टीम डीकेएस में समीकरण और संतुलन का मेल
एक नए घोषणापत्र के साथ पदभार संभाल रहे नए मुख्यमंत्री के लिए जातिगत संतुलन बनाना तो खैर मुश्किल है ही, लेकिन वित्तीय संतुलन साधना शायद और भी मुश्किल होगा

कर्नाटक में सत्ता का हस्तांतरण किसी केलाइडोस्कोप के भीतर मोतियों को हिलाकर दो आकृतियों से एक नई आकृति बनाने जैसा था. पहले क्रम में धीरे से हुआ बदलाव 28 मई को सिद्धरामैया के इस्तीफे के साथ सामने आया. इसके बाद इसे एक नए क्रम में ढलने से पहले संतुलित आकार में आने के लिए कुछ देर के लिए उथल-पुथल वाला दौर देखना पड़ा.
फिर एक नया रूप तीन जून को सामने आया, जब 64 वर्ष के डी.के. शिवकुमार ने कांग्रेस के नए मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. पार्टी के वरिष्ठ नेता डॉ. जी. परमेश्वर ने उपमुख्यमंत्री पद संभाला. और अंत में 12 मंत्रियों की एक टीम ने इस मंत्रिमंडल को पूर्णता प्रदान की. डीकेएस के नाम से मशहूर शिवकुमार का राज्याभिषेक उनकी इच्छा से कहीं ज्यादा सादगी भरा रहा; एक 'विजय रैली' रद्द कर दी गई, बड़े-बड़े पोस्टर हटा दिए गए और शपथ ग्रहण समारोह किसी स्टेडियम के बजाय गवर्नर हाउस में हुआ.
खबरों के मुताबिक, पार्टी आलाकमान को लगा कि आर्थिक तंगी के इस दौर में भव्य समारोह करना शोभा नहीं देगा. डीकेएस ने भी समारोह सादगी भरा रखा, समर्थकों को नियंत्रित रखा, और अपनी आक्रामक शैली नीति-निर्माण के क्षेत्र में दिखाने का फैसला किया. यह सचमुच बड़े छक्के लगाने का समय था—इस मौके पर छह घोषणाओं से संकेत मिलता है कि वे पार्टी का कल्याणकारी एजेंडा आगे बढ़ाएंगे, साथ ही बेंगलूरू के कायाकल्प की अपनी योजना पर काम करते रहेंगे.
लेकिन सबसे पहले तो सिद्धरामैया के हटने के बाद जातिगत संतुलन को नए सिरे से साधना जरूरी था. कुरुबा गड़रिया समुदाय से ताल्लुक रखने वाले सिद्धरामैया पिछड़े वर्ग की राजनीति का एक बड़ा चेहरा रहे हैं; अल्पसंख्यकों, ओबीसी और दलितों को एकजुट करना उनकी सबसे बडी सियासी खूबी है, जिसे कन्नड़ में अहिंदा नाम से जाना जाता है. दूसरी ओर, शिवकुमार वोक्कलिगा समुदाय से आते हैं—जो राज्य के दो सबसे प्रभावशाली जाति-समूहों में से एक है. वोक्कलिगा और लिंगायत समुदायों ने कर्नाटक को क्रमश: आठ और नौ मुख्यमंत्री दिए हैं. सवाल यह था कि पुराने राजनीतिक समीकरणों की ओर झुकाव कैसे संतुलित किया जाए?
दलित उपमुख्यमंत्री
पार्टी के एक मजबूत दलित चेहरे के तौर पर परमेश्वर इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त थे. एडिलेड से प्लांट फिजियोलॉजी में पीएचडी करने के बाद परमेश्वर को उस समय राजीव गांधी ने तैयार किया था. एक युवा फर्राटा धावक के तौर पर वे एक बार 100 मीटर की दौड़ महज 10.9 सेकंड में पूरी कर चुके हैं. उन्हें शीर्ष पर पहुंचने में समय जरूर लगा लेकिन अब 75 वर्ष की उम्र में वे ऐसे समय इस मुकाम पर पहुंचे हैं जब राहुल गांधी कांग्रेस की राजनीति में आंबेडकरवादी विचारधारा को गहराई से समाहित कर रहे हैं.
पार्टी में फेरबदल भी जरूरी था क्योंकि डीकेएस राज्य कांग्रेस प्रमुख के पद पर भी थे. यह पद भरने के लिए एक और ओबीसी नेता सामने आए—एआइसीसी के अनुभवी नेता बी.के. हरिप्रसाद, जो राज्य विधान परिषद के सदस्य हैं. राज्यसभा सीट का प्रस्ताव ठुकराकर एमएलए ही बने रहने का चुनाव करने वाले सिद्धरामैया को कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल किया गया है.
टीम नई, अंदाज वही
उनकी छाप एक और तरीके से भी दिखती है. टीम डीकेएस की पहली सूची काफी हद तक निवर्तमान मंत्रिमंडल की ही तरह है लेकिन इसमें एक खास नाम सिद्धरामैया के बेटे डॉ. यतींद्र सिद्धरामैया का है, जो पहली बार मंत्री बने हैं. बाकी सदस्यों में अनुभवी और नई पीढ़ी का मिला-जुला रूप दिखता है जिनमें तीन-तीन वोक्कलिगा, लिंगायत और दलित, दो कुरुबा, और एक-एक एसटी, ईसाई और मुस्लिम को जगह दी गई है.
डीकेएस ने काम शुरू करने में जरा भी देर नहीं लगाई. शपथ के बाद उन्होंने पहली कैबिनेट बैठक बुलाई. एजेंडा लोकलुभावन और व्यावहारिक नीतियों का मिला-जुला स्वरूप था—निजी क्षेत्र की नौकरियों के लिए रोजगार केंद्र; बेंगलूरू की सड़कों की मरम्मत के लिए 2,000 करोड़ रुपए; भवन नियमों के उल्लंघन के लिए एक बार की माफी; पीजी तक के छात्रों को मुफ्त बस पास; और संपत्ति नियमित करने के लिए विस्तृत 'भू-गारंटी' अभियान.
पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में डीकेएस ने कहा, ''बड़ा बदलाव आ रहा है, लोग काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं—42 फीसद लोग अब शहरों में रहते हैं.'' उनकी योजनाएं 2023 की कांग्रेस की पांच बड़ी गारंटियों से आगे बढ़कर एक नया रास्ता बनाने की कोशिश करती लगती हैं. लेकिन तीन वर्षों में कुल 1.21 लाख करोड़ रुपए के खर्च की वजह से राजकोषीय मोर्चे पर अब ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है. डीकेएस कहते हैं, ''हम इसको करेंगे, चाहे कितने भी करोड़ रुपए खर्च क्यों न हों.''