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Homeनेशनलफोटो गैलरीभारत में मूर्तियों की राजनीति का क्या है इतिहास, तस्वीरों से जानिए

भारत में मूर्तियों की राजनीति का क्या है इतिहास, तस्वीरों से जानिए

दुनिया में स्टैच्यू पॉलिटिक्स की पूरी कहानी, भारत में इसकी शुरूआत कैसे हुई...

राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर बनी श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमाएं.
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25 दिसंबर 2025, भारतरत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के दिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में PM नरेंद्र मोदी ने 'राष्ट्र प्रेरणा स्थल' का उद्घाटन किया.

 

इस मौके पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 65 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया.

 

इन मूर्तियों को बनाने में 230 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हुए हैं. यही वजह है कि उद्घाटन के साथ ही इसपर सियासी बवाल मच गया. समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा, "BJP केवल राजनीतिक लाभ के लिए गगनचुंबी मूर्तियां बनाती है. BJP की बनाई मूर्तियां सियासी होती हैं."

 

यह पहला मौका नहीं है, जब BJP पर मूर्तियों को लेकर इस तरह के आरोप लगे हैं. इससे पहले 4 दिसंबर 2023 को महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग में PM नरेंद्र मोदी ने छत्रपति शिवाजी महाराज की 35 फीट ऊंची प्रतिमा का उद्घाटन किया था. 266 दिन बाद 26 अगस्त को थोड़ी तेज हवा चली और शिवाजी की यह विशाल प्रतिमा ढह गई थी.

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तब पीएम मोदी ने बिना किसी देरी के 30 अगस्त को पालघर की एक रैली में माफी मांगते हुए कहा था, "हमारे लिए छत्रपति शिवाजी महाराज सिर्फ एक महाराजा नहीं हैं. हमारे लिए वे पूजनीय हैं. आज मैं छत्रपति शिवाजी महाराज के सामने नतमस्तक हूं और उनसे क्षमा मांगता हूं."

 

तब महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव था. संभव है कि शिवाजी की मूर्ति के गिरने पर इसलिए ही पीएम मोदी ने माफी मांगी हो. लेकिन, सवाल है कि क्या सच में मूर्तियां सियासी होती हैं, क्या ये सियासी फायदे के लिए बनाई जाती हैं और भारत की राजनीति कब और कैसे इसकी शुरुआत हुई?

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42 हजार साल पुराना है देश और दुनिया में मूर्तियों का इतिहास

 

मूर्तियों पर होने वाली राजनीति को समझने से पहले मूर्तियों का इतिहास जानना बेहद जरूरी है. दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञात मानव आकृति वाली मूर्ति वीनस ऑफ होहले फेल्स (Venus of Hohle Fels) को बताया जाता है. यह करीब 42 हजार साल पहले हाथियों के दांत से बनी एक महिला की मूर्ति है.

 

इसके अलावा, 25 अगस्त 1939 को भूविज्ञानी ओट्टो वोल्डिंग को जर्मनी की एक गुफा से हाथीदांत की खंडित मूर्ति मिली. उन्होंने दावा किया कि 'लॉयन मेन' नाम की यह मूर्ति करीब 35 हजार से 41 हजार साल पुरानी है. उन्होंने इसे दुनिया की शुरुआती मूर्तियों में से एक कहा था. दुनिया की पहली आदमकद यानी 5 फीट 11 इंच की मूर्ति 'उफा मैन' की है. 11 हजार साल पुरानी मेसोपोटामिया सभ्यता की यह मूर्ति तुर्की में पाई गई थी.

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अगर भारत की बात करें तो ऐसा दावा किया जाता है कि भारत में करीब साढ़े 28 हजार साल पहले कल्प विग्रह की छोटी मूर्ति मिली थी. इसके अलावा, 'डांसिंग गर्ल' की एक मूर्ति आज से करीब 4500 साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता के समय का है.

