भ्रष्ट ठेकेदार के लपेटे में आए IAS अफसर
बिहार में एक बड़े ठेकेदार की गिरफ्तारी और उसके परिसरों से करोड़ों रुपए की संपत्ति जब्त होने के बाद दो वरिष्ठ आइएएस अधिकारियों के निलंबन से उजागर हुआ भ्रष्टाचार का बड़ा नेटवर्क.

बिहार की विशेष निगरानी इकाई (एसवीयू) के अफसर 27 मई को पटना में ठेकेदार रिशु रंजन सिन्हा उर्फ रिशु श्री से जुड़े एक आवास पर पहुंचे. तलाशी खत्म होते-होते जांचकर्ता लगभग दो करोड़ रुपए के गहने और 2.5 लाख रुपए नकद बरामद कर चुके थे.
अगले दिन ठेकेदार को विजिलेंस कोर्ट के सामने पेश किया गया और 14 दिन की न्यायिक हिरासत में बेऊर सेंट्रल जेल भेज दिया गया. वैसे तो एक ठेकेदार की गिरफ्तारी बिहार के भ्रष्टाचार के मामलों में एक छोटी-सी खबर बनकर रह जाती लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ.
अड़तालीस घंटों के भीतर बिहार सरकार ने अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन और अपील) नियम, 1969 के तहत दो सेवारत आइएएस अधिकारियों, 2014 के बैच की अभिलाषा कुमारी शर्मा और 2017 बैच के योगेश कुमार सागर को निलंबित कर दिया. अचानक जो मामला टेंडर में हेरफेर के आरोपों से शुरू हुआ था, वह अब महज एक ठेकेदार तक सीमित न रहा बल्कि यह राज्य की नौकरशाही के ऊपरी पायदानों तक पहुंच गया.
जांचकर्ताओं के मुताबिक, एक आइएएस अफसर और उसके पारिवार के सदस्यों ने कथित तौर पर ऐसे फायदे हासिल किए जिनका खर्च रिशु श्री ने उठाया. जांचकर्ताओं का दावा है कि सागर और उनके आठ रिश्तेदार जून 2024 में ऑस्ट्रिया यात्रा पर गए, जहां वे विएना, साल्जबर्ग और वोल्फगैंग के आलीशान होटलों में ठहरे. हवाई यात्रा और ठहरने का कुल खर्च करीब 21 लाख रुपए आंका गया. जांचकर्ताओं का आरोप है कि इतनी बड़ी रकम के खर्च को इसी ठेकेदार ने उठाया था.
दूसरे आइएएस अफसर से जुड़े आरोप भी इतने ही चौंकाने वाले हैं. जांचकर्ताओं का दावा है कि रिशु ने अधिकारी के आवास पर लगभग नौ लाख रुपए की लागत से शानदार रूफटॉप गार्डन की साजसज्जा करवाई.
मामले के दस्तावेजों में महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, आइफोन और गोवा, दिल्ली तथा हैदराबाद जैसी जगहों तक रिश्तेदारों की यात्राओं का इंतजाम करने का भी जिक्र है. जांचकर्ताओं का मानना है कि टेंडर में कथित हेरफेर के नेटवर्क से जुड़े कई ठेके इन्हीं अधिकारियों से जुड़े संस्थानों के जरिए पारित हुए थे.
इन अफसरों को विभागीय और कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए आरोपों का प्रतिवाद करने और अपना बचाव करने का हक है. फिर भी राज्य सरकार ने आरोपों को इतना गंभीर माना कि आगे की जांच लंबित रहने तक दोनों को निलंबित कर दिया. जांचकर्ताओं के अनुसार मामले की अहमियत महज गिरफ्तारी या निलंबन में नहीं बल्कि सरकारी ठेकों, अफसरशाही के प्रभाव, लग्जरी सुविधाओं और जनता के धन से जुड़े कथित नेटवर्क में है, जिसे उन्होंने उजागर किया है.
जांच के केंद्र में ठेकेदार
अमूमन, ठेकेदार विरले ही भ्रष्टाचार की बड़ी कहानियों के मुख्य पात्र बनते हैं. वे आम तौर पर टेंडर जारी होने से लेकर परियोजना के पूरे होने के बीच कहीं सरकार की छाया में काम करते हैं. फिर भी रिशु श्री का नाम बिहार में सबसे ज्यादा जांच से घिरे ठेकेदार के तौर पर उभरा.
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के मुताबिक, उससे जुड़ी फर्मों ने बहुत-से सरकारी विभागों में ठेकेदार या उपठेकेदार के रूप में काम किया.
