात की जानकारी आज तक नहीं दी है कि उनके डेटा सेंटर में कितना पानी इस्तेमाल हो रहा है.
AI एक्सपर्ट लुइजा जारोवस्की के मुताबिक, AI के लिए भारत ने EU जैसे सख्त नियमों के बजाय सेल्फ-रेगुलेशन अपनाया है. यही वह नजरिया है, जो AI कंपनियों को EU या अमेरिका के बजाय भारत में डेटा सेंटर खोलने के लिए प्रोत्साहित करता है.
AI इन्वेस्टर अविरल भटनागर के मुताबिक, "भारत में बिजली, लेबर सस्ते हैं. यहां जमीन सरकार आसानी से कम कीमत में मुहैया कराती है. यहां पानी और पर्यावरण को लेकर कड़े नियम-कानून नहीं हैं. इस वजह दुनिया की कंपनियां भारत में डेटा सेंटर खोलना चाहती हैं.”
क्या पानी के अलावा AI लैब को ठंडा करने के लिए कोई और ऑप्शन नहीं है?
कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि कूलिंग के और भी विकल्प हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, रिवरसाइड के प्रोफेसर शाओलेई रेन के मुताबिक, पानी के बजाय ड्राई या एयर कूलिंग सिस्टम का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
इसके अलावा, कई कंपनियां "क्लोज्ड लूप" सिस्टम तैयार कर रही हैं, जिसमें पानी या कोई और तरल लगातार सिस्टम में घूमता रहता है और उसे बार-बार उड़ाना या बदलना नहीं पड़ता.
इसके अलावा, कुछ कंपनियां अब समुद्र के पानी या फैक्ट्री का गंदा पानी (जो पीने लायक नहीं होता) इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही हैं. हालांकि, फिलहाल इन सभी विकल्पों की लागत पानी के मुकाबले ज्यादा है.
पानी के अलावा डेटा सेंटर कैसे हमारे मौसमों को प्रभावित कर सकते हैं?
डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक डेटा सेंटर से 2024 में 330 मिलियन टन कार्बन डाई ऑक्साइड गैस (CO₂) निकला था. यह मात्रा आने वाले समय में और बढ़ने वाली है. इसके अलावा, इससे भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है जो पर्यावरण को खतरनाक स्तर तक प्रदूषित करने में अहम भूमिका निभाता है.
जलवायु परिवर्तन यानी क्लाइमेट चेंज में ये सभी कारक अहम भूमिका निभाते हं. इससे मौसम चक्र और ऋतुएं प्रभावित हो सकती हैं. एक बुरा नतीजा अनियमित बाढ़ और सूखे में भी दिख सकता है.