 

भारत के हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में मूर्तियों को पूजने की परंपरा रही है. इतिहासकार इरफान हबीब का कहना है कि मूर्ति पूजन कब शुरू हुआ, इसको लेकर अलग-अलग दावे हैं. इनमें एक दावा यह है कि करीब 3500 साल पहले आर्य नस्ल के भारत आने से पहले यहां मूर्ति पूजा की शुरुआत हुई. तब छोटी-छोटी मूर्तियां होती थीं.

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मूर्तियों पर शुरू हुई राजनीति का किस्सा

 

मूर्तियों पर राजनीति की शुरुआत आज से करीब 600 साल पहले यानी 15वीं शताब्दी से मानी जाती है. यह रेनेसां (पुनर्जागरण) यानी दुनिया में बदलाव का समय था. इसी समय कला-विज्ञान ने पुरानी सोच को चुनौती देना शुरू किया. माना जाता है कि इसी दौर में सत्ताधारी वर्ग या प्रभावशाली लोगों ने मूर्तियों का इस्तेमाल अपने पक्ष में करना शुरू किया. एरागॉन की राजकुमारी को खुश करने के लिए बनाई गई इटली के कलाकार फ्रांसेस्को लॉराना की मूर्ति इसका उदाहरण है.

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एशिया रिसर्च न्यूज और एनसायक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के मुताबिक, न्यूयॉर्क के लिबर्टी आइलैंड पर खड़ी स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी भी मूर्तियों के राजनीतिक इस्तेमाल का उदाहरण है. इसका उद्घाटन 1886 में अमेरिकी राष्ट्रपति ग्रोवर क्लीवलैंड ने किया था. यह अमेरिका और फ्रांस की दोस्ती की प्रतीक है.

 

यह जुलाई 1884 में फ्रांस में बनी और इसमें 31 टन तांबे, 125 टन स्टील का इस्तेमाल किया गया था. इसे अमेरिका लाने के लिए 350 टुकड़े किए गए थे.

 

इसी तरह 1967 में बनी द मदरलैंड कॉल्स प्रतिमा सेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान नाजी जर्मन और सोवियत सेना के बीच जंग में मारे गए सोवियत आर्मी के जवानों के सम्मान में बनाई गई. 85 मीटर की यह प्रतिमा रूस ही नहीं पूरे यूरोप में सबसे ऊंची है.

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अगर भारत की बात करें तो इतिहासकार इरफान हबीब का कहना है कि सम्राट अशोक और मौर्य काल के दौरान देश में खूब राजनीतिक स्तंभ बने हैं. 321 से 300 ईसा पूर्व यानी करीब 2300 साल पहले मौर्य साम्राज्य में यक्ष-यक्षिणी और दिगंबर की प्रतिमाएं बनाई गई थीं.

इसके अलावा, 232 ईसा पूर्व में बनी सम्राट अशोक के समय का अशोक स्तंभ भारत की मूर्ति कला के सबसे पुराने उदाहरणों में ऐसे एक है. सम्राट अशोक और मौर्य काल के बाद अंग्रेजों ने देश में इस परंपरा को आगे बढ़ाया. 1921 में विक्टोरिया मेमोरियल के सामने बनी वायसराय रहे लॉर्ड कर्जन की मूर्ति इसका उदाहरण है.

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1900 के बाद दुनियाभर में सियासी मूर्तियों का प्रयोग बढ़ा

 

1900 के बाद सोवियत संघ (रूस) में लेनिन सत्ता में थे. इस समय सियासी फायदे के लिए बड़े-बड़े स्मारक और मूर्तियों को बनाने की परंपरा शुरू हुई. पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई के मुताबिक, रूस में बनी मदरलैंड कॉल्स प्रतिमा हो या जोसेफ स्टालिन और लेनिन की प्रतिमाएं, ये सब राजनीतिक वजहों से बनाई गई थीं. भारत में आजादी के बाद अलग-अलग सरकारों ने रूस की तरह बड़ी-बड़ी मूर्तियां और स्मारक अपनी ताकत दिखाने के लिए बनानीं शुरू कीं.

