लगे रहो प्रधान जी
ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाकर योगी सरकार ने पंचायत चुनाव आगे बढ़ाया. विपक्ष इसे सियासत की अवसरवादी रणनीति बता रहा जबकि सरकार के लिए यह कानूनी प्रक्रिया की मजबूरी बन गई है

बस्ती जिले की एक ग्राम पंचायत के प्रधान रहे रामविलास यादव पिछले पांच वर्षों से गांव की राजनीति के केंद्र में हैं. मई 2026 में उनका कार्यकाल समाप्त होना था और वे पंचायत चुनाव की तैयारी में जुटे थे. गांव में जातिगत समीकरण साधे जा रहे थे. समर्थकों की बैठकें चल रही थीं. विपक्षी दावेदार भी मैदान में उतर चुके थे. लेकिन 26 मई के बाद समीकरण एकाएक बदल गए. चुनाव टल गए और रामविलास गांव की सत्ता के केंद्र में बने रहे. इतना जरूर है कि अब वे प्रधान नहीं बल्कि 'प्रशासक' हैं. गांव में लोग पूछ रहे हैं कि जब चुनाव नहीं हुए तो क्या यह सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था है या इसके पीछे कोई बड़ी सियासी रणनीति भी छिपी हुई है?
उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो गया. लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार ने 57,000 से ज्यादा निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में काम जारी रखने की अनुमति दे दी. यह एक बड़ा राजनैतिक संदेश है. सरकार का तर्क है कि पंचायत चुनावों में देरी ओबीसी आरक्षण से जुड़े कानूनी और प्रक्रियागत कारणों से हुई है. गांवों में प्रशासनिक शून्य पैदा न हो, इसलिए यह व्यवस्था की गई है. लेकिन सियासत के गलियारों में इसे 2027 के विधानसभा चुनावों से जुड़ी एक व्यापक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.
उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) के तहत सरकार ने मौजूदा प्रधानों को अधिकतम छह महीने के लिए प्रशासक नियुक्त किया है. सरकार का कहना है कि पंचायत चुनाव टालने के पीछे मुख्य कारण ओबीसी आरक्षण का मुद्दा है. इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देशों के बाद राज्य सरकार ने पूर्व न्यायाधीश राम औतार सिंह की अध्यक्षता में समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया है. इस आयोग की रिपोर्ट, आरक्षण निर्धारण, मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया को मिलाकर कई महीने लग सकते हैं.
लेकिन राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो कहानी सिर्फ इतनी नहीं है. राजनैतिक विश्लेषक और लखनऊ के जय नारायण डिग्री कालेज में राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर ब्रजेश मिश्र साफ कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव हमेशा विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माने जाते रहे हैं. उसके नतीजे ग्रामीण राजनैतिक रुझानों का बड़ा संकेत देते हैं. अगर पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव से ठीक पहले होते और सत्तारूढ़ दल को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती, तो उसका मनोवैज्ञानिक असर विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता था.'' उनके अनुसार, पंचायत चुनाव के टलने से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को एक संभावित राजनैतिक जोखिम से राहत मिली है. सरकार अब सीधे विधानसभा चुनाव पर फोकस कर सकती है, बिना किसी बड़े ग्रामीण चुनावी मुकाबले के.
दरअसल, पंचायत चुनाव का महत्व केवल ग्राम प्रधान चुनने तक सीमित नहीं. प्रदेश में 58,000 से ज्यादा ग्राम पंचायतें, 826 क्षेत्र पंचायतें और 75 जिला पंचायतें हैं. 12 करोड़ से ज्यादा मतदाता इस विशाल ढांचे से जुड़े हैं. पंचायत चुनाव राजनैतिक दलों के लिए बूथ स्तर की ताकत नापने, जातीय समीकरणों को परखने और प्रभावशाली स्थानीय नेताओं को पहचानने का सबसे बड़ा मंच होते हैं. शिक्षाविद् और राजनैतिक मामलों के जानकार डॉ. एस.पी. सिंह कहते हैं, ''पंचायत चुनाव समय पर होते तो विपक्ष को ग्रामीण असंतोष को राजनैतिक समर्थन में बदलने का अवसर मिलता. भाजपा के सहयोगी दल भी पंचायत चुनाव में प्रभाव का प्रदर्शन कर विधानसभा सीटों के बंटवारे से पहले सौदेबाजी की स्थिति मजबूत कर सकते थे.''
