संतुलन साधने का एक और मौका

चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं जयललिता की लोकलुभावन नीतियां राज्य की अर्थव्यवस्था को खस्ताहाल बना सकती हैं. हालांकि शपथ की औपचारिकता पूरी होने के साथ ही जयललिता सीधे काम में जुट गईं.

गहरे हरे रंग की साड़ी पहने हुए जे. जयललिता ने 23 मई को चौथी बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. कुछ उत्साही लोगों ने उन्हें नाम दिया है पुराचि तलैवि यानी क्रांतिकारी नेता. तो इस क्रांतिकारी नेता को अभी अपने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी डीएमके प्रमुख एम. करुणानिधि के बराबर पहुंचने के लिए एक बार और चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना होगा.

हालांकि जीत की इस फेहरिस्त में वे अपने गुरु और मार्गदर्शक एम.जी. रामचंद्रन को तो पीछे छोड़ ही चुकी हैं, जिन्होंने लगातार तीन बार विधानसभा चुनावों में जीत का परचम लहराया और 1977 से लेकर 1987 यानी पूरे एक दशक तक मुख्यमंत्री रहे. अगरचे 2011 के मुकाबले अम्मा को सीटें कुछ कम मिलीं, लेकिन जीत आसान और मुकम्मल रही और एमजीआर के बाद यह पहली बार हुआ है कि तमिलनाडु की जनता ने पहले से कुर्सी पर विराजमान मुख्यमंत्री को ही दोबारा कुर्सी तक पहुंचा दिया.

जयललिता का शपथ ग्रहण समारोह भी काफी भव्य था. जाने-माने सितारों, कदमों में सिर झुकाए भक्तों के अलावा डीएमके नेता और करुणानिधि के बेटे एम.के. स्टालिन भी समारोह में मौजूद थे. हालांकि बैठने की व्यवस्था को लेकर मीडिया में खुसफुसाहटों का बाजार गर्म रहा क्योंकि स्टालिन की बैठने की सीट मुख्य स्थान से काफी दूर थी. जाहिर है कि स्टालिन के पिता को बुरा लगा और उन्होंने जयललिता पर जान-बूझकर अपमानित करने का आरोप भी मढ़ दिया. शपथ की औपचारिकता पूरी होने के साथ ही जयललिता सीधे काम में जुट गईं. और पांच महत्वपूर्ण फाइलों पर हस्ताक्षर किए. तत्काल लिए गए इन फैसलों में से एक छोटे और मझोले किसानों के फसल कर्ज को माफ करना भी था, जिसका वादा अम्मा ने चुनावों में किया था.      
फसल कर्ज माफ करना एक ऐसा फैसला था, जिसे जनता का अपार समर्थन मिला. जयललिता बड़े फैसले लेने में माहिर हैं—कर्ज माफ करना, मुफ्त बिजली, सोना और कामकाजी महिलाओं के लिए स्कूटर में 50 फीसदी की छूट. पिछले पांच सालों में तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था 6.5 फीसदी की औसत दर से बढ़ी है, लेकिन यह रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं है. वर्ष 2016-17 के राज्य के बजट में राजकोषीय घाटा 9,000 करोड़ रु. का रहा, जो कि पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले तकरीबन दुगुना है. तमिलनाडु के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के अनुपात में राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ रहा है. 2012-13 में जो कुल जीडीपी का 2.2 फीसदी था, वह 2015-16 में बढ़कर 2.9 फीसदी पर पहुंच गया. हालांकि यह संख्या वित्त आयोग के सुझाए गए 3 फीसदी के राजकोषीय घाटे के आंकड़े से पार नहीं गई है.

लेकिन अब यह सब्सिडी और मुफ्त उपहारों का अगला नया चरण है. अगले वित्त वर्ष में फ्री बिजली और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के साथ राजकोष पर दबाव बढ़ने वाला है और यह बात अर्थशास्त्रियों के लिए चिंता का सबब बनी हुई है. मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के पूर्व निदेशक डॉ. पॉल अप्पास्वामी कहते हैं, ‘‘ग्रामीण इलाकों में और शहरी गरीब आबादी के लिए कल्याणकारी योजनाओं का मकसद आर्थिक विकास के फायदे और एक हिस्से को उन लोगों तक पहुंचाना है. लेकिन एक ओर जब राष्ट्र और राज्य की अर्थव्यवस्था नीचे की ओर जा रही हो, ऐसे में ये योजनाएं विकास और राज्य की वित्तीय हालत पर नकारात्मक असर डालेंगी.’’ सामाजिक कार्यकर्ता एम.जी. देवसहायम कहते हैं, ‘‘हमें अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है. अगर हम सचमुच अच्छे दिन चाहते हैं तो हमें इस मुफ्त की संस्कृति से मुक्त होने की जरूरत है.’’

