नोटा के बदलते रुझान
नोटा का चुनावों में सर्वप्रथम प्रयोग 2013 के विधानसभा चुनावों में हुआ था. ऐसे में आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर हमें नोटा के बारे में जो रुझान दिख रहे है, वो मीडिया द्वारा नोटा के बारे में केवल जीत-हार का निर्णय करने वाले केवल एक पक्ष को प्रचारित कर रहे है, जबकि नोटा के कई अन्य गंभीर रुझान भी है जिन्हें मीडिया ने तवज्जों नहीं दी है.

हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने नोटा की भूमिका पर चर्चा को एक बार फिर से गर्मा दिया है. मीडिया रिपोर्ट में नोटा को जीत-हार तय करने में प्रमुख भूमिका तय करने वाला बताया जा रहा है लेकिन मीडिया रिपोर्ट के इस नैरेटिव को तथ्यों की कसौटी पर परखने के लिए चुनाव परिणामों में सबसे पहले नोटा के रुझानों का अध्ययन आवश्यक है.
भारत निर्वाचन आयोग के आकड़ो के आधार पर छत्तीसगढ़ में नोटा को कुल डाले गए मतों का 2 प्रतिशत (282744 मत) प्राप्त हुए है जो की इन पांच राज्यों के परिणामों में सबसे ज्यादा है. मत प्राप्त करने के मामले में नोटा छठे स्थान पर है और 7 राजनैतिक दलों से आगे है. छत्तीसगढ़ के पिछले विधानसभा चुनावों में नोटा के पक्ष में 3.06 प्रतिशत (401058 मत) मतदान का राष्ट्रीय रिकार्ड बना था और नोटा तीसरे स्थान पर था. मत प्रतिशत के आधार पर यह रिकॉर्ड अभी तक अछूता है और यह दिखाता है की छत्तीसगढ़ में नोटा के पक्ष मे वोटिंग पहले भी अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा हुई है.वहीं मध्य प्रदेश में नोटा के पक्ष में मतदान 1.4 प्रतिशत (542295 मत) हुआ और मत प्राप्त करने के मामले में नोटा छठे स्थान पर रहा और 6 राजनीतिक दलों से आगे रहा है. पिछले विधानसभा चुनावों में नोटा चौथे स्थान पर रहा था और नोटा को 1.9 प्रतिशत मत मिले थे, जो कि (643144 मत) थे. इस आधार पर देखा जाए तो मध्य प्रदेश में पिछली बार की तुलना में नोटा का मत प्रतिशत कम हुआ है.
राजस्थान में नोटा के पक्ष में मतदान 1.3 प्रतिशत (467781 मत) हुआ है और नोटा मत प्राप्त करने के मामले में छठे स्थान पर है साथ ही 8 राजनीतिक दलों से आगे है. पिछले विधानसभा चुनावों में नोटा की हिस्सेदारी 1.9 प्रतिशत (589923 मत) रही थी और पांचवे स्थान पर था. इस तरह से राजस्थान में भी नोटा के मत प्रतिशत में गिरावट है.
मिजोरम में नोटा के पक्ष में मतदान 0.5 प्रतिशत (2917) मत हुआ है और मत प्राप्त करने के मामले में नोटा छठे स्थान पर है साथ ही एक पार्टी से आगे है. पिछले विधानसभा आम चुनावों में मिजोरम में नोटा को 0.7 प्रतिशत (8810 मत) प्राप्त हुए थे और दो राजनैतिक दलों से नोटा आगे था.
नए राज्य के तौर पर तेलंगाना में नोटा के पक्ष में 1.1 प्रतिशत (224709 मत) प्राप्त हुआ है और राजनैतिक दलों में मत प्राप्त करने में आठवें स्थान पर है और 8 अन्य राजनैतिक दलों से आगे भी है. तेलंगाना में पिछली विधानसभा के चुनाव आंध्र प्रदेश विधानसभा के लिए आम चुनावों के साथ 2014 में प्रथम चरण आयोजित हुए थे.
ऐसे में तेलंगाना राज्य के लिए नोटा के आंकड़ों को लेकर स्पष्ट तुलनात्मक अध्ययन नहीं हो पाएगा. पंरतु पूरे आंध्र प्रदेश की 294 विधानसभा सीटों के लिए पिछले विधानसभा चुनावों में नोटा को 0.6 प्रतिशत 308286 मत प्राप्त हुए थे और मत प्राप्त करने में नोटा नौंवे स्थान पर था. पिछले विधानसभा चुनावों में तेलंगाना के लिए प्रथम चरण की 119 सीटो के लिए हुए मतदान में 152438 नोटा मत प्राप्त हुए थे. इस बार अकेले तेलंगाना की 119 विधानसभा सीटों के लिए नोटा को 224709 मत की प्राप्ति हुई है. निश्चित तौर पर तेलंगाना में नोटा के वोट प्रतिशत में इस बार 47.4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.
