बड़ी मुश्किलें हैं इस विरासत में
सियासी नेताओं ने पूर्व नवाबों पर निशाना क्या साधा कि भोपाल रुबातें यानी हाजियों के लिए बनवाई गई सरायें तीखी मुंहजबानी जंग के घेरे में आ गईं

उलझनों से कराहती बीती सदी ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती गई, अतीत का सुहाना नजरिया रखने वालों ने शाही उदारता की पुरानी बादामी तस्वीर को मन में संजोये रखने की बहुतेरी कोशिशें कीं. भोपाल की रुबातों को ही देखिए. ये मक्का और मदीना में हज यात्रियों के लिए बनवाई गई सरायें हैं, जिनका निर्माण भोपाल की बेगमों शाहजहां और उनकी शहजादी सुल्तान जहां की हुकूमतों के दौरान 1838 से 1930 के बीच करवाया गया था.
कम से कम 1920 से ये सरायें शहर के उन दीनदारों को पनाह देती रही हैं जो इन मुकद्दस जगहों की जिंदगी में एक बार होने वाली यात्रा कर पाए. कोई शक नहीं कि इन हाजियों के लिए ये सरायें भोपाल के नवाबों के उस 'सुनहरे युग' से जोड़ने वाले सुकून भरे जज्बाती पुल का काम करती हैं. मगर आज लोकतंत्र के उलझे तौर-तरीकों के बीच ऐसे विचार तेजी से मर जाते हैं.
समुदाय की हकदारी के बढ़ते एहसास के साथ और भला हो भी क्या सकता है. विवादों से रुबातों का पुराना नाता है. मगर हाल ही वह परवान चढ़ा जब भोपाल के स्थानीय विधायक ने उसके मुतवल्ली या संरक्षकों पर बदइंतजामी के आरोप लगाए. इस हद तक कि हज यात्रा से पहले हाजियों से ठहरने की जगह तक छीन ली गई.
झगड़े के केंद्र में भोपाल के उद्योगपति सिकंदर हाफिज खान और साथ ही सबा सुल्तान हैं, जो मशहूर क्रिकेटर रहे एम.ए.के. पटौदी और शर्मिला टेगौर की बेटी हैं, जिन्हें अक्सर इस नामी खानदान की सबसे संयमी और मितभाषी शख्सियत माना जाता है.
ये जायदादें औकाफ-ए-शाही के मातहत हैं. यही वह निकाय है जो भोपाल के तत्कालीन गद्दीनशीन खानदान की धार्मिक संपत्तियों और दान दी गई चीजों के नेटवर्क को संभालता है. सबा अक्तूबर 2011 से औकाफ-ए-शाही की मुतवल्ली या संरक्षक हैं. आरोपियों के मुख्य निशाने सिकंदर हाफिज खान हैं जिनके पास सबा की पॉवर ऑफ एटॉर्नी हैं.
तकनीकी प्रहार
विवाद शुरू कैसे हुआ? मक्का और मदीना के विस्तार की परियोजनाओं के चलते बीते दशकों के दौरान मूल सरायें गिरा दी गईं. मुआवजे में मिली रकम का इस्तेमाल नई संपत्तियां खरीदने के लिए किया गया, ताकि भोपाल के हाजियों को ठहरने की मुफ्त जगह देने की रवायत जारी रह सके. अपने स्वभाव के चलते सबा ने अपना सार्वजनिक जीवन ट्रस्टीशिप तक ही सीमित रखा, जिसमें उन्हें कम ही सामने आना पड़ता है. वे खान को आगे रखकर काम करती रहीं.
मगर भोपाल मध्य के कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद तकनीकी ब्योरों में किन्हीं गड़बड़ियों का आरोप लगा रहे हैं. उनका कहना है कि सबा और खान ने वह कागजी कार्रवाई पूरी नहीं की जो मक्का रुबात को सेंट्रल हज कमेटी की तरफ से ठहरने की जगह के तौर पर मान्यता दिलवाने के लिए जरूरी थी. इस रुबात में पूर्व रियासत के इलाकों भोपाल, रायसेन और सीहोर के हाजियों के लिए 210 सीटें हैं.
जब इन सीटों से ज्यादा अर्जियां आती हैं तो जगहें लॉटरी से तय की जाती हैं. जगह हासिल कर लेने वाले हाजियों के ठहरने का खर्च इससे पूरा हो जाता है और कुछ महीनों बाद उन्हें 75,000 रुपए रिफंड कर दिए जाते हैं. मसूद का कहना है कि कागजात दाखिल करने में हुई देरी की वजह से इस साल कोई भी इस सुविधा का लाभ नहीं उठा सकता.
मदीना की रुबात में मोटे तौर पर करीब एक हजार हाजियों को ठहराया जा सकता है, मगर यह इमारत बेकार पड़ी है. कहानी का सिरा पीछे दशक भर लंबी मुकदमेबाजी तक जाता है. मध्य प्रदेश वक्फ पंचाट में दाखिल दस्तावेजों से पता चलता है कि मक्का के अजीजियाह में रुबात के तौर पर काम करने के लिए 2014 में नई इमारत 1.8 करोड़ सऊदी रियाल (46.3 करोड़ रुपए) में खरीदी गई. सिटिजंस वेलफेयर फोरम के प्रेसीडेंट मोहम्मद अफाक के मुताबिक, मदीना में जमीन पर किए गए बदलाव कहीं ज्यादा गड़बड़ थे और मदीना की अदालत ने सबा को अंतिम मुतवल्ली के पद से हटा दिया. 19 लाख सऊदी रियाल की वसूली अभी की जानी है. अदालत ने साल 2020 में फरमान सुनाया कि रुबात को हाजियों के लिए बंद कर दिया जाए.
धर्मार्थ कामों के लिए मशहूर खान इन आरोपों से इनकार करते हैं. तकलीफ के एहसास के साथ वे कहते हैं कि कागजात वक्त पर दाखिल कर दिए गए थे और रुबात को चालू करवाने के लिए वे पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. सबा ने कुछ नहीं कहा. एक दिलचस्प मोड़ आया जब भाजपा के पूर्व विधायक ध्रुव नारायण सिंह, जो 2023 के विधानसभा चुनाव में मसूद से हार गए थे, खान के बचाव में आगे आए. मगर यह हाजियों के लिए कोई तसल्ली की बात नहीं.