कहां फंस गया आखिर दीपक का पेच

उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को विधान परिषद के लिए उम्मीदवार न बनाना वंशवाद से जुड़ी चिंता के बजाय सोचे-समझे सियासी हिसाब-किताब का मामला लग रहा

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ एनडीए के एमएलसी उम्मीदवार

बिहार विधान परिषद का यह चुनाव साल की सबसे कम नाटकीय सियासी घटनाओं में से एक होना चाहिए था. दस सीटों के लिए दस उम्मीदवार हैं और ऐसे में 8 जून को नामांकन प्रक्रिया खत्म होते ही नतीजे लगभग तय हो गए थे.

एनडीए ने नौ उम्मीदवारों को मैदान में उतारा. दूसरी ओर, विपक्ष ने राजद से एक उम्मीदवार को नामित किया. 11 जून को सभी 10 उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए गए. मगर सबसे खास बात यह है कि इस चुनाव में सबसे अहम नाम उम्मीदवारों की सूची में नहीं था.

दीपक प्रकाश का नाम इसमें शामिल नहीं था जो बिहार सरकार के मंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के बेटे हैं. दीपक को पहली बार नवंबर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुआई वाले बिहार मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था.

बाद में मई में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान उन्हें फिर से शामिल कर लिया, जबकि वे न तो विधानसभा के सदस्य थे और न ही विधान परिषद के. संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, जो मंत्री किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता, उसके लिए छह महीने के भीतर किसी एक सदन के लिए निर्वाचित होना अनिवार्य होता है. दीपक प्रकाश के लिए यह समय-सीमा नवंबर की शुरुआत में खत्म होगी.

विधान परिषद का यह चुनाव उनके लिए पद पर बने रहने का सबसे आसान रास्ता माना जा रहा था. मगर जब सत्तारूढ़ गठबंधन ने उम्मीदवारों की अपनी सूची को अंतिम रूप दिया, तो दीपक प्रकाश का नाम उसमें कहीं नहीं था. उनको बाहर रखने के कदम से उपेंद्र कुशवाहा और भाजपा नेतृत्व में दरार की अटकलें लग रही हैं. 

पिछले लगभग दो दशकों में उपेंद्र कुशवाहा ने बिहार की सियासत में अपनी एक खास जगह बनाए रखी. वे सबसे बड़े सियासी खिलाड़ी नहीं रहे और उनके पास विधायी ताकत भी अधिक नहीं रही, और अपने सियासी भविष्य के लिए वे अकसर समझौते करते नजर आए. फिर भी विभिन्न सरकारों और गठबंधनों ने उन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश की.

इसका कारण साफ था. ऐसे राज्य में जहां चुनावी राजनीति में जाति के आधार पर ही लोग एकजुट होते हैं, कुशवाहा अपने विधायकों की संख्या से अधिक मायने रखते थे. कुशवाहा नीतीश कुमार के साथ गए, फिर उनसे अलग हुए. उसके बाद एक बार फिर वे साथ आए, और दोबारा अलग भी हो गए. इस तरह उन्होंने लगातार अपना अलग-अलग सियासी ठिकाना बनाया. उनकी इस रणनीति ने उन्हें सियासी रूप से प्रासंगिक बनाए रखा, जबकि उनके कई समकालीन लोग सुर्खियों से गायब हो गए. मगर जरूरी नहीं कि आप हमेशा सुर्खियों में बने रहें और आपका असर कायम रहे.

सम्राट चौधरी का उभार
बिहार का 2026 का एनडीए महज पांच साल पहले के गठबंधन से काफी अलग है. अभी भी कुर्मी समुदाय और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के कुछ हिस्सों में नीतीश कुमार का असर कायम है. इससे भी अहम बात यह है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी एनडीए के सबसे प्रमुख कुशवाहा चेहरे के रूप में उभरे हैं. दशकों तक उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक प्रासंगिकता इसी दावे पर आधारित रही कि वे इस समुदाय पर प्रभाव रखते हैं. मगर आज एनडीए के पास वह चीज है जो पहले के वर्षों में नहीं थी. वह है उसी समुदाय से आने वाला एक मुख्यमंत्री. भाजपा का आकलन एकदम साफ है. अगर सम्राट कुशवाहा वोट को अपने पाले में एकजुट करने में सक्षम हैं, तो उसी सामाजिक समूह से एक अन्य बड़े नेता को समायोजित करने की रणनीतिक जरूरत नहीं रह जाती.