इनमें जल संसाधन, स्वास्थ्य, जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी, शहरी विकास, शिक्षा, भवन निर्माण, ग्रामीण कार्य और बिहार शहरी बुनियादी ढांचा विकास निगम (बीयूआइडीसीओ) शामिल हैं. जांचकर्ताओं को शक हुआ कि यह सब कुछ केवल मेहनत से नहीं बल्कि सरकारी अफसरों से साठगांठ और सेटिंग करके आगे बढ़ाया जा रहा है.
इंडिया टुडे से बातचीत के दौरान विशेष निगरानी इकाई के अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) पंकज कुमार दराद कहते हैं, ''एजेंसी को खुफिया जानकारी मिली थी कि रिशु श्री जांचकर्ताओं की बढ़ती दबिश से बचने और भागने की फिराक में था. उसे गिरफ्तार कर लिया गया है. आरोपों की जांच चल रही है.’’
हालांकि जांचकर्ताओं का मानना है कि रिशु श्री पारंपरिक ठेकेदार से कहीं ज्यादा था. उन्हें शक है कि उसने विभिन्न विभागों में रिश्ते गांठ लिए थे, फैसले लेने वालों तक सीधी पहुंच बना ली थी और उस तंत्र में खुद को शामिल कर लिया था जहां से टेंडर, ठेके, बिल और मंजूरियां आगे बढ़ती थीं.
लेनदेन का सिलसिला
अभी हुई गिरफ्तारियां उस जांच का नतीजा हैं जो बीते एक साल से भी ज्यादा वक्त से चुपचाप रफ्तार पकड़ती रही. मामला दरअसल उस वक्त शुरू हुआ जब अप्रैल 2025 में विशेष निगरानी इकाई ने रिशु श्री के खिलाफ मामला दर्ज किया. उसके आधार पर ईडी ने धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मनी लॉड्रिंग की जांच शुरू की. इसके बाद तलाशी, जब्ती और वित्तीय जांच का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जिसने धीरे-धीरे पूरी जांच के दायरे को बढ़ा दिया.
ईडी ने मार्च 2025 में इंजीनियरों और सरकारी अधिकारियों के घरों की तलाशियां लीं, जिनमें करीब 11.64 करोड़ रुपए की नकदी पकड़ी गई. जांचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि यह धन सरकारी ठेकों और बिलों की मंजूरियों के बदले मिली रिश्वत थी.
इसके बाद एजेंसी ने बिहार और दूसरे राज्यों में तलाशी शुरू की. अगस्त 2025 तक ईडी ने रिशु श्री, उसके परिजनों और संबंधित संस्थाओं की 68.09 करोड़ रुपए की संपत्ति अस्थायी रूप से कुर्क कर ली. यह कुर्की इस बात का तगड़ा संकेत थी कि इस कथित नेटवर्क के जरिए अपराध की काफी बड़ी रकम जुटाई गई थी.
जांच का दायरा नवंबर 2025 में उस वक्त और बढ़ गया जब ईडी ने अहमदाबाद, सूरत, गुड़गांव और नई दिल्ली में तलाशी अभियान चलाया. इस कार्रवाई में करीब 33 लाख रुपए नकद, डिजिटल उपकरण, डायरियां और दस्तावेज बरामद हुए, जिन्हें जांचकर्ताओं ने लिप्तता जाहिर करने वाला बताया. तब तक जांच बिहार की प्रशासनिक सीमाओं से बाहर फैल चुकी थी.
यह मामला इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि इसमें से बहुत सारी सामग्री हाल ही की गिरफ्तारियों और निलंबनों से महीनों पहले पकड़ी जा चुकी थी. फिर भी मामला मोटे तौर पर महज जांच के स्तर पर ही बना रहा. बाद के महीनों में जो बदला, वह महज सबूत जमा होने की वजह से ही नहीं था बल्कि प्रशासनिक प्रतिक्रिया थी.
यह इरादा सम्राट चौधरी की सरकार के मातहत संभव हो सका. दो सेवारत आइएएस अधिकारियों का निलंबन बताता है कि पहली बार दो बड़े अफसरों पर जांच की गाज गिरी. इससे यह भी संकेत मिला कि सरकार प्रशासनिक व्यवस्था के ऊपरी पायदानों पर बैठे अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने को तैयार है.
उस राज्य में जहां भ्रष्टाचार की जांच बड़े अफसरों पर आंच आने दिए बिना सालों घिसटती रहती है, इस फैसले की अहमियत दो संबंधित व्यन्न्तियों की तकदीर से कहीं ज्यादा है. इस पूरी कार्रवा का संदेश आरोपियों के साथ-साथ नौकरशाही को भी है कि सत्ता से नजदीकी अब जांच से बचने की गारंटी नहीं हो सकती.
