दूसरा पहलूः हम ही तो हिन्दोस्तान हैं
आंदोलनकारियों की हौसला अफजाई करने के लिए वरुण ग्रोवर, असीम अब्बासी के बाद जावेद अख्तर ने भी उठाई क़लम. असीम अब्बासी के गाने को गाया और संगीतबद्ध किया है रूमी राजीव साहिर ने और जावेद अख्तर के गाने को संगीत से सजाया है जतिन-ललित ने.

विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) कानून और प्रस्तावित एनआरसी के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन में प्रतिरोध और इंकलाबी शायरी का बोलबाला है. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, हबीब जालिब और पुराने शायरों की इंकलाबी शायरी के साथ ही नए शायरों की नज्में पढ़ी जा रही हैं. मनोरंजन उद्योग से जुड़ी हस्तियां इस आंदोलन को अपनी तरह से समर्थन दे रही हैं.
सोमवार को एक गाना और आ गया जिसे लिखा है जावेद अख्तर ने और संगीत से सजाया है जतिन-ललित ने. इस गाने का स्थायी है ‘आवाज़ दो हम एक हैं'. यह मुखड़ा जावेद अख्तर के वालिद जां निसार अख्तर ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय देश के लोगों में जोश भरने के लिए लिखा था.
यह किसी भी फिल्म का गाना नहीं है लेकिन स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर खूब बजता है और लोगों में देशभक्ति की भावना भरता है.
जावेद अख्तर ने स्थायी ‘आवाज़ दो हम एक हैं' के बाद दो अंतरे लिखे हैं, जिनमें मुश्किल घड़ी में आगे बढ़ने और एकता बनाए रखने का आह्वान किया गया है. यह भी कोई फिल्मी गाना नहीं है.
देश के मौजूदा मूड को ध्यान में रखकर लिखा गया यह गाना जहां एक तरफ नफरत की सियासत पर चोट करता है, वहीं इससे बचने के लिए नौजवानों को हिंदुस्तान की एकता की खातिर आगे बढ़ने का आह्वान करता है. बोल और संगीत के साथ अदायगी की वजह से आने वाले दिनों में यह मक़बूल हो सकता है. इसके बोल हैंः
एक है अपनी ज़मीं
एक है अपना गगन
एक है अपना जहां
एक है अपना वतन
अपने सभी सुख एक हैं
अपने सभी ग़म एक हैं
आवाज़ दो, आवाज़ दो हम एक हैं, हम एक हैं
(नए गाने में इतना जां निसार अख्तर के 1962 वाले गाने लिया गया है, लेकिन इसके बाद का हिस्सा बदल जाता है, जो आपको नीचे के दो अंतरों में दिखेगा.)
गहरे अंधेरे हैं तो क्या
ज़ालिम लुटेरे हैं तो क्या
रोके से हम रुकते नहीं
ये सर कहीं झुकते नहीं
इक जोश इक हिम्मत लिए
सच्चाई की ताकत लिए
बढ़ता चले ये कारवां
बढ़ते चलें हम नौजवां
नारों से गुजेंगे जहां
सुन ले ज़मीं ओ आसमां
गांधी की हम संतान हैं
हम ही तो हिंदोस्तान हैं
आवाज़ दो, आवाज़ दो हम एक हैं, हम एक हैं
आवाज़ दो हम एक हैं, हम एक हैं
धर्म और मज़हब, जात की
नफ़रत की जिसने बात की
अब होनी उसकी हार है
हम लोगों में बस प्यार है
यहां सारे धर्म और जात हैं
हाथों में सबके हाथ है
सारा जहां है देखता
हिन्दोस्तां की एकता
ऐ दोस्तो, ऐ साथियो
हम भी कहें, तुम भी कहो
गांधी की हम संतान हैं
हम ही तो हिन्दोस्तान हैं
आवाज़ दो, आवाज़ दो हम एक हैं, हम एक हैं
आवाज़ दो हम एक हैं, हम एक हैं
हम एक हैं
हम एक हैं
हम एक हैं
इसी तरह युवा गीतकार और शायर असीम अब्बासी ने एक तराना लिखा है, जिसे रूमी राजीव साहिर ने गाया और कंपोज किया है. बिहार के निवासी राजीव इतिहास के छात्र रहे हैं और संगीत सीख रहे हैं. उन्होंने असीम की नज्म को बहुत खूबसूरत अंदाज में गाया है. प्रतिरोध की इस शायरी में इनकार की भावना साफ है. सोशल मीडिया में तैर रहे इस गाने का कंसेप्ट यासीन ने तैयार किया है. इसे रविवार को रिलीज किया गया.
