बंगाल का प्रवक्ता
शुभेंदु अधिकारी के सख्त तेवर वाले अंदाज के मुकाबले भाजपा में 'नरम' संतुलन बनकर उभरे समिक भट्टाचार्य

पश्चिम बंगाल की सत्ता संरचना में एक दोहरी व्यवस्था चली आ रही थी जिसे ममता बनर्जी ने सत्ता में आकर खत्म कर दिया था. आज वही मॉडल पार्टी के भीतर कमजोर कर देने वाली बगावत से टूटता दिख रहा है. ममता से पहले सत्ता कभी सिर्फ मुख्यमंत्री के हाथ में केंद्रित नहीं मानी जाती थी.
ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे वाम दिग्गज राइटर्स बिल्डिंग में बैठे हों, तब भी बहुतों का मानना था कि असली ताकत अक्सर अलीमुद्दीन स्ट्रीट से चलती थी, जहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव अनिल बिस्वास संगठन पर जबरदस्त पकड़ रखते थे.
दशकों बाद बंगाल शायद उसी मॉडल की हल्की-सी वापसी देख रहा है, बस बदले हुए रूप में. अब समिक भट्टाचार्य कोई अनिल बिस्वास नहीं हैं. बिस्वास पर्दे के पीछे शांत चेहरे वाले वन-मैन डेटा सेंटर की तरह थे, जो लगातार रणनीति गढ़ते रहते थे, उतनी ही धारदार जितनी उनकी कभी-कभार दिखने वाली हाजिरजवाबी. इसके उलट, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद समिक भट्टाचार्य एक मिलनसार नेता हैं. वे संवाद पसंद हैं. वे मंच या टीवी से परहेज करने वालों में से नहीं हैं.
'सौम्यता' की रणनीति
हालात जिस तरह बन रहे हैं, उससे लगता है कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी नवान्न से नई सरकार के मजबूत चेहरे के तौर पर राज कर रहे हैं लेकिन भट्टाचार्य सत्ता के उस भौकाल में दब नहीं गए हैं. इसके बजाए वे एक समानांतर दायरे में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं. शायद अभी वे पूरी तरह अलग सत्ता केंद्र नहीं लेकिन अहम जरूर हैं. सिर्फ पार्टी संगठन के लिए नहीं, बल्कि उसकी मैसेजिंग और सार्वजनिक छवि गढ़ने के लिए भी.
अधिकारी की सीधी और सख्त शैली के मुकाबले भट्टाचार्य की अलग पहचान भाजपा के लिए उपयोगी है. कोलकाता के भद्रलोक अंदाज की बंगाली बोलने वाले और अपेक्षाकृत नरम लहजे वाले भट्टाचार्य का काम बंगाल के उन तबकों को भरोसा दिलाना और अपनी ओर खींचना है, जो अब भी भाजपा को लेकर चौकन्ने हैं. वे अब अपनी इसी सामाजिक जगह की उपयोगिता को और बढ़ा रहे हैं. खुद को सरकार, उद्योग और शहरी वर्गों के बीच पुल के रूप में पेश कर रहे हैं, और बुद्धिजीवी भी उनके संकेतों को ध्यान से सुन रहे हैं. उनके शब्द बंगाली मन की सही नब्ज छूने की कोशिश करते हैं. भट्टाचार्य इंडिया टुडे से कहते हैं, ''हमारे सामने बहुत बड़ा काम है. बंगाल का पुनर्निर्माण तभी पूरा होगा, जब हम उसकी खोई हुई सांस्कृतिक, औद्योगिक और ऐतिहासिक अहमियत को फिर से जगा सकें.''
उनके बढ़ते प्रभाव का एक साफ संकेत दिखता है. भाजपा के सत्ता में आने से पहले ही पार्टी ने भट्टाचार्य के लिए सॉल्ट लेक में तीन मंजिला इमारत किराए पर ले ली थी. वहां आने वालों, फरियादियों और कार्यकर्ताओं की भीड़ लगी रहती है. भले ही एक समन्वय प्रकोष्ठ मुख्यमंत्री कार्यालय से नियमित संपर्क रखता हो, कई अंदरूनी लोग इसे फैसले लेने का वैकल्पिक केंद्र बता रहे हैं.
भाजपा यह समझती है कि बंगाल जीतना और बंगाल को चलाना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं. यह राज्य बहस और बहुलता की परंपराओं में गहराई से रचा-बसा है और आक्रामक बहुसंख्यकवाद को संदेह की नजर से देखता आया है. तृणमूल कांग्रेस छोड़ने वाले कई लोगों ने किसी वैचारिक बदलाव की वजह से नहीं बल्कि भ्रष्टाचार, सिंडिकेट कंट्रोल और प्रशासनिक गिरावट की वजह से ऐसा किया.
