कोरोना के प्रसार को रोकेगा यह अल्ट्रावायोलेट टॉर्च
भीड़ वाले इलाकों, स्कूल-कॉलेजों, सरकारी-गैरसरकारी दफ्तरों में इस्तेमाल करने के लिए सैनिटाइजर टनेल का निर्माण करने वाले शिवाजी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉक्टर राजेंद्र सोनकवडे के मार्गदर्शन में अनिकेत सोनकवडे और पूनम सोनकवडे ने इस यूवी अल्ट्रावायोलेट टॉर्च का निर्माण किया है.

कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए अलग-अलग उपायों के साथ अनुसंधान भी किए जा रहे हैं. अब एक ऐसे टॉर्च का निर्माण किया गया है जिसकी मदद से कोरोना का प्रसार रोका जा सकता है. यह यूवी अल्ट्रावायोलेट टॉर्च पूरी तरह से भारतीय है और इसकी कीमत साढ़े चार हजार से पांच हजार रूपए है. इसे बाजार से खरीदा जा सकता है.
राज्य के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री उदय सामंत का कहना है कि इस टॉर्च के माध्यम से रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली चीजों के जरिए कोरोना के प्रसार को रोका जा सकता है. कोरोना संकट के दौरान हम सब इससे बचने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में हम विभिन्न वस्तुओं को छू रहे हैं और इससे कोरोना वायरस दूसरों तक पहुंचना आसान हो जाता है. इसलिए इन वस्तुओं पर से वायरस को निष्क्रिय करने के लिए इस टॉर्च का इस्तेमाल किया जा सकता है. इस टॉर्च के फ्लैश लाइट से 16-33 वाट की क्षमता वाली पराबैंगनी किरणें निकलती हैं जो वायरस को निष्क्रिय करने में सक्षम है. पराबैंगनी की किरणें विषाणु पर पड़ती है तो उससे आरएनए की संरचना बदल जाती है और फिर विषाणु स्वयं की संख्या बढ़ाने में असमर्थ हो जाता है.
भीड़ वाले इलाकों, स्कूल-कॉलेजों, सरकारी-गैरसरकारी दफ्तरों में इस्तेमाल करने के लिए सैनिटाइजर टनेल का निर्माण करने वाले शिवाजी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉक्टर राजेंद्र सोनकवडे के मार्गदर्शन में अनिकेत सोनकवडे और पूनम सोनकवडे ने इस यूवी अल्ट्रावायोलेट टॉर्च का निर्माण किया है. अनिकेत औरंगाबाद यूनिवर्सिटी के दीनदयाल उपाध्याय कौशल केंद्र के व्यवसायिक कोर्स के प्रथम वर्ष के छात्र हैं तो पूनम पुणे के आबासाहेब गरवारे कालेज की बीएससी (सूक्ष्म जीव शास्त्र) की दि्वतीय वर्ष की छात्र हैं. इस टॉर्च को मुंबई की पीएलए इलेक्ट्रो अप्लायसेस प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी बाजार में बेच रही है.
वैसे, भारत में इस तरह के टॉर्च का इस्तेमाल पानी को शुद्ध करने के लिए किया जाता रहा है. पानी के जीव-जंतु जीवाणु को मारने के लिए पराबैंगनी किरण का इस्तेमाल होता है. लेकिन अब अनुसंधान के जरिए इसे कोरोना के वायरस के प्रसार को रोकने में भी इसका इस्तेमाल किया जाएगा. प्रोफेसर सोनकवडे ने इंडिया टुडे हिंदी का बताया कि कोरोना संकट के समय जब हम सब्जी मार्केट से सब्जी खरीदकर लाते हैं, दूध के पैकेट लाते हैं, इसमें पैसों का लेनदेन होता है, घर या दफ्तरों में कंप्यूटर, की-बोर्ड और माउस का एक से ज्यादा लोग इस्तेमाल करते हैं, टेलीफोन, मोबाइल का इस्तेमाल होता है, इन पर संपर्क से विषाणु के संसर्ग बढ़ने का खतरा बना रहता है.
इन सारी चीजों से विषाणु को निष्क्रिय करने के लिए यूवी अल्ट्रावायोलेट टॉर्च की मदद ली जा सकती है. इन सारी चीजों पर टॉर्च की पराबैंगनी किरणें दो-तीन मिनट तक डाली जाती है और उसके प्रभाव से संक्रमण नहीं फैलता है. प्रोफेसर सोनकवडे का कहना है कि कोरोना वायरस के प्रकोप को रोकने के लिए चीन और अमेरिका भी विमान, हेलीकाप्टर, बस और इलेक्ट्रिक वाहनों पर इस पराबैंगनी किरणों का इस्तेमाल कर रहा है. प्रोफेसर ने कहा है कि इस टॉर्च का कोई साइडइफैक्ट नहीं है. लेकिन कोरोना संक्रमण हाथ से संपर्क करने पर फैलता है यह जानकर कोई इस टॉर्च की पराबैंगनी किरणों का इस्तेमाल अपनी हथेली पर न करे. यह सावधानी बरतनी चाहिए.
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