शाहों की ख़ुदाई के आगे,
हम सिर को झुकाएं, ना होगा,
इस नफरत के क़ानून को हम,
माथे पे लगाएं, ना होगा,
कह दो ये तख़्त नशीनों से,
इन नफरत के आईनों से,
दब जाएं सदाएं ना हो होगा,
हम चुप हो जाएं, ना होगा !!!
कह डालो तख़्त परस्तों से,
हम वाक़िफ़ हैं उन रस्तों से,
जो दार के ऊपर जाते हैं,
जो सच के हिस्से आते हैं.
जाने हैं इरादा, क्या दोगे?
तुम मौत से ज़्यादा क्या दोगे?
लो दे दो सज़ाएं, ना होगा,
हम चुप हो जाएं, ना होगा।!!!
इन मज़हब धर्म के फ़िरक़ों में,
इन रंग ओ नसल के फ़र्क़ों में,
हमें बाँट रहे हो हिस्सों में,
पर दर्ज है वक़्त के क़िस्सों में,
तुम जाल सदा से फेंक रहे,
हम हर इक दौर में एक रहे,
इतिहास भुलाएं, ना होगा,
हम चुप हो जाएँ ना होगा.
लेकिन लोकप्रिय होने वाली पहली लोकप्रिय कविता वरुण ग्रोवर की मानी जाएगी, जिन्होंने कह दिया, ‘हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे'. सीएए-एनआरसी के विरोध में लिखी गई यह कविता देश के विभिन्न जगहों पर चले रहे धरना-प्रदर्शनों में गाया जा रहा है. अन्य भाषाओं के अलावा बांगला में भी इसका तर्जुमा हो गया है. इसे भी संगीतबद्ध कर दिया गया है. पूरी कविता हैः
तानाशाह आके जाएंगे, हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे
तुम आंसू गैस उछालोगे, तुम ज़हर की चाय उबालोगे
हम प्यार की शक्कर घोर के उसको, गट गट गट पी जाएंगे
हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे
ये देश ही अपना हासिल है, जहां राम प्रसाद भी बिस्मिल है
मिट्टी को कैसे बांटोगे, सबका ही ख़ून तो शामिल है
तुम पुलिस से लठ्ठ पड़ा दोगे, तुम मेट्रो बंद करा दोगे
हम पैदल पैदल आएंगे, हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे
हम मंजी यहीं बिछाएंगे, हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे
हम संविधान को बचाएंगे, हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे
हम जन गण मन भी गाएंगे, हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे
तुम जात पात से बांटोगे, हम भात मांगते जाएंगे
हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे
प्रतिरोध के इस दौर में बेहतरीन शायरी और कविताएं लिखी-पढ़ी जा रही हैं. छात्र-छात्राएं, शिक्षक और आम लोग शायरी के जरिए अपनी बात कह रहे हैं. देश के विभिन्न प्रदर्शन स्थलों पर हर रोज पुराने और उभरते कवि-शायर अपनी रचना पेश कर रहे हैं. यह खाकसार उनमें से कुछ चुनिंदा रचनाओं को आपके लिए पेश करता रहेगा.
(मोहम्मद वक़ास इंडिया टुडे के सीनियर एडिटर हैं)
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