उत्तराखंडः सीबीआई के सहारे सियासत
सीबीआइ जांच के बहाने बीजेपी हरीश रावत को तो घेर ही रही है उसकी नजर कांग्रेस की सहयोगी पीडीएफ पर भी है. पीडीएफ फिलहाल रावत के साथ दिख रहा है लेकिन सीबीआइ जांच जारी रखकर पीडीएफ को डराना आसान है.

कई दिनों से सियासी उठा-पटक का सामना कर रहे उत्तराखंड में, खासकर प्रदेश कांग्रेस में अब भी सबकुछ सामान्य नहीं हुआ है. जैसे तैसे अपनी कुर्सी को बचाने में कामयाब हुए मुख्यमंत्री हरीश रावत अब सीबीआइ जांच के घेरे में आ गए हैं और इस घटनाक्रम ने कांग्रेस के महत्वाकांक्षी नेताओं के मन में उम्मीद जगा दी है. कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्री डॉ. इंदिरा हृदयेश की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को भी पंख लगने लगे हैं. वहीं दलित मुख्यमंत्री बनने की इच्छा पाले यशपाल आर्य भी पीछे नहीं रहना चाहते. महत्वाकांक्षी नेता सीबीआइ जांच के घेरे में आए रावत को लेकर हाइकमान को यह समझाने में जुटे हैं कि अब उनके हाथों में सरकार का नेतृत्व सुरक्षित नहीं है और प्रदेश में पार्टी के सिकुड़ते दायरे की वजह भी यही है.
यह सब तब सही प्रतीत हुआ जब सीबीआइ जांच के लिए दिल्ली में सीबीआइ मुख्यालय जाते हुए रावत के प्रति समर्थन जताने के लिए प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय, कुछ विधायक और बड़ी संख्या में पार्टी के पदाधिकारी तो पहुंचे लेकिन कई विधायकों ने इससे दूरी बनाए रखी.
नौ बाऌगी नेताओं के बीजेपी में जाने से कांग्रेस के पास गढ़वाल मंडल में कोई दमदार नेता नहीं रह गया है. ये बागी गढ़वाल से ही हैं और बीजेपी इनका समर्थन पाकर वहां मजबूत हो गई है.
गढ़वाल के सात जिलों में कांग्रेस के पास अब कोई ऐसा नेता नहीं है जिसकी अपनी विधानसभा से बाहर स्वीकार्यता हो. इस कमी को भले कांग्रेस खुलेआम स्वीकार नहीं कर रही लेकिन अंदरखाने पार्टी में इस पर मंथन चल रहा है. अब तक कांग्रेस की राजनीति गढ़वाल मंडल में सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा और डॉ. हरक सिंह रावत के इर्दगिर्द घूमती थी पर अब ये सभी बीजेपी का हिस्सा हैं. वैसे प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिए उसके पास रावत सरीखा दमदार और मंजा हुआ नेता और कोई नहीं है. लेकिन चुनाव जीतने के लिए क्षेत्रीय समीकरण साधना भी जरूरी है.
वहीं गढ़वाल में बीजेपी के पास नेताओं की पूरी फौज है. उनमें मेजर जनरल बी.सी. खंडूड़ी और रमेश पोखरियाल निशंक तो पहले ही थे, अब सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत भी मिल गए हैं. कांग्रेस भी कुछ बड़े नामों को साथ लेना चाहती है. सतपाल महाराज के विकल्प के बतौर कांग्रेस की नजर उनके भाई भोले जी महाराज पर है. भोले जी महाराज की गढ़वाल में स्वीकार्यता सतपाल महाराज से ज्यादा बताई जाती है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय कहते हैं, ''बागियों के पार्टी छोडऩे से कांग्रेस की गंदगी साफ हो गई है. वहां पार्टी में बड़े चेहरों की कमी नहीं है.''
