कॉर्पोरेट गवर्नेंस: नियामक की नाक के नीचे
यकीन मानिए, सायरस मिस्त्री की वापसी और टाटा संस के बोर्ड पर नियमों की अनदेखी का आरोप भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की खस्ताहाल स्थिति की नुमाइश है.

सीएए और एनआरसी के शोर में टाटा और मिस्त्री केस में आया एनसीएलएटी का फैसला दब गया. हालांकि अर्थव्यवस्था के पेंचीदा मुद्दों से आम जनता का सरोकार कम ही रहता है, ऐसे में अगर सड़कों पर यह शोर नहीं भी होता तो भी इसकी कोई गारंटी नहीं कि यह मुद्दा बड़ा तूफान खड़ा करता. भारत में कभी कॉर्पोरेट गवर्नेंस में खामी जैसे मुद्दे मुख्यधारा के नहीं रहे. शायद ही आपको याद हो कि किसी कंपनी में चल रही गड़बड़ी के बारे में पता चला हो और लोगों का गुस्सा फूटा हो. यह अलग बात जब ये खामियां बड़े घोटालों का रूप (सत्यम, नीरव मोदी) लेकर उजागर होती हैं तो निवेशकों, करदाताओं के हाथ जलने की कहानियां प्रमुखता से छपती हैं. फिर चाहें छोटी मोटी पोंजी स्कीम हो या सत्यम, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, सहारा जैसे बड़े नाम.
यकीन मानिए, सायरस मिस्त्री की वापसी और टाटा संस के बोर्ड पर नियमों की अनदेखी का आरोप भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की खस्ताहाल स्थिति की नुमाइश है. टाटा ग्रुप न केवल भारत का सबसे बड़ा बल्कि भरोसेमंद औद्योगिक समूह है. नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाली यह बदलते भारत का झंडा लेकर चलने वाली कंपनी है. भारतीय हों या विदेशी सभी निवेशक टाटा की कंपनियों में अगर निवेश करते हैं तो कहीं न कहीं इस बात का सुकून उन्हें जरूर होता है कि पैसा ऐसी कंपनी में लगा रहे जहां काम काज पारदर्शी और सही फैसले लेने में सक्षम नेतृव्य हमेशा बना रहेगा. ऐसी कंपनी के बोर्ड पर मायनॉरिटी शेयरहोल्डर के अधिकारों की अनेदेखी, नियमों को ताक पर रखने के आरोप और तत्कालीन चेयरमैन को हटाया जाना गलत? यह अच्छे संकेत नहीं.
कागज पर कॉर्पोरेट गवर्नेंस के लिखे सख्त नियम भारत की कंपनियों के बड़े शेयरहोल्डर या कहिए मालिकों के लिए बहुत महत्व नहीं रखते. देश की दिग्गज कंपनियों (इंफोसिस, टाटा समूह) के ताजा उदाहरण हमारे पास हैं. जहां शीर्ष प्रबंधन में खींचतान का खामियाजा छोटे निवेशकों को भुगतना पड़ा. कैफे कॉफी डे जैसी रहस्यमयी कहानियों के तार भी कॉर्पोरेट गवर्नेंस से जुड़ते हैं. फिर छोटी मोटी कंपनियों को तो छोड़ ही दीजिए. जहां देखते देखते कंपनियों के शेयर अर्श से फर्श पर आ जाते हैं.
शेयरधारकों के नजरिए से देखें तो उनके हितों की रक्षा और कंपनियों में सब सही चले इसके लिए नियामक तैनात हैं. फिर कैसे नियामक की नाक के नीचे यह सब चल रहा है? हर साल छोटी बड़ी दर्जन भर कंपनियों में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के गंभीर मामले सामने आते हैं. क्या नियामक को और अधिकार देने की जरूरत है या कंपनियों की और ज्यादा जानकारी निवेशकों के सामने रखने की? क्योंकि तिमाही नतीजे और प्रबंधन की बात तो आय मुनाफे से ज्यादा कुछ देख समझ पाने में मदद करती नहीं. देश की इन्हीं दिग्गज कंपनियों से ही दुनियाभर में भारत की पहचान बनती है. सरकारों की तरह कंपनियों में भी सब सही चले इसकी जिम्मेदारी भी हमारी है, कम से कम वहां जहां टैक्सपेयर्स का पैसा कर्ज के रूप में और निवेशकों की गाढ़ी कमाई शेयर बाजार के रास्ते लगी है.
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