वे बनाएंगे अलग पहचान!
जाति जनगणना ने जमीनी स्तर पर हलचल बढ़ाई. कई समूह अपनी मांगों के साथ सक्रिय होकर सामने आ रहे. लिंगायत समुदाय अपने लिए एक अलग धर्म की मांग कर रहा तो बौद्ध दलित जातिगत लामबंदी से खुद को मजबूत करने की ताक में है

विज्ञान में एक नियम है ऑब्जर्वर्स पैराडॉक्स, जो कहता है कि किसी विषय का सिर्फ अध्ययन या निरीक्षण करने मात्र से ही विषय खुद-ब-खुद बदल जाता है. महाराष्ट्र साल 2027 की जनगणना से ठीक पहले इसी का जीवंत उदाहरण पेश करता दिख रहा है.
यह राज्य समाजशास्त्रियों के 'संस्कृतीकरण' के सिद्धांत यानी निचली जातियों की ओर से ऊंची जातियों के रीति-रिवाजों को अपनाने की परंपरा के एकदम उलट आधुनिक रूप देख चुका है. आज लोगों की जातिगत पहचान तो बेहद मजबूत और स्थिर है लेकिन श्रेणियां (सामान्य, ओबीसी आदि) बदल रही हैं.
अब जब भारत लगभग एक सदी में पहली बार जाति समूहों की गिनती करने की तैयारी कर रहा है, ऐसे में यह प्रवृत्ति और गहराती जा रही है. देखा जा रहा है कि लिंगायत और बौद्ध दलित अपनी मांगों को लेकर आक्रामक हो रहे हैं. घरों की सूची बनाने के साथ जनगणना का पहला चरण जारी है जो सितंबर तक चलेगा. लेकिन पहचान-आधारित समूह अभी से ही दूसरे चरण के लिए लामबंद होने लगे हैं, जिसके तहत फरवरी 2027 से जाति गणना की जाएगी.
ऐसे समूहों के नेताओं ने अपने समुदाय के लोगों से संपर्क साधना शुरू कर दिया है: उन्हें बाकायदा संदेश दिया जा रहा है कि अपनी पहचान 'कैसे' और 'क्या' लिखनी है. और ऐसा लगता है कि जाति वाले कॉलम के साथ-साथ धर्म वाला कॉलम भी इससे अछूता नहीं रह गया है.
एक करोड़ का सवाल
लिंगायत समुदाय का मामला इसका एक अहम उदाहरण है. पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठवाड़ा में भी उनकी बड़ी आबादी रहती है. कुल मिलाकर उनकी संख्या लगभग एक करोड़ है. इनके प्रतिनिधि संगठन अपने सदस्यों से कह रहे हैं कि वे अपने धर्म को 'हिंदू' के बजाय 'लिंगायत' या 'वीरशैव-लिंगायत' दर्ज कराएं.
जागतिक लिंगायत महासभा से जुड़े विजयकुमार हत्तुरे कहते हैं, ''सांस्कृतिक रूप से हम हिंदू हैं लेकिन लिंगायत धर्म से ताल्लुक रखते हैं.'' लिंगायत समन्वय समिति के राष्ट्रीय समन्वयक और बसव ब्रिगेड अध्यक्ष अविनाश भोसीकर बताते हैं कि हाल ही नांदेड़ में समुदाय के करीब 19 संगठनों की एक बैठक हुई, जिसमें इसी अंतर पर जोर देते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया.
हालांकि, हर कोई इससे सहमत नहीं. 'जंगम' पुजारी समुदाय 'हिंदू' पहचान छोड़ने के किसी भी कदम के खिलाफ है. समुदाय के भीतर जाति दूसरे तरीकों से असर दिखा रही है. अलग पहचान चाहने वाले अपने समुदाय के लोगों को सलाह दे रहे हैं कि वे धर्म के साथ-साथ अपनी जाति का भी खास तौर पर जिक्र करें.
धर्म-जाति का ऐसा ही टकराव दलित बौद्धों के मामले में भी दिखता है. ये लोग पहले महार जाति से ताल्लुक रखते थे, और उन्होंने बाबासाहेब आंबेडकर के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया था. उनसे कहा जा रहा है कि जनगणना में अपना धर्म (बौद्ध) और अपनी मूल जाति, दोनों दर्ज कराएं. इसके पीछे वजह क्या है? अनुसूचित जाति आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की राज्य सरकार की दलित जातियों के लिए कोटे के भीतर कोटे की योजना, क्योंकि कुछ दलित जातियों का दावा है कि अब तक ज्यादातर फायदा महार जाति को ही मिला है. दलित बौद्धों का यह जवाब उसी के खिलाफ है. उनकी दलील क्या है? डॉ. आंबेडकर के पोते और भारतीय बौद्ध महासभा के प्रमुख भीमराव यशवंत आंबेडकर कहते हैं, ''सब कुछ संख्या पर निर्भर करता है.''
'बौद्ध' और 'महार'
जनगणना से साफ हो जाएगा कि कितने दलित बौद्ध हैं और कुल मिलाकर उनकी संख्या कितनी है. उनकी राय है कि यह आंकड़ा राज्य में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित लोकसभा सीटें पांच से बढ़ाकर आठ और विधानसभा सीटें 29 से बढ़ाकर 49 करने के साथ-साथ शिक्षा और नौकरियों में दलित कोटा 13 से बढ़ाकर 18 फीसद करने की मांग को मजबूती देगा.
2011 की जनगणना में बौद्ध दलितों ने अपनी पहचान अलग-अलग तरह से बताई थी. केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया से जुड़े छात्र नेता चंद्रशेखर कांबले का कहना है कि अब ऐसा नहीं होगा. उनके मुताबिक, तस्वीर स्पष्ट होने से कोटे पर पड़ने वाले किसी भी असर को रोका जा सकेगा.
इस विचार के प्रति संदेह जताने वाले सेक्युलर मूवमेंट के भरत शेलके का कहना है कि आंबेडकरवाद को जाति-व्यवस्था से अलग हो जाना चाहिए. हालांकि, जनगणना में ऐसे विचार रखने वाले लोग शायद अल्पसंख्यक ही साबित हों क्योंकि राज्य में 59 अनुसूचित जातियां हैं—जिनमें बौद्ध दलित सबसे बड़ा समूह है.