अधिकारों पर आंच

सिख धार्मिक नेताओं ने पहली बार एक मौजूदा मुख्यमंत्री को समुदाय से अलग-थलग करने का फरमान सुनाया. इसने पंजाब की राजनीति में एक नया और तनावपूर्ण अध्याय शुरू किया

ज्ञानी कुलदीप सिंह गरगज 15 जून को भगवंत सिंह मान के बहिष्कार का फैसला सुनाते हुए

इसी जून की 15 तारीख को अमृतसर में सिखों की सर्वोच्च संस्था अकाल तख्त के मंच यानी फसील से कार्यकारी जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गरगज ने एक असाधारण फैसला सुनाया. सिखों के सभी पांचों तख्तों के प्रमुख (सिंह साहिबान) के फैसले को पढ़ते हुए उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को 'गुरु दोखी' (गुरुओं के खिलाफ काम करने वाला) और 'खालसा पंथ विरोधी' घोषित कर दिया.

इसी बैठक में पंजाब के नए बेअदबी कानून का समर्थन करने वाले हर सिख विधायक और मंत्री को 29 जून को अकाल तख्त के सामने पेश होने का आदेश भी सुनाया गया. पंजाब के राजनैतिक इतिहास में धार्मिक तौर पर निंदा या सजा मिलना कोई नई बात नहीं है. लेकिन इससे पहले कभी मौजूदा मुख्यमंत्री के खिलाफ इतनी बड़ी कार्रवाई नहीं की गई थी.

राज्य में विधानसभा चुनाव में अब साल भर से भी कम का समय बचा है, ऐसे में यह टकराव एक बड़े संकट में बदल सकता है. विपक्षी दलों ने पहले ही मान सरकार को घेरने के लिए मजबूत पंथक छवि वाले नेताओं को आगे करना शुरू कर दिया है. वे इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी (आप) सरकार के खिलाफ राजनैतिक बढ़त बनाने की कोशिश में जुटे हैं.

वीडियो बना वजह
पूरे विवाद की वजह महीनों पहले सामने आया एक वीडियो है, जिसमें कथित तौर पर एक व्यक्ति को दसों गुरुओं और उग्रवादी जरनैल सिंह भिंडरांवाले की तस्वीरों पर शराब छिड़कते दिखाया गया था. आरोप लगे कि वीडियो में दिख रहा व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि खुद मुख्यमंत्री हैं. तलब किए जाने पर मान 15 जनवरी को अकाल तख्त के सामने पेश हुए और उन्होंने इसे एआइ से बनाया गया फर्जी वीडियो बताया.

अकाल तख्त का कहना है कि उसने वीडियो की जांच के लिए किसी फॉरेंसिक लैब का नाम सुझाने को कहा था लेकिन मान ने ऐसा नहीं किया. इसके बाद संस्थान ने खुद इस वीडियो को केंद्र सरकार से मान्यता प्राप्त दो लैब के पास भेजा, जिनकी रिपोर्ट में कथित तौर पर इस वीडियो को असली बताया गया.

मान ने फॉरेंसिक रिपोर्टों को मानने से साफ इनकार कर दिया. उनका तर्क था कि फॉरेंसिक रिपोर्ट में यह साबित नहीं हुआ है कि वह व्यक्ति कौन है. यही नहीं, एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने अकाल तख्त के मौजूदा पदाधिकारियों को राजनैतिक रूप से नियुक्त लोग करार दे डाला जो अपने 'राजनैतिक आकाओं' के इशारे पर काम कर रहे हैं. मान ने उन पर छवि बिगाड़ने के लिए झूठी कहानी गढ़ने का आरोप लगाया. आप के पंजाब मीडिया प्रभारी, बलतेज सिंह पन्नू ने तो और भी कड़े शब्द इस्तेमाल किए; उन्होंने इस फैसले को बादल परिवार की रची साजिश बताया और गरगज को शिरोमणि अकाली दल का 'मोहरा' करार दे डाला.

यह मामला अतीत के टकरावों से काफी अलग है. पंजाब के नेता अकाल तख्त के फैसलों को चुनौती भले ही देते रहे हों लेकिन ज्यादातर नेताओं ने फैसला सुनाने वालों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के बजाए आखिरकार प्रायश्चित करना ही बेहतर समझा है. वहीं मान पिछले कुछ समय से टकराव के मूड में नजर आ रहे थे. इस साल के शुरू में उन्होंने सार्वजनिक रूप से गरगज की नियुक्ति की 'निष्पक्षता' पर सवाल उठाए थे और इसे सिख मर्यादा के खिलाफ बताया था. इसलिए दोनों पक्षों के बीच यह अनबन विवादित वीडियो सामने आने से पहले से ही चल रही थी.

भगवंत सिंह मान 7 मई को स्वर्ण मंदिर में

कानून पर विवाद
टकराव सिर्फ वीडियो तक सीमित नहीं, बल्कि इससे भी आगे बढ़ चुका है. ताजा विवाद की जड़ में जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 भी है, जो पंजाब में बेअदबी विरोधी नया कानून है. अकाल तक्चत का तर्क है कि विधानसभा अध्यक्ष के माध्यम से आपत्ति जताए जाने के बावजूद, सिख संस्थाओं से उचित विचार-विमर्श किए बिना ही इस कानून को पारित कर दिया गया.

इसमें कोई दो राय नहीं कि केंद्र और पंजाब सरकार, दोनों ही सिख धार्मिक मामलों से जुड़े कानूनों पर आमतौर पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) से सलाह-मशविरा करती रही हैं. इस परंपरा को 1959 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और अकाली नेता मास्टर तारा सिंह के बीच समझौते से और मजबूती मिली थी. दूसरी ओर, मान ने धार्मिक नेतृत्व पर अपनी बात से पलटने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि जो लोग कभी बेअदबी विरोधी कानून की मांग कर रहे थे, वही आज इसका विरोध कर रहे हैं.

पूरे टकराव ने एक ऐसा माहौल बना दिया है जो पहले कभी नहीं देखा गया. एक समय अकाली दल को पंथक राजनीति का मुख्य आधार माना जाता था. लेकिन आज लगातार चुनावी हार और आपसी फूट के कारण यह पार्टी काफी कमजोर हो चुकी है. अब इस खाली जगह को भरने के लिए नए दावेदार सामने आ गए हैं. इनमें सबसे प्रमुख नाम खडूर साहिब के सांसद अमृतपाल सिंह का है. फिलहाल जेल में बंद अमृतपाल खालिस्तान समर्थक हैं. उनकी पार्टी अकाली दल (वारिस पंजाब दे) 2027 के चुनाव से पहले अपना दबदबा बढ़ाने की कोशिश में जुटी है.

सुशासन और सुधारों के वादों के साथ सत्ता में आई आप अब खुद को धार्मिक पहचान से घिरी इस राजनैतिक जमीन पर खड़ा पा रही है. यहां सबसे बड़ा खतरा यह है कि जब भी मुख्यधारा की पंथक व्यवस्था में ऐसी अनिश्चितता का दौर आता है, तो उसके राजनैतिक परिणाम अक्सर अप्रत्याशित होते हैं, और पंजाब में सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं भी काफी हद तक बढ़ जाती हैं. 

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