यही वजह है कि विपक्ष इस फैसले को संदेह की नजर से देख रहा है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अब्दुल हफीज गांधी कहते हैं, ''ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती नाराजगी का सामना करने के बजाए सरकार चुनाव टाल रही है. पंचायत चुनाव सत्ता विरोधी माहौल का पहला संकेत दे सकते थे.'' हालांकि सरकार और सहयोगी दल इन आरोपों को खारिज करते हैं.
पंचायती राज मंत्री और सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर का दावा है कि सरकार पंचायत चुनाव समय पर कराने के लिए पूरी तरह तैयार थी. उनकी मानें तो मतपत्र तक छप चुके थे और मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन होने वाला था. बकौल राजभर, ''सपा अगर इस मामले को अदालत में नहीं ले जाती तो पंचायत चुनाव समय पर हो जाते. अदालती हस्तक्षेप के बाद सरकार को आयोग गठित करना पड़ा. चुनाव में देरी के लिए सपा जिम्मेदार है.'' राजभर ने एक बयान में यहां तक संकेत दिया कि जरूरी हुआ तो प्रशासकों की व्यवस्था छह महीने से आगे भी जारी रह सकती है और पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद तक टल सकते हैं. हालांकि कानूनी रूप से यह रास्ता आसान नहीं माना जा रहा, लेकिन इस बयान ने विपक्ष को सरकार के इरादों पर सवाल उठाने का अवसर दे दिया है.
सियासी नजरिए से देखें तो सबसे दिलचस्प पहलू ग्राम प्रधानों का विशाल नेटवर्क है. चुनाव भले गैरदलीय आधार पर होते हों लेकिन ज्यादातर प्रधान किसी न किसी सियासी दल या स्थानीय शक्ति-समूह से जुड़े होते हैं. विधानसभा चुनाव से पहले यही नेटवर्क मतदाताओं को प्रभावित करने, सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाने और बूथ प्रबंधन में अहम भूमिका निभा सकता है. मिश्र कहते हैं, ''प्रधानों के हटने पर गांवों का प्रशासन सीधे नौकरशाही के हाथ में चले जाने से असंतोष पैदा हो सकता था. उन्हें प्रशासक बनाए रखकर सरकार ने दो लक्ष्य साधे हैं: प्रशासनिक निरंतरता भी बनी रहेगी और गांवों में रसूख रखने वाला नेतृत्व भी नाराज नहीं होगा.''
इसका दूसरा पक्ष भी है. प्रशासकों को नीतिगत फैसले लेने का अधिकार न होने से उनका प्रभाव सीमित हो गया है और अधिकार भी. कई प्रधान संगठन पहले ही मांग कर चुके हैं कि उन्हें पूर्ण अधिकार दिए जाएं या जल्द चुनाव कराए जाएं क्योंकि बिना अधिकार प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाना कठिन होगा. इस पूरे घटनाक्रम का असर भाजपा के सहयोगी दलों पर भी पड़ सकता है. अपना दल (एस), निषाद पार्टी और सुभासपा जैसे दल पंचायत चुनाव के जरिए जनाधार का प्रदर्शन करना चाहते थे. पंचायत चुनाव में अच्छा प्रदर्शन विधानसभा सीटों के बंटवारे के समय उनकी ताकत बढ़ा सकता था. चुनाव टलने से उनकी यह रणनीति फिलहाल अधर में लटक गई है.
पर ये चुनाव होंगे कब? ओबीसी आयोग की रिपोर्ट, आरक्षण निर्धारण, मतदाता सूची संशोधन और चुनावी प्रक्रिया को देखते हुए सियासी हलकों में यह संभावना लगातार चर्चा में है कि पंचायत और विधानसभा चुनाव की समयरेखा एक-दूसरे के बेहद करीब पहुंच सकती है. ऐसा होता है तो प्रदेश में पंचायत चुनाव की पारंपरिक भूमिका बदल जाएगी. वे विधानसभा चुनाव के परिणामों के साए में चले जाएंगे.