2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सीबीआइ जांच के बहाने रावत को घेरने का बहुत कारगर हथियार मिल गया है. जांच लंबी खींचने से बीजेपी को फायदा मिलता है या नहीं यह तो वक्त बताएगा, पर इससे बीजेपी के पास हंगामा मचाने का मसाला तो मिल ही गया है. 10 बागी विधायकों के कांग्रेस से अलग होने के बाद पार्टी में रावत को चुनौती देने वाला कोई दमदार नेता नहीं है पर उनके पास नाजुक बहुमत है. वहीं बीजेपी और रावत विरोधी अन्य नेता सरकार समर्थक निर्दलीय यूकेडी और बीएसपी के विधायकों के छह सदस्यीय समूह (पीडीएफ) को इस जांच के बहाने बहकाने की कोशिश में हैं. इसी रणनीति के तहत पीडीएफ ने कांग्रेस से अपने किसी सदस्य को राज्यसभा भेजने की मांग की है. जबकि प्रदेश कांग्रेस ने राज्यसभा के लिए पहले उपाध्याय के नाम की सिफारिश की, लेकिन कुछ देर बाद ही सिफारिश वापस लेते हुए फैसला कांग्रेस हाइकमान पर छोड़ दिया.
सीबीआइ जांच किस करवट बैठेगी, इसकी चिंता पीडीएफ को भी है. सरकार की सहयोगी होने के कारण जांच को उसकी ओर भी घुमाया जा सकता है. ऐसे में उसके पास सिर्फ सियासी पाला बदलने का विकल्प ही बचेगा. इसी रणनीति के तहत पीडीएफ पत्ते खेल रहा है. दूसरी ओर कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग की बैठक में किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति को राज्यसभा भेजे जाने की मांग उठी है. पीडीएफ कोटे से मंत्री दिनेश धनै कहते हैं, ''पीडीएफ ने राज्यसभा सीट की मांग बहुत सोच-समझकर की है. हम सरकार के साथ चार साल से हैं. अगर कांग्रेस हमारी मांग का सम्मान नहीं करेगी तो हम कोई भी फैसला लेने को स्वतंत्र होंगे.'' इस बहाने पीडीएफ अपने लिए विकल्प खुले रखना चाहता है कि ताकि जरूरत पडऩे पर वह जांच की पेचीदगी से बचने के लिए कांग्रेस से अपना पीछा छुड़ा सके.
पीडीएफ फिलहाल रावत के साथ दिख रहा है लेकिन राज्य मंत्रिमंडल से सीबीआइ जांच खारिज होने के बावजूद सीबीआइ जांच जारी रखकर पीडीएफ को डराना आसान है. बीजेपी के नेता गाहे-बगाहे चेतावनी देते दिखते हैं कि सीबीआइ पीडीएफ को भी देर-सवेर जांच के घेरे में ला सकती है. पीडीएफ के दम पर ही पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से कांग्रेस ने 62 सदस्यीय विधानसभा में अपने 26 निर्वाचित और एक मनोनीत विधायक के अलावा छह पीडीएफ के सदस्यों का साथ पाकर बहुमत साबित किया था.
बीजेपी ने रावत पर हमले तेज कर दिए हैं. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के मुताबिक, ''अगर हरीश रावत बेकसूर थे तो उन्होंने अपनी अनुपस्थिति में डॉ. इंदिरा हृदयेश की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की बैठक कराकर सीबीआइ जांच की अधिसूचना रद्द क्यों कराई? जांच में उन्हें अपने फंसने का डर था, इसीलिए वे ऐसा कदम उठा रहे हैं.'' पीडीएफ की राज्यसभा की दावेदारी में भी बीजेपी संभावनाएं तलाश रही है. बीजेपी नेता संकेत भी दे रहे हैं कि पीडीएफ को राज्यसभा के लिए समर्थन चाहिए तो उसे बीजेपी से बात करनी चाहिए. बीजेपी का मानना है कि पीडीएफ-कांग्रेस के सहयोग को तोडऩे का यह एक अच्छा मौका साबित हो सकता है.