कैसे बस गए दिल्ली के दिल में आप
जहां एक तरफ छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और अब दिल्ली, एक के बाद एक सात राज्यों को हारने के बाद भाजपा को चुनाव प्रचार की रणनीति में बदलाव लाने की जरूरत साफ दिखाई दे रही है वहीं इन चुनाव नतीजों ने अरविंद केजरीवाल का कद और बड़ा कर दिया. जहां ममता बनर्जी, तेलंगाना के केसीआर जैसे नेता मोदी की आंधी की चपेट में आ गए वहीं केजरीवाल ने अपनी दिल्ली में भाजपा को कह सकते हैं, फटकने नहीं दिया.

लगातार तीसरी बार दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद अरविंद केजरीवाल ने भावविभोर होकर कहा, आपने गजब कर दिया. शुक्रिया, आइलव यू दिल्ली. फिर उन्होंने हनुमान जी का भी शुक्रिया किया. घंटेभर के अंदर वे हनुमान जी के मंदिर भी पहुंचे. केजरीवाल को शुरू से ही यकीन था कि वे दिल्ली जीतेंगे. लेकिन खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दिल्ली की सड़कों पर उतरकर वोट की अपील करना कहीं न कहीं आम आदमी पार्टी के भीतर उथल-पुथल तो पैदा कर रही ही थी. ‘आप’ को अब भी भरोसा था कि जीतेंगे वे ही लेकिन भाजपा उनकी जीत को कुछ छोटा जरूर करेगी. बातचीत के दौरान आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने दबे रुख इसे स्वीकारा की दिल्ली में ‘शाहीन बाग’ का फैक्टर काम करेगा. जैसे आम चुनाव से पहले बालाकोट ने असर किया था वैसे तो नहीं लेकिन भाजपा को सम्मानजनक सीटें मिल सकती हैं. पर ऐसा क्या हुआ कि दिल्ली ने ‘आप’ को फिर तवज्जो दी? ऐसा क्या हुआ कि कुछ महीने पहले ही सातों लोकसभा सीटें भाजपा को देने वाली राजधानी ने विधानसभा चुनाव में उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया?
काम आया, काम-काज
‘‘अगर सरकार ने पिछले पांच साल काम किया हो तो ही हमें वोट दें, अगर नहीं, तो भाजपा को दें.’’ 200 यूनिट तक बिजली, 20,000 लीटर तक मुफ्त पानी ने खूब असर किया. सरकारी स्कूलों की हालत दुरुस्त करने के अभियान को चुनाव प्रचार के दौरान प्राथमिकता में लिया गया. 2013 और 2015 के चुनाव प्रचार में कांग्रेस और भाजपा पर निशाना साधने वाले अरविंद केजरीवाल इस बार जहां तक हो सका इससे बचते रहे. चुनाव जैसे-जैसे करीब आते गए अरविंद केजरीवाल ने यह कहना भी छोड़ दिया कि ‘‘वे परेशान करते रहे, हम काम करते रहे.’’
वोट नहीं बंटने दिया
कांग्रेस को इस बार 5 फीसद से कम वोट मिले जबकि पिछली बार 9.7 फीसद मिले थे. आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता दिल्ली वालों से वोट की अपील करने के साथ यह भी समझा रहे थे कि कांग्रेस को दिया गया हरेक वोट भाजपा को जीत की तरफ बढ़ाएगा. इसलिए अगर भाजपा को हराना है तो वोट को कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच बांटे नहीं. शाहीन बाग हो, निजामुद्दीन या फिर दिल्ली में अन्य एक दर्जन से ज्यादा जगहों में सीएए और एनआरसी के खिलाफ चल रहे आंदोलनों में शामिल कांग्रेसी वोटर भी आम आदमी पार्टी को ही वोट दें, इसे पक्का करने की हर मुमकिन कोशिश की गई.
मध्य वर्ग को भी नहीं दिया छिटकने
कुछ महीनों पहले हुए लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सारी की सारी सीटें पाकर अविभूत हुई भाजपा को लगता था कि मध्य वर्ग भाजपा को विधानसभा में भी अपनाएगा. शायद यही भरोसा भाजपा को था इसीलिए प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली में जमकर हुंकार भरी. लेकिन इसकी काट भी अरविंद केजरीवाल ने निकाल ली. वे कई औपचारिक और अनौपचारिक बैठकों में न केवल खुद बल्कि कार्यकर्ताओं से भी यह कहलाते रहे कि ‘केंद्र के लिए मोदी और दिल्ली के केजरीवाल.’
...और आखिरी दांव भी आया काम
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा गांधी ने मंदिरों के चक्कर लगाए, मौली बंधवाई, टीके लगवाए. लेकिन कुछ खास असर इसका नहीं दिखा. पर केजरीवाल जो पिछली बार जामा मस्जिद के शाही इमाम से समर्थन लेने से बचते रहे, इस बार चुनाव के प्रचार के आखिरी समय में हनुमान जी की शरण में जा बैठे. उन्होंने खुद को न केवल हनुमान भक्त कहा, बल्कि हनुमान चालीसा भी सुनाई. दरअसल, केजरीवाल ने पहले जनता को यह बताया कि वे धर्म आधारित नहीं बल्कि काम-काज पर आधारित सरकार के हिमायती हैं. लेकिन प्रचार के अंत में वे ‘शाहीन बाग’ के सांप्रदायिक प्रभाव की काट के तौर पर अपना आखिरी दांव भी चल बैठे. दांव सटीक बैठा और प्रभू की कृपा उन पर बरसी भी.
छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और अब दिल्ली एक के बाद एक सात राज्यों को हारने के बाद भाजपा को चुनाव प्रचार की रणनीति में बदलाव लाने की जरूरत है. यह भी समझने की जरूरत है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे एक नहीं होते. आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों में पैर पसारने की कोशिश करने के बाद जल्द ही समझ गए कि उनका फोकस दिल्ली से तनिक भी नहीं हटना चाहिए. इन चुनाव नतीजों ने अरविंद केजरीवाल का कद और बड़ा कर दिया. जहां ममता बनर्जी, तेलंगाना के केसीआर जैसे नेता मोदी की आंधी की चपेट में आ गए वहीं केजरीवाल ने अपनी दिल्ली में भाजपा को कह सकते हैं, फटकने नहीं दिया.
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