इस कहानी का एक और पहलू भी है. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा गया था. फिर उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए के टिकट पर विधानसभा पहुंचीं. अगर दीपक को भी विधान परिषद भेज दिया जाता तो कुशवाहा परिवार को एक ही वक्त में राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद तीनों जगहों पर प्रतिनिधित्व मिला जाता, जबकि दीपक पहले से ही कैबिनेट मंत्री बने हुए हैं.

उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को बिहार विधान परिषद की राह नहीं मिल पाई

एनडीए अरसे से वंशवाद को लेकर राजद को घेरती रही है. दीपक प्रकाश के लिए उस इंतजाम से उसका वह आरोप कमजोर पड़ जाता और विपक्ष को आसानी से सियासी हमले का मौका मिल जाता. मगर सियासत हमेशा केवल नैतिक ढर्रे पर नहीं चलती. अगर भाजपा को लगता कि उपेंद्र कुशवाहा चुनावी रूप से अब भी अपरिहार्य हैं, तो वह शायद उस इंतजाम का बचाव करने का रास्ता निकाल लेती.

एक व्याख्या के मुताबिक, भाजपा का मानना है कि कुशवाहा के पास अब बहुत सीमित सियासी विकल्प बचे हैं. विपक्षी गठबंधन को भी अपने जातीय समीकरणों को संतुलित करना पड़ता है, और कुशवाहा के बार-बार सियासी खेमा बदलने के इतिहास ने उन्हें हर संभावित सहयोगी के लिए पूरी तरह भरोसेमंद विकल्प नहीं बनाया है. दूसरी व्याख्या इससे कम नाटकीय है. बिहार में उम्मीदवार चयन अकसर सामाजिक संतुलन की एक जटिल कवायद होती है, और संभव है कि एनडीए ने इस समय अन्य समुदायों और सहयोगी दलों को प्राथमिकता देना अधिक उचित समझा हो.

हकीकत शायद कहीं बीच में
नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार समेत विभिन्न दलों में एक नई पीढ़ी दशकों से संचित राजनीतिक पूंजी को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है. दीपक प्रकाश का मंत्रिमंडल में शामिल होना भी व्यापक रूप से इसी नजरिए से देखा गया था.

मगर यह कोशिश बेपटरी होती दिख रही. कुशवाहा अब भी अपने बेटे के लिए किसी उपचुनाव के जरिए विधानसभा का रास्ता तैयार करने की कोशिश कर सकते हैं. वे एनडीए के भीतर शर्तों पर फिर से बातचीत कर सकते हैं. या फिर वे इंतजार की रणनीति अपना सकते हैं, यह मानते हुए कि सियासी हालात अकसर जन धारणाओं के मुकाबले कहीं तेजी से बदलते हैं. 

यही कारण है कि यह चुनाव अहम हो गया है. कागजी तौर पर यह एक सामान्य विधान परिषद का चुनाव है मगर हकीकत में यह एनडीए के भीतर के शक्ति-संतुलन और बिहार में सत्ता की बदलती सामाजिक संरचना की दुर्लभ झलक पेश करता है.

मसला यह नहीं कि दीपक प्रकाश एमएलसी बनते हैं या नहीं. राजनेता इससे कहीं बड़े झटके झेलकर बरकरार रहते हैं. और सवाल यह भी नहीं है कि दीपक मंत्री बने रहते हैं या नहीं. असल बड़ा सवाल यह है कि क्या उपेंद्र कुशवाहा अब भी एनडीए के सियासी आकलनों में पहले जैसी अहमियत रखते हैं?

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