तमिलनाडु की इस तथाकथित मुफ्त की संस्कृति को लगातार जयललिता के खिलाफ एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. केंद्रीय ऊर्जा राज्य मंत्री पीयूष गोयल बिजली की कमी के लिए डीएमके और एआइएडीएमके, दोनों को ही उत्तरदायी ठहराते हैं. जयललिता के शब्दों में तमिलनाडु ‘‘अतिरिक्त बिजली वाला राज्य’’ है. मुमकिन है किसी समय यह बात सही रही हो, लेकिन आज की हकीकत कुछ और है. आज राज्य के बहुत बड़े हिस्से में कई-कई घंटों की बिजली कटौती होती है, जिसका उद्योगों पर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव काफी घातक है. केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह कहते हैं कि तमिलनाडु की दो बड़ी पार्टियां जितना पैसा लोगों को उपहार बांटने पर खर्च करती हैं, उतने पैसे से तो राज्य में ‘‘25,000 स्कूल खोजे जा सकते हैं.’’

सीटों की संख्या के लिहाज से तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे निर्णायक रहे हैं, लेकिन वोटों की संख्या के लिहाज से महज एक फीसदी का फासला है एआइएडीएमके और उसकी विरोधी पार्टी के बीच में. पिछले चुनावों में डीएमके का पत्ता साफ हो गया था, लेकिन इस बार वह मजबूत विपक्ष बनकी उभरा है. संख्या और सियासी अनुभव, दोनों लिहाज से तमिलनाडु की किसी सरकार ने शायद ही ऐसे मजबूत विपक्ष का सामना किया हो.

जयललिता ने अभी-अभी चुनावों में शानदार जीत हासिल की है और अब वह विपक्ष से मुकाबला करने के लिए पूरे आत्मविश्वास के साथ कमर कसकर तैयार हैं. आंकड़ों को अपने पक्ष में मोड़ते हुए 2014 के आम चुनावों में 39 में से 37 लोकसभा सीटें जयललिता ने एआइएडीएमके के पक्ष में कर ली थीं. उस जीत ने उनका आत्मविश्वास मजबूत किया.

अपना नाम उजागर न करने की शर्त पर एआइएडीएमके के एक पूर्व मंत्री बताते हैं, ‘‘एआइएडीएमके में जो भी होता है, अम्मा की मर्जी से होता है. हम उन्हीं के नाम पर जीतते या हारते हैं.’’ हालांकि वे बड़ी तत्परता से यह भी कहने से नहीं चूकते कि यह सिर्फ खुशामद भर नहीं हैः जयललिता के पास ‘सुनियोजित रणनीति है.’ मसलन महिलाओं से किया गया अम्मा का वादा काफी कारगर साबित हुआ, जैसे सोना, दोपहिया वाहन पर छूट और मातृत्व में मदद आदि. जिन चुनाव क्षेत्रों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक थी, वहां एआइएडीएमके के वोटों में 62 फीसदी तक का इजाफा हुआ.

लेकिन गवर्नेंस और चुनावी रणनीति में काफी फर्क है. ‘‘विजन 2023’’ डॉक्युमेंट में नौकरी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, उद्योगों और विकास की रूपरेखा है. यह एक महत्वाकांक्षी डॉक्युमेंट है. 2019 के आम चुनावों से पहले राष्ट्रीय स्तर पर अपने राजनैतिक कद और महत्व को बढ़ाने के वास्ते जयललिता के हाथ में दिखाने के लिए कुछ तो ठोस काम और परिणाम होने चाहिए. जो भी हो, अब गेंद उनके पाले में है. अभी वे जो करेंगी, उसी से तय होगा कि वे बतौर नेता करुणानिधि और एमजीआर से आगे जा पाएंगी या नहीं.

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