| राज्य | 2018 विधानसभा परिणाम में नोटा का मत प्रतिशत | पिछले विधानसभा (2013) परिणाम में नोटा का मत प्रतिशत | 2018 विधानसभा परिणाम में नोटा के मत प्राप्ति की संख्या | पिछले विधानसभा (2013) परिणाम में नोटा के मत प्राप्ति की संख्या | 2018 विधानसभा परिणाम में मत प्राप्ति में स्थान | पिछले विधानसभा (2013) परिणाम में मत प्राप्ति में स्थान |
| छत्तीसगढ़ | 2.0 प्रतिशत | 3.06 | 282744 | 401058 | 6 | 3 |
| मध्य प्रदेश | 1.4 प्रतिशत | 1.9 | 542295 | 401058 | 6 | 4 |
| राजस्थान | 1.3 प्रतिश | 1.9 | 589923 | 467781 | 6 | 5 |
| मिजोरम | 0.5 प्रतिशत | 0.7 | 8810 | 2917 | 6 | 7 |
| तेलंगाना | 1.1 प्रतिशत | ---- | 224709 | ------- | 8 | ------- |
(नोट- नोटा मत प्राप्ति में स्थान की गणना करने में स्वतंत्र उम्मीदवारों को सम्मिलित नहीं किया गया है।)
नोटा का चुनावों में सर्वप्रथम प्रयोग 2013 के विधानसभा चुनावों में हुआ था. ऐसे में आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर हमें नोटा के बारे में जो रुझान दिख रहे है, वो मीडिया द्वारा नोटा के बारे में केवल जीत-हार का निर्णय करने वाले केवल एक पक्ष को प्रचारित कर रहे है, जबकि नोटा के कई अन्य गंभीर रुझान भी है जिन्हें मीडिया ने तवज्जों नहीं दी है.
पहला रुझान यह है कि विधानसभा स्तर पर नोटा जीत-हार तय करने में प्रभावी रहा है और मीडिया रिपोर्ट भी इस बात की तस्दीक कर रही है. खासकर उन विधानसभा क्षेत्रों के परिणामों में जहां जीत-हार का अंतर नोटा को प्राप्त मतों के या तो आस-पास है या कम है. नोटा को जीत-हार के अंतर से बहुत ज्यादा मत मिलने पर नोटा का निर्णायक प्रभाव कम हो गया है.
दूसरा रुझान ये है की तेलंगाना में नोटा के पक्ष में मतदान की बढ़ोत्तरी ने ये दिखाया है कि परिणामों को निर्धारित करने में नोटा मारक भूमिका निभा सकता है. लेकिन यहां एक बात समझना आवश्यक है की गोपनीय मतदान के प्रावधानों के चलते मीडिया रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि कैसे हो जा रही है कि जो मत नोटा के पक्ष में दिए गए हैं, वे परिणामों में दूसरे नंबर पर आ रहे उम्मीदवार को मिल जाते तो वह जीत जाता.
अभी असल में गोपनीय मतदान के प्रावधान के चलते यह पता लगाना संभंव नहीं है. यह भी हो सकता है कि नोटा को दिए गए मत जीतने वाले उम्मीदवार के वोट बैंक से भी कटे हो या नोटा में डाले गए मत विविध राजनैतिक दलों के जनाधार से आये हो जैसा की तेलंगाना में दिख रहा है. ऐसे में यह कहना अर्थपूर्ण नहीं होगा कि नोटा में जो वोट गए वे केवल परिणाम में दूसरे नंबर में रहने वाले उम्मीदवारों को मिलने वाले थे. ऐसे में मीडिया में आई ऐसी रिपोर्ट का कोई मजबूत आधार न होकर बल्कि एक संभावित कयास है.
वहीं तीसरा रुझान दिखाता है कि तेलंगाना को छोड़कर हर राज्य में नोटा को समेकित तौर पर पिछली विधानसभा की तुलना में कम मत मिले है और मतदाताओ ने अपने मत को उम्मीदवारों के पक्ष में ही ज्यादा प्रयोग किया है. नोटा के पक्ष में मतदान की दिलचस्पी में कमी आई है. इसकी पुष्टि चुनाव आयोग के आंकड़े कर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद नोटा इस बार भी कई राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों से मत पाने में आगे रहा है.
नोटा के इन चुनावी रुझानों को देखते हुए यह माना जा सकता है कि भारतीय चुनाव प्रणाली में नोटा राजनैतिक दलों और उनके उम्मीदवारों के लिए चिंता का विषय हो सकता है लेकिन चुनाव आयोग का लक्ष्य राजनीतिक दलों की जीत-हार न होकर नोटा का प्रावधान कर, मतदाता को मतपत्र में उल्लेखित उम्मीदवारों को नकार कर मतदान करने का लोकतांत्रिक विकल्प उपलब्ध कराना रहा है और चुनाव आयोग अपने इस लोकतांत्रिक प्रयास में बखूबी सफल हुआ है.
लेखक बिहार में निर्वाचन अधिकारी हैं और चुनाव सुधार व प्रक्रियाओं के बारे में लिखते हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं.
***

