शुरू हुआ राज का काज
शुभेंदु ने सख्त कदमों के साथ तेज शुरुआत की. ऐलान हुआ कि कानून का राज लौट आया है, उल्लंघन करने वाले बख्शे नहीं जाएंगे

पश्चिम बंगाल में राजकाज के दौरान ऐसी पहल करने में शुभेंदु अधिकारी को ज्यादा देर नहीं लगी जो कि दिखाई भी दे और सुनाई भी. वे कह रहे हैं कि 'शासक के कानून' का दौर खत्म हुआ और 'कानून का शासन' लौट आया है. अहम यह कि शासन लोहे के दस्ताने पहनकर लौटा है. दंगों से लेकर चुनाव-बाद हिंसा, सड़कों पर इकट्ठा होने पर लगी पाबंदियों, लाउडस्पीकरों और साथ ही अवैध बूचड़खानों समेत तमाम ज्वलंत मुद्दों पर मुख्यमंत्री ने भाषण दिए, कठोर और अधिकारपूर्ण ढंग से दिए और कार्रवाई शुरू हो गई.
सबसे पैनी अभिव्यक्ति 18 मई को कोलकाता के पार्क सर्कस-तिलजला इलाके में हिंसा फूटने के बाद देखने को मिली. अधिकारी के शासन ने पहला कदम गहरा असर छोड़ने के इरादे से उठाया. अवैध इमारतों को निशाना बनाते हुए बुलडोजर चला दिया गया. यह वही भाषा है जो उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ के राजकाज की पहचान रही है.
अनधिकृत इमारतों से पटे पड़े शहर में ऐसी कार्रवाई किसी-किसी पर ही होनी थी. देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन होने लगे. कथित पथराव में छह पुलिसकर्मी और सीआरपीएफ के दो जवान घायल हुए. कम से कम 40 प्रदर्शनकारी गिरफ्तार कर लिए गए.
घायल पुलिसवालों को देखकर लौटने के बाद शुभेंदु ने ऐलान किया कि पुलिस अब और 'बंधे हुए हाथ-पैरों' के साथ काम नहीं करेगी. उन्होंने कहा, ''इस किस्म की अशांति, गुंडागर्दी और राष्ट्र तथा समाज विरोधी गतिविधियों को कतई बरदाश्त नहीं किया जाएगा.'' साफ है कि उनकी इस फेहरिस्त में तमाम किस्म की गलत गतिविधियां शामिल थीं. उन्होंने आगे कहा, ''इसे आखिरी चेतावनी समझें. अगर ऐसी घटनाएं दोहराई गईं तो मुझसे बुरा गृह मंत्री कोई नहीं होगा.'' उन्होंने बंगाल को भारत का छोटा रूप माना, और कहा, ''श्रीनगर और कश्मीर में पुलिस पर पत्थरबाजी बंद हो गई. यह पश्चिम बंगाल और कोलकाता में भी बंद हो जाएगी.''
इस कथनी और करनी दोनों का एक जाना-पहचाना पैटर्न है. भाजपा सरकार ने 1950 के पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम को सख्ती से लागू करने का ऐलान किया. साथ ही उसने घोषणा की कि धार्मिक जमावड़ों को अब और सड़कें रोकने की इजाजात नहीं दी जाएगी और लाउडस्पीकर पर पूजा-नमाज के सख्त नियम लागू किए जाएंगे.
बताया जाता है कि शुरुआती बैठकों में से एक में सीएम ने यह कहा ''हर व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता होगी'', लेकिन ''सड़कें रोककर पूजा-उपासना की मंजूरी नहीं दी जाएगी.'' विवाद खड़ा हुआ तो सरकार ने सफाई दी कि यह कानून सभी पर लागू होता है. कैबिनेट मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा, ''केवल मुस्लिम नहीं. हिंदुओं को भी मंदिरों में माइक्रोफोन की इजाजत नहीं दी जाएगी.''
दबंगों को चेतावनी
अहम पुनर्मतदान से पहले फाल्टा की एक रैली में शुभेंदु ने तृणमूल के विवादित स्थानीय नेता जहांगीर खान को निशाना बनाया. उन्होंने खान को 'कुख्यात अपराधी' बताते हुए कहा कि वह अब 'मेरी जिम्मेदारी' है. इसे चेतावनी समझा गया कि राजनैतिक रूप से जुड़े दबंग नेताओं को सीधी कार्रवाई का सामना पड़ सकता है. दरअसल, तृणमूल के बहुत-से नेताओं पर पुलिस के छापे पड़ने लगे हैं और वे गिरफ्तार किए जाने लगे हैं.
दो अहम आयोग बनाए गए हैं. एक कथित सांस्थानिक भ्रष्टाचार और खासकर अम्फान राहत, मनरेगा, मिड-डे मील और आवास परियोजनाओं में भ्रष्टाचार की जांच के लिए बनाया गया है, तो दूसरा महिलाओं और बालिकाओं के खिलाफ हुए अत्याचारों की जांच करेगा. गौर करने वाली बात यह है कि आर.जी. कर बलात्कार-हत्या मामला फिर खोला गया है. राज्य उस मुख्य मामले में नहीं पड़ेगा जिसकी जांच सीबीआइ कर रही है, लेकिन उसने तीन आइपीएस अधिकारियों को निलंबित कर दिया और जांचकर्ता के तौर पर उनकी भूमिकाओं की जांच शुरू कर दी.
उधर भाजपा की जीत के बाद तृणमूल बदले की भावना से बड़े पैमाने पर हमले किए जाने का आरोप लगा रही है. उसने 3,000 घटनाएं गिनवाईं, जिनमें पूर्व ओलंपियन स्वप्ना बर्मन के घर पर आगजनी और 10 हत्याएं शामिल हैं. शुभेंदु ने विधानसभा में इसे सिरे से खारिज कर दिया लेकिन यह भी कहा, ''अगर किसी को जबरन घर से निकाला जाता है, तो उसकी सूची डीजीपी को दीजिए.'' उनके पास कई सारे विकल्प हैं जिनसे वे तय कर सकते हैं कि उनके राजकाज के लोकाचार को व्यापक रूप से कैसे देखा जाएगा.