सियासी संतुलन के साथ बना सतरंगी मंत्रालय
करल के CM सतीशन ने नई सरकार बनने के बाद शुरुआत में ही अपने को झमेले में फंसा हुआ पाया. लेकिन दबावों को दरकिनार करते हुए उन्होंने आइयूएमएल से पांच मंत्री बनाकर टीम यूडीएफ के साथ साझेदारी को मजबूती दी

अगर आपको वडास्सेरी दामोदरमेनन सतीशन नाम थोड़ा लंबा और भारी लगता है, तो इसी बात को दुबई के चार रेस्तरांओं ने भी मजाकिया अंदाज में भुनाया. उन्होंने ऐलान किया कि जिस मलयाली प्रवासी का नाम 'सतीशन' होगा, उसे मुफ्त भोजन दिया जाएगा.
केरल के नए मुख्यमंत्री के सत्ता में आने का जश्न समाज के संघर्षपूर्ण तबकों में भी देखने को मिला. 2025 में आशा कार्यकर्ताओं ने पिनाराई विजयन सरकार के खिलाफ राज्य सचिवालय के बाहर 265 दिनों तक धरना दिया था.
नई सरकार के पहले ही दिन उनकी वेतन-वृद्धि की मांग मान ली गई. यही राहत आंगनवाड़ी कर्मियों को भी मिली. मगर कल्याणकारी घोषणाओं के साथ तेज शुरुआत करने वाले नए मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सतीशन को जल्द ही यह एहसास हो सकता है कि असल में सियासत में कोई भी चीज 'मुफ्त' नहीं मिलती.
राज्य की वित्तीय चुनौतियां तो बाद की बात हैं. फिलहाल, सतीशन को अपनी छवि से जुड़ी धारणाओं से जूझना है. सतीशन वर्तमान भारतीय राजनीति में शायद उन विरले नेताओं में हैं, जो बेझिझक धर्मनिरपेक्ष राजनीति के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं. न केवल बयानों में, बल्कि व्यवहार में भी. फिर भी शुरुआत से ही वे सियासी रूप से घिरे नजर आते हैं.
जब उन्होंने कांटे की टक्कर में के.सी. वेणुगोपाल को पीछे छोड़ा, तभी से यह चर्चा चल पड़ी कि सतीशन की जीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के घटक दल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आइयूएमएल) की ताकत का नतीजा है.
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसकी शुरुआत की और राष्ट्रीय मीडिया ने इसे हवा दी. यहां तक कि इस धारणा को कभी-कभी वामपंथी विरोधियों ने भी जनता के मन में बैठाने की कोशिश की कि केरल में कांग्रेस, खासकर सतीशन, एक 'मुस्लिम पार्टी' के प्रभाव में हैं. मगर सतीशन ने इस तरह के दबाव में आने के बजाए आइयूएमएल के साथ अपने संबंधों को छिपाने से साफ इनकार कर दिया. उन्होंने यूडीएफ के भीतर आइयूएमएल को अपना 'सहोदर' बताया. इसके साथ ही उन्होंने अपने कदमों से भी इस बात पर मुहर लगा दी.
नाजुक लोकतंत्र
तिरुवनंतपुरम के सेंट्रल स्टेडियम में 18 मई को आयोजित शपथग्रहण समारोह कांग्रेस के लिए उत्साह से भरा पल था. उसमें सियासी शिष्टाचार की झलक भी नजर आई. तमिलनाडु में विजय की तरह सतीशन ने विपक्षी नेताओं को भी उसमें आमंत्रित किया था. इसलिए पिनाराई विजयन और राज्य भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर भी मौजूद थे. सभी नेताओं ने लोकतंत्र के पक्ष में अपनी बात रखी.
सतीशन के 20 सदस्यीय मंत्रिमंडल में व्यावहारिक संतुलन नजर आया. इसमें सहयोगी दलों की मांग के साथ-साथ कांग्रेस के आंतरिक गुटों को भी साधने की कोशिश की गई. सतीशन के सीनियर और मुख्यमंत्री पद के दूसरे बड़े दावेदार रहे रमेश चेन्नितला आखिरकार नरम पड़े और मान गए.
आइयूएमएल की छाप
मगर सतीशन के आलोचक चुप नहीं रहने वाले. शपथग्रहण समारोह के मंच पर आइयूएमएल के पांच नेता भी मौजूद थे, जिनमें उसके राष्ट्रीय महासचिव पी.के. कुन्हालीकुट्टी भी शामिल थे.
अगर राष्ट्रीय परिदृश्य के साथ इसकी तुलना करें तो यह सियासी नजारा बेहद अलग था. जम्मू-कश्मीर को छोड़ दें तो ज्यादातर राज्यों में मुसलमान मंत्रियों की संख्या बेहद कम है. मगर यहां केरल मंत्रिमंडल का लगभग एक-चौथाई हिस्सा मुस्लिम नेताओं का है. यह 102 सीटों वाले यूडीएफ में आइयूएमएल के 22 विधायकों के अनुपात से भी ज्यादा है.
सतीशन को आइयूएमएल का समर्थन जरूर मिला, मगर उन्हें कांग्रेस कार्यकर्ताओं और यूडीएफ के अन्य सहयोगियों का भी भरोसा हासिल था. राजनैतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक, परवूर के इस 61 वर्षीय मुखर नेता के पक्ष में आम मतदाता भी बड़ी संख्या में आकर्षित हुए. हालांकि, असंतोष के कुछ स्वर भी उभरने लगे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कथित रूप से इस बात से नाराज बताए गए कि 'समावेशी' मंत्रिमंडल में पिछड़ी जातियों और दलितों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है. वहीं चर्च इस बात से नाराज है कि शिक्षा विभाग पर एक बार फिर से आइयूएमएल की पकड़ रहेगी.
फिर भी, जहां भारत में मुस्लिम जुड़ाव को ही अक्सर संदेह के नजरिए से देखा जाता है, वहीं सतीशन की यह सियासी साझेदारी अहम और साहसिक मानी जा रही है. किताबों के शौकीन मुख्यमंत्री—एक तस्वीर में वे यानिस वरूफाकिस की किताब टेक्नोफ्यूडलिज्म पढ़ते नजर आते हैं—सतीशन स्थानीय सामंती ताकतों से भी दूरी बनाए रखने की क्षमता रखते हैं. एक नायर नेता के रूप में उन्होंने नायर सर्विस सोसाइटी और दूसरे जातीय संगठनों को साफ संकेत दे दिया है कि उनकी राजनीति में किसी को 'मुफ्त टिकट' नहीं मिलता.