ऐसे तो मैदान न छोड़ेंगे दिग्गी

पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज राजनेता अपने लिए किस भूमिका की तलाश में हैं? वे किसी आश्रम में तो नहीं ही जा रहे

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह

सियासतदानों के लिए स्वयं में एक प्रशिक्षण संस्थान, एक आश्रम और शांतिदूत की भूमिका. कामों की यह फेहरिस्त भले आपको सेवानिवृत्ति की तरह लगे लेकिन इरादा उससे अलग ज्यादा सक्रिय भूमिका का है. हम दिग्विजय सिंह के बारे में बात कर रहे हैं.

कुछ लोग उन्हें पसंद करते हैं, कुछ बिल्कुल नहीं, लेकिन मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हमेशा कुछ ऐसा करते रहते हैं जिससे उनके मामले में 'तटस्थों' की तीसरी कतार न बन सके. अब जब राज्यसभा में उनका दूसरा कार्यकाल 21 जून को खत्म होने जा रहा है, 'दिग्गी राजा' 79 की उम्र में अपनी आत्मकथा को नया मोड़ दे रहे हैं.

दिग्विजय ने जनवरी में ही ऐलान कर दिया था कि वे दौड़ में नहीं होंगे (मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास राज्यसभा की तीन में से एक सीट जीतने का मौका था लेकिन मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज हो गया). मार्च में उन्होंने रिटायर होने जा रहे एक बैंक मैनेजर का वीडियो शेयर किया. तब से ही अटकलों का बाजार गर्म है. उस सियासतदां के लिए कांग्रेस कौन-सी भूमिका पर विचार कर सकती है जिसने पार्टी के ऊपरी पायदानों पर भी वक्त गुजारा और मैदानी राजनेता के तौर पर इस तरह धूप में रहा जैसे कोई दूसरा न रहा?

उनकी 192 दिनों तक चलने वाली 3,300 किमी की नर्मदा परिक्रमा राज्य के 230 विधानसभा क्षेत्रों में से 110 से होकर गुजरी. उन्होंने करोड़ों ग्रामीण वोटरों से दिल के तार जोड़े. यह 2018 में कांग्रेस की वापसी की शुरुआत थी. हाल के दिनों में वे उन लोगों में से थे जिन्होंने राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ो यात्रा की पूरी दूरी नापी और 75 की उम्र में भी पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त हैं. पदयात्राओं का यह दिग्गज क्या अब इतनी आसानी से संन्यास ले लेगा?

इस विचार को सिरे से ही तज दीजिए. निजी बातचीत में दिग्गी 2028 के विधानसभा चुनाव को राज्य में कांग्रेस के लिए शायद आखिरी मौका बताते हैं—और वे उसमें मदद करना चाहेंगे. उनके मन में और भी बातें हैं. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''ऐसा करना मुश्किल लग सकता है लेकिन मैं राजनीति का ऐसा प्रशिक्षण संस्थान बनाने की योजना बना रहा हूं जिसमें भारत की सारी विचारधाराएं पढ़ाई जाएं—कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी, कम्युनिस्ट, डीएमके.'' यह संस्थान रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी की तर्ज पर होगा, जिसके उपाध्यक्ष भाजपा के विचारक विनय सहस्त्रबुद्धे हैं.

अपने लिए वे जो दूसरी भूमिका देख रहे हैं, उसका एक हिस्सा बातचीत या संभाषण का उत्साह है. दिग्गी गुटों के बीच तालमेल के लिए अपनी सेवाओं की पेशकश कर रहे हैं. यह काम आसान न होगा. फूट घर से ही शुरू हो जाती है. उनके छोटे भाई और पांच बार के पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह पार्टी विरोधी बयानबाजी की वजह से निष्कासित हैं. मगर राज्य कांग्रेस प्रमुख जीतू पटवारी को वरिष्ठ कांग्रेसियों से अपना नेतृत्व स्वीकार करवाने के लिए अभी बहुत पापड़ बेलने हैं.

एक और विचार अपनी आध्यात्मिक जड़ों की तरफ लौटने का है. उन्होंने कहा, ''नर्मदा परिक्रमा के दौरान मुझे एहसास हुआ कि तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए ज्यादा विकल्प नहीं हैं.'' लिहाजा एक आश्रम बनने वाला है. नरसिंहपुर जिले के रोहनी में जमीन देख ली गई है. मगर जिसे राजनीति का गुरु माना जाता हो, उस शख्स के लिए यह बात दिमाग में अटती नहीं कि वह पूरी तरह आश्रम की शरण में चला जाएगा.

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