धधकते ईंट-भट्टों के बीच शिक्षा की रोशनी

देश के तमाम ईंट-भट्टों पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चे पढ़-लिख नहीं पाते लेकिन शेखपुरा जिले की यह पहल उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव ला सकती है

शेखपुरा के एक ईंट-भट्टे पर खुला अक्षर लर्निंग सेंटर

आठ साल की संध्या अपने साल भर के छोटे भाई के साथ उस स्टडी सेंटर में बैठी मिलती है, जिसे 'अक्षर लर्निंग सेंटर' का नाम दिया गया है. यह सेंटर शेखपुरा जिले के पांची गांव में है और उसका उद्घाटन हो रहा है. हालांकि अनौपचारिक रूप से यह सेंटर पिछले कुछ दिनों से चल रहा है.

संध्या अपने गांव के स्कूल में चौथी कक्षा की छात्र रही है मगर साल के आठ से ज्यादा महीने वह स्कूल नहीं जा पाती क्योंकि उसके माता-पिता रोजी-रोजगार के सिलसिले में इस ईंट-भट्टे पर रहने आ जाते हैं. इस चक्कर में उसकी दो बहनें और एक भाई आज तक स्कूल नहीं गए हैं.

यहां बैठे 27 से ज्यादा बच्चों के बीच संध्या उन खुशनसीब बच्चों में से है, जो स्कूल जाते रहे हैं बाकी ज्यादातर बच्चों का हाल वही है जो उसके भाई-बहनों का है. बिहार के शेखपुरा की यह कहानी करीब-करीब पूरे भारत में दोहराई जाती है. देश के ईंट-भट्टों पर काम करने वाले ज्यादातर मजदूर अपना घर-बार छोड़कर साल के आठ से नौ महीने ईंट-भट्टों पर झोपड़ियों में रहते हैं. वहां उनके बच्चों की पढ़ाई के लिए कोई इंतजाम नहीं होता.

मगर बिहार के शेखपुरा जिले के 55 ईंट-भट्टों में जिला प्रशासन एक एनजीओ की मदद से माहौल बदलने की कोशिश में जुटा है और इसी कोशिश का नमूना है, यह 'अक्षर लर्निंग सेंटर' जो जिले के सभी ईंट-भट्टों में खुल गया है.

बीस मीटर लंबे और करीब-करीब इतने ही चौड़े कमरे वाला यह स्टडी सेंटर इस ईंट-भट्टे के मालिक सुमन साकेत ने बनाया है और उसे 'नींव की ईंट फाउंडेशन' ने किसी स्कूल की तरह सजाया है. फाउंडेशन के सदस्य यहां इन बच्चों को पढ़ना-लिखना, गाना, खेल-कूद और साफ-सफाई सब कुछ सिखाते हैं. यह कमरा उस ईंट-भट्टे के इर्द-गिर्द बनी इकलौती जगह है, जहां धूप या बारिश होने पर मजदूर आकर सुस्ता सकते हैं. ऐसे 28 कमरे पूरे शेखपुरा जिले में अलग-अलग ईंट-भट्टों पर बने हैं. बाकी में ऐसे कमरे बनने जा रहे हैं क्योंकि शेखपुरा के डीएम शेखर आनंद ने पिछले दिनों अपने जिले के सभी ईंट-भट्टों के मालिकों को इसका निर्देश दिया था.

'नींव की ईंट फाउंडेशन' के संस्थापक अंशु जायसवाल कहते हैं, ''दस या अधिक मजदूर वाले किसी भी उद्यम के पास वहां काम करने वालों के बच्चों के लिए क्रेश (शिशु गृह) की सुविधा होनी चाहिए. भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कानून (बीओसीडब्ल्यू ऐक्ट), कंपनी ऐक्ट और लेबर ऐक्ट तीनों में ऐसा प्रावधान है. इसी के आधार पर हमारे जिलाधिकारी ने इन्हें ऐसा सेंटर बनाने को कहा है.'' इस सेंटर का उद्घाटन करने पहुंचे डीएम शेखर आनंद कहते हैं, ''ईंट-भट्टों पर काम करने वाले मजदूर वंचित तबके के होते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी यही काम करते हैं क्योंकि इनके बच्चे पढ़-लिख नहीं पाते. इस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए पढ़ाई जरूरी है इसलिए हमने पूरे जिले में अक्षर लर्निंग सेंटरों की शुरुआत की है.''

अंशु इन बातों को आंकड़ों के जरिए समझाते हैं: ''55 में से 40 भट्टों के आंकड़े हमारे पास हैं. इनमें काम करने वाले मजदूरों में से 89 फीसद अनुसूचित जाति से हैं, नौ फीसद आदिवासी हैं, सिर्फ तीन फीसद ओबीसी हैं. सवर्ण एक भी नहीं. इन कामगारों में 62 फीसद सिर्फ मुसहर जाति के हैं, बाकी रविदास, पासवान, केवट, उरांव और मुंडा जाति के लोग हैं.'' इनमें सिर्फ एक केवट जाति ऐसी है, जो ओबीसी है और बिहार में अति पिछड़ी जाति की श्रेणी में आती है.