इसीलिए भट्टाचार्य पार्टी नेता होते हुए भी सरकार के दायरे में आने वाले अहम मुद्दों पर सक्रिय हैं. जैसे आर्थिक पुनरुद्धार, जो शहरी और उपनगरीय आकांक्षाओं की जड़ में है. राज्यसभा में भी वे बंगाल के औद्योगिक पतन को उठाते रहे थे. अब वे उस पर काम करते दिख रहे हैं—चैंबर्स ऑफ कॉमर्स को संबोधित कर रहे हैं, नए निवेश माहौल का वादा कर रहे हैं, जैसे वे उद्योग जगत के लिए बंगाल के प्रमुख दूत हों.
व्यापक भूमिका
उनका संदेश बिल्कुल साफ है—बंगाल के दरवाजे कारोबार के लिए एक बार फिर से खुल गए हैं. वे नई भूमि नीति के पैरोकार हैं, सियासी दखल से आजादी का भरोसा देते हैं और बार-बार कहते हैं कि निवेशकों को जबरन वसूली, सिंडिकेट या स्थानीय राजनैतिक दबावों से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. वे टाटा को बंगाल वापस लाने के लिए सार्वजनिक रूप से अभियान चला रहे हैं और सिंगूर को गंवाए हुए मौके के प्रतीक के तौर पर पेश करते हैं. वे देवचा पचामी, उत्तर 24 परगना में तेल भंडार और पश्चिम बंगाल के खनिज संसाधनों पर भी चर्चा आगे बढ़ा रहे हैं.
और सिर्फ आर्थिक मुद्दों तक की उनकी भूमिका सीमित नहीं. भाजपा की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है उसके 'तृणमूलीकरण' का अंदेशा. यानी दलबदलुओं, बाहुबलियों और सत्ता के दलालों का नए शासकों के करीब आने की कोशिश करना. भट्टाचार्य इस पर नजर रखने की कोशिश कर रहे हैं. वे कार्यकर्ताओं को हिंसा, धमकी और वसूली से बचने की चेतावनी दे रहे हैं. अनुशासनात्मक कार्रवाई अब आम हो गई है. यहां उनका संपर्क सरकार से भी है, और कुछ अहम सवाल तेजी से उनकी नजर से गुजर रहे हैं. खासकर यह कि प्रशासनिक ढांचे में किसे जगह मिलेगी.
सांस्कृतिक रूप से भाजपा की कट्टरपंथी रुझान और महानगरीय कोलकाता के बीच गहरी खाई है. भट्टाचार्य उस पर पुल बनाने की कोशिश कर रहे हैं. वे ऐसी भावना जाहिर करते हैं जो बंगाल की स्वतंत्र सोच की संस्कृति के ज्यादा करीब लगती है. तृणमूल सांसद पार्थ भौमिक वाले एक थिएटर प्रोडक्शन के मंचन के दौरान उनकी मौजूदगी को इसी मोर्चे पर नरम संकेत माना गया. यह भाजपा की बंगाल में सबसे बड़ी कमजोरी से निबटने की कोशिश थी—वह धारणा कि पार्टी अब भी सांस्कृतिक रूप से बाहरी है.
उनके पुल के मेहराब और ढांचे भले आकर्षक दिखने की कोशिश करते हों, लेकिन उसकी बुनियाद विकास के विचारों पर टिकी है. मकसद उन लोगों को इस पार आने के लिए राजी करना है जो अब भी दूसरी तरफ हैं, और जिन्हें टकराव जैसी भाषा दूर धकेल सकती है—कारोबारी वर्ग, शहरी आम जन, और दूरदराज के इलाकों में दुविधा में खड़े लोग. यह नरम अंदाज विवादित मुद्दों—हिरासत, देश से बाहर भेजने और ध्वस्तीकरण—तक पहुंचता है या नहीं, यह देखना बाकी है.
क्या काम का ऐसा बंटवारा टिक पाएगा? दोहरी व्यवस्था हमेशा पेचीदा होती है. फिर भी, फिलहाल भाजपा इसे विरोधाभास नहीं, बल्कि फायदे के तौर पर देखती लगती है. इसीलिए नवान्न के बाहर, भट्टाचार्य भाजपा के बंगाल प्रयोग में एक अहम संतुलनकारी चेहरा बनकर खड़े हैं.