व्यवस्था कैसे करती थी काम
सबसे बड़ा आरोप यह है कि पसंदीदा बोली लगाने वालों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में हेरफेर की गई. ईडी और एसवीयू के निष्कर्षों के मुताबिक. टेंडर के दस्तावेजों में कथित तौर पर पात्रता की ऐसी निश्चित शर्तें रखी जाती थीं जिनसे साधारण प्रतिस्पर्धी बाहर हो जाएं और चुनिंदा फर्मों को फायदा मिले.
जांचकर्ताओं को शक है कि कमिशन का ऐसा ढांचा बन गया था जिसमें ठेकेदार परियोजना के मूल्य की आठ से 10 फीसद रकम बिल पास करने और मंजूरी देने के बदले 'स्पीड मनी’ के रूप में चुकाते थे.
आरोप केवल टेंडरिंग तक सीमित नहीं हैं. जांच से जुड़े अफसर मानते हैं कि यह नेटवर्क तबादलों, तैनातियों और प्रशासनिक फैसलों को भी इस तरह प्रभावित करता था जिससे ठेके हासिल करने और परियोजनाओं पर अमल के लिए अनुकूल हालात बन सकें.
तो अब आगे क्या?
बहरहाल देखना यह है कि आरोप न्यायिक जांच की कसौटी पर खरे उतर पाते हैं या नहीं. लेकिन इन्होंने जांच की दिशा तो तय कर ही दी है. दो आइएएस अफसरों का निलंबन हाल के वर्षों में बिहार की सबसे बड़ी टेंडर जांच का आखिरी अध्याय नहीं हो सकता.
शीर्ष सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि सरकार ने ईडी के साझा किए गए सबूतों पर आगे बढ़ने के तरीकों को लेकर कानूनी राय मांगी है. यह परामर्श इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब इस बात का पता लगाया जा रहा है कि जांच को अधिकारियों और ठेकेदारों से आगे बढ़ाकर सार्वजनिक खरीद के पूरे ढांचे तक क्यों न बढ़ाया जाए.
जांच से परिचित अधिकारियों का संकेत है कि सतर्कता जांच का दायरा काफी बढ़ सकता है. हालांकि मौजूदा ध्यान कथित ठेकेदार-नौकरशाह गठजोड़ पर बना हुआ है. लेकिन जांचकर्ता यह भी देख सकते हैं कि कहीं विशिष्ट टेंडर पहले से चुने गए लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए तो तैयार नहीं किए गए थे.
शुरुआती परिणामों से पता चलता है कि ठेकेदार ने महत्वपूर्ण टेंडर जानकारी तक पहुंच बनाने के लिए सरकारी विभागों के भीतर अपने संपर्कों का लाभ उठाया और टेंडर की शर्तों को इस तरह से तैयार किया गया जिससे प्रतिस्पर्धा प्रभावी रूप से कम हो गई. इससे यह पक्का हो सका कि जब बोली लगाई जाए तो पसंदीदा बोली लगाने वाला ही तकनीकी रूप से योग्य बनकर उभरे. इसके बदले में, ठेकेदार पर आठ से 10 फीसद तक कमिशन कमाने का आरोप है.
ऐसे में जांच का अगला चरण बड़े सवालों के सिलसिले के इर्द-गिर्द घूम सकता है. कथित तौर पर किन विशिष्ट टेंडरों में हेरफेर किया गया था? क्या विशेष निविदाकर्ताओं को लाभ पहुंचाने के लिए पात्रता शर्तों और तकनीकी नुक्तों में बदलाव किया गया था? क्या प्रतिस्पर्धी फर्मों ने आपत्तियां जताईं या खुद को इस प्रक्रिया से बाहर पाया?
जांच के दायरे में आए अनुबंधों के जरिए जनता का कितना पैसा बहा? क्या बढ़ी हुई परियोजना लागत कथित रिश्वत के ढांचे से जुड़ी थी? और सबसे महत्वपूर्ण यह कि कथित तबादला और तैनाती का नेटवर्क कितना व्यापक था? इसके बारे में जांचकर्ताओं का मानना है कि तबादले ने ठेके के आवंटन और परियोजना के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाने में मदद की होगी.
इन सवालों के जवाब यह तय करेंगे कि मामला एक रसूखदार ठेकेदार पर केंद्रित भ्रष्टाचार की जांच तक बना रहता है या फिर यह इस बात की व्यापक समीक्षा में बदल जाता है कि बिहार में सार्वजनिक अनुबंध या ठेके कैसे दिए जाते हैं, कैसे उनका प्रबंधन होता है और कैसे निगरानी की जाती है.