फाउंडेशन की तरफ से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, इन 40 ईंट-भट्टों में मजदूरों के 879 घर हैं और उनमें 4,411 लोग रहते हैं. इनमें 53 फीसद पुरुष हैं और 47 फीसद महिलाएं. इनमें 91 फीसद निरक्षर हैं. 47 फीसद इसी शेखपुरा जिले के हैं, 33 फीसद बिहार के दूसरे जिलों से यहां आए हैं और 22 फीसद दूसरे राज्यों के मजदूर हैं. आंकड़ों से जाहिर है कि इन भट्टों में राज्य की सबसे वंचित आबादी रहती है.

बच्चों से जुड़े आंकड़े और चौंकाने वाले हैं. पांच साल तक की उम्र के 78 फीसद बच्चों के पास आधार कार्ड नहीं है. 72 फीसद बच्चों का जन्म प्रमाणपत्र नहीं बना है. 77 फीसद कभी आंगनबाड़ी नहीं गए. 88 फीसद बच्चे न्यूट्रिशन ट्रैकर पर नहीं हैं. इनमें से 57 फीसद बच्चों का जन्म इन्हीं ईंट-भट्टों की झोपड़ियों में हुआ है. जहां तक 6 से 14 साल के बच्चों का सवाल है, इनमें से 62 फीसद के पास आधार कार्ड नहीं है. 77 फीसद कभी स्कूल नहीं गए. अंशु कहते हैं, ''ऐसे बच्चों को स्कूलों तक पहुंचाना ही हमारा लक्ष्य है. ईंट-भट्टों का सीजन खत्म होने पर इन बच्चों के गांवों में जाकर हम स्कूलों में उनका दाखिला कराएंगे.''

अंशु की संस्था शेखपुरा से पहले रोहतास जिले में काम करती रही है. वहां उन्होंने करीब 400 बच्चों के लिए काम किया और उनमें से 129 बच्चों का दाखिला स्कूलों में कराया. इसी अनुभव की वजह से वे शेखपुरा के बच्चों के लिए उम्मीद से भरे हुए हैं.

एक मजदूर और उसका बेटा

सोशल वर्क की पढ़ाई करने वाले अंशु 2019 में इसी शेखपुरा जिले में काम करते थे. फिर कोविड लॉकडाउन के दौरान ईंट-भट्टे पर काम करने वाले मजदूरों के साथ उनका उठना-बैठना हुआ. चार सौ से ज्यादा मजदूर यूपी के अलीगढ़ से लौटे थे. इनमें 15 साल की कई लड़कियां ऐसी मिलीं जो गर्भवती थीं या उनकी गोद में बच्चा था. ये तमाम बच्चे कुपोषित थे. अंशु कहते हैं, ''तभी से मेरे मन में यह बात घर कर गई थी कि मुझे इन लोगों के साथ काम करना है.''
शुरुआत में उन्होंने अपने स्तर से इसकी कोशिश की तो भट्टा मालिकों ने उन्हें जान से मारने तक की धमकी दी. किसी तरह उन्होंने वहां पांच सेंटर शुरू किए मगर वे कोविड की दूसरी लहर के दौरान बंद हो गए.

कोविड खत्म होने के बाद भारत सरकार के श्रम मंत्रालय में उन्होंने काम किया. इसके बाद अंशु का तबादला रोहतास जिले में हो गया. यहां उनकी मुलाकात शेखर आनंद से हुई जो वहां उप विकास आयुक्त यानी डीडीसी थे. इसके बाद वहां पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर दस ईंट-भट्टों पर यह काम शुरू हुआ. इसमें उन्हें बड़ी सफलता मिली. फिर उन्होंने नौकरी छोड़कर अपनी संस्था बना ली. तय किया कि वे ताउम्र इन्हीं बच्चों के साथ काम करेंगे.

संयोग से डीडीसी शेखर आनंद का तबादला डीएम के रूप में उसी शेखपुरा में हो गया, जहां अंशु ने काम की शुरुआत की थी. फरवरी, 2026 में उन्होंने शेखपुरा में काम शुरू किया और यह काम अब एक खास नतीजे पर पहुंचता दिख रहा है.

अंशु के काम करने की सबसे बड़ी खासियत है कि वे कहीं से फंड जुटाकर काम नहीं करते. वे ज्यादातर सरकारी योजनाओं की मदद से अपने काम को आगे बढ़ाते हैं. जब उन्हें इस परियोजना के लिए बच्चों को जुटाने की जरूरत हुई तो उन्होंने उन टोला सेवकों की मदद ली जिन्हें बिहार सरकार ने गांव के बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने के लिए रखा है. इन सेंटरों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के चयन की जब बात आई तो 'सीएम प्रतिज्ञा स्कीम' के तहत युवाओं को फेलो रखा. यही युवा इन बच्चों को पढ़ाते हैं.

उनके इस काम को देखकर राज्य के आपदा प्रबंधन प्राधिकार ने दस सेंटरों को हीट वेव से बचाव के लिए कूलिंग सेंटर के रूप में विकसित करने में मदद का वादा किया है. यानी बेहतरी की एक पहल अब नई दिशा में भी बढ़ने वाली है. 

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