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विशाल मूर्तियों का पॉलिटिकल टूल की तरह इस्तेमाल क्यों होता है?

 

पॉलिटिकल एक्सपर्ट किदवई कहते हैं कि दुनिया के जिन भी देशों में मूर्तिपूजा की परंपरा है, वहां उनका राजनीतिकरण करना आसान होता है. वहीं, इतिहासकार इरफान हबीब कहते हैं कि प्रतिमाएं और स्मारक सिर्फ एक स्ट्रक्चर नहीं, बल्कि एक समय का इतिहास छिपाए होते हैं. लोग जब उस स्मारक को देखते हैं तो उन्हें अपने इतिहास की याद आती है या उसे जानना चाहते हैं.

 

रशीद कहते हैं कि भारत में पहले कांग्रेस ने महापुरुषों और राजनेताओं की मूर्तियां बनवाई. अब BJP भी महापुरुषों और हिंदू धर्म से जुड़े देवताओं की मूर्तियां बनवाकर लोगों की सहानुभूति लेने की कोशिश कर रही है. इसमें कोई दो राय नहीं कि मूर्तियों से जितनी शासकों और सरकारों की लोकप्रियता बढ़ती है, उनके टूटने और गिरने से उतनी ही शासकों की इमेज खराब होती है.

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मूर्तियों पर रिसर्च करने वाली कजरी जैन के मुताबिक, आजादी के बाद सरकारों ने मूर्तियों की राजनीति को कैसे बढ़ावा दिया, इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं- 1961 में तमिलनाडु के कांग्रेसी सीएम कामराज ने मद्रास में अपनी प्रतिमा स्थापित करने के लिए नगर निगम को इजाजत दी थी. वहीं, 1967 में DMK सत्ता में आई तो उसने सड़क किनारे सी.एन अन्नादुरई की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं बनवाईं.

 

2007 में बसपा की मायावती ने सीएम बनते ही कांशीराम और पार्टी के चुनाव चिह्न हाथी की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं बनवाईं. 2014 के बाद NDA सरकार ने दुनिया में सबसे बड़ी सरदार पटेल की मूर्ति बनाने का दावा किया. इतना ही नहीं. 221 मीटर के राम की मूर्ति और फिर महाराष्ट्र में शिवाजी मूर्ति बनवाकर BJP ने मूर्तियों की राजनीति को बढ़ावा दिया.

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BJP शासित राज्यों में देश की 5 बड़ी मूर्तियां

 

अगर देश की सबसे ऊंची मूर्तियों की बात करें तो BJP शासित राज्यों में देश की 5 सबसे बड़ी मूर्तियां हैं. जो कुछ इस तरह से हैं-

1. स्टैच्यू ऑफ यूनिटी: गुजरात : 182 मीटर

2. भगवान शिव की स्टैच्यू ऑफ बिलीफ : राजस्थान :112 मीटर

3. भगवान राम की मूर्ति: उत्तर प्रदेश : 221 मीटर

4. छत्रपति शिवाजी की प्रतिमा: महाराष्ट्र : 212 मीटर

5. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा: महाराष्ट्र : 107 मीटर

 

अगर दुनिया की बात करें तो टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दोगुनी ऊंची सरदार पटेल की स्टैच्यू ऑफ यूनिटी है. चीन की सबसे ऊंची स्प्रिंग टेंपल बुद्धा की मूर्ति 153 मीटर की है. ये दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची मूर्ति है. इसके अलावा, जापान में उशीकू गाइबुत्सु की मूर्ति 120 मीटर ऊंची है. अमेरिका के स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी की ऊंचाई 93 मीटर और रूस के द मदरलैंड कॉल्स की ऊंचाई 85 मीटर है.

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