मुद्दा पुराना, भिड़ंत नई

अशोक गहलोत के ताजा हमले ने राजस्थान कांग्रेस में फिर उभारा नेतृत्व का सवाल, सचिन पायलट की भूमिका पर नई अटकलें तेज हो गई है

अशोक गहलोत (बाएं) ने सचिन पायलट पर फिर से साधा निशाना

राजस्थान कांग्रेस में पिछले कुछ समय से अपेक्षाकृत दिख रही शांति को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक बार फिर झकझोर दिया है. पिछले हफ्ते अचानक बुलाई गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गहलोत ने अपने पुराने सियासी प्रतिद्वंद्वी सचिन पायलट पर तीखा हमला बोला और पार्टी के भीतर नेतृत्व तथा उत्तराधिकार की बहस को फिर से हवा दे दी.

गहलोत ने दावा किया कि सितंबर 2022 में कांग्रेस विधायकों की बगावत को गलत ढंग से पेश किया गया. उनके मुताबिक यह विद्रोह कांग्रेस हाइकमान के खिलाफ नहीं था, बल्कि उन खबरों के विरोध में था जिनमें कहा जा रहा था कि अगर वे दिल्ली जाकर कांग्रेस अध्यक्ष बनते हैं तो उनकी जगह सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा.

गहलोत का कहना है कि ज्यादातर विधायक किसी ऐसे नेता को मुख्यमंत्री बनाए जाने के खिलाफ थे जिसने 2020 में पार्टी के खिलाफ बगावत की थी. दरअसल तब तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के नेतृत्व में कुछ कांग्रेस विधायक हरियाणा के मानेसर में आ गए थे और अशोक गहलोत ने इसे उनकी सरकार गिराने की कोशिश करार दिया था.

अब उनके ताजा आक्रामक रुख ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दिया है. कांग्रेस के भीतर यह माना जा रहा है कि दिल्ली में पायलट को कोई बड़ी जिम्मेदारी देने की संभावनाओं पर विचार हो रहा है. गहलोत की ताजा टिप्पणी को इसी संभावित बदलाव के प्रति उनकी प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है.

गहलोत ने यह भी कहा कि 2022 का विधायकों का विद्रोह दरअसल उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से रोकने की एक साजिश थी. उनका दावा था कि वे राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के इच्छुक थे और मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की कोई विशेष इच्छा नहीं रखते थे, बशर्ते उनकी जगह किसी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जाता जिसे विधायक स्वीकार करते.

दूसरी ओर, सचिन पायलट का कहना रहा है कि गहलोत सरकार के कामकाज और संगठन से जुड़े मुद्दों पर दिल्ली का ध्यान आकर्षित करने के लिए उन्हें विरोध का रास्ता अपनाना पड़ा था. उल्लेखनीय है कि पायलट ने गहलोत के अधिकांश व्यक्तिगत हमलों का सार्वजनिक रूप से जवाब देने से परहेज किया है. फिर भी गहलोत के ताजा बयान यह स्पष्ट करते हैं कि छह वर्ष बाद भी दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दरार पूरी तरह नहीं भरी है. 

असल सवाल अब यह है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व राजस्थान में गहलोत के बाद की राजनीति की तैयारी कर रहा है? पायलट आज भी राज्य में कांग्रेस के लोकप्रिय और पहचान वाले नेताओं में गिने जाते हैं. हालांकि 2018 वाला राजस्थान अब नहीं रहा. उस समय कांग्रेस महज 21 सीटों पर सिमट गई थी और पायलट निर्विवाद प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उभरे थे.

आज स्थिति अलग है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने संगठन पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई है. वहीं विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने भी एक संतुलित और प्रभावी नेता के रूप में पहचान बनाई है. इसके अलावा वरिष्ठ नेता जितेंद्र सिंह भी केंद्रीय नेतृत्व के कुछ वर्गों में प्रभाव रखते हैं. यानी पायलट के सामने चुनौती केवल गहलोत का विरोध नहीं, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक परिदृश्य भी है जिसमें नेतृत्व के कई दावेदार मौजूद हैं.

इसी बीच गहलोत की ओर से कुछ बागी विधायकों पर भाजपा से प्रभावित होने के आरोपों ने पायलट समर्थकों को और आक्रामक बना दिया है. उनका कहना है कि पार्टी नेतृत्व को अब नेतृत्व के सवाल पर स्पष्टता लानी चाहिए, क्योंकि 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे शुरू होने वाली हैं. फिलहाल कांग्रेस हाइकमान ने इस पूरे विवाद पर चुप्पी साध रखी है. लेकिन गहलोत के ताजा हमले ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि राजस्थान कांग्रेस में नेतृत्व की लड़ाई खत्म नहीं हुई, बल्कि नए दौर में प्रवेश कर रही है.

गहलोत राज्य की राजनीति में निर्णायक प्रभाव रखते हैं और यह साफ कर चुके हैं कि उत्तराधिकार का फैसला उनकी इच्छा के विपरीत आसान नहीं होगा. दूसरी तरफ पायलट समर्थक मानते हैं कि अब उन्हें और इंतजार नहीं कराया जा सकता.

कांग्रेस नेतृत्व के सामने दुविधा यही है—क्या वह पायलट को फिर से राजस्थान की राजनीति के केंद्र में लाए, विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच संतुलन साधे, या फिर फैसला टालता रहे? फिलहाल राजस्थान कांग्रेस की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही है. और गहलोत के ताजा तेवर बता रहे हैं कि इसका जवाब अब बहुत लंबे समय तक टाला नहीं जा सकेगा. 

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