एक दुर्लभ मूर्ति की घर वापसी

अमेरिका ने भारत से चोरी 7वीं शताब्दी की एक दुर्लभ मूर्ति वापस लौटा दी, मगर जिस संग्रहालय में वह संग्रहित थी, उसके पास उसके स्वामित्व का दस्तावेज ही नहीं है और इसके जिम्मेदार दीमक ठहराए जा रहे

अवलोकितेश्वर की मूर्ति

अवलोकितेश्वर की 7वीं शताब्दी की एक बेमिसाल कांस्य प्रतिमा की कल्पना कीजिए, जिसे सिरपुर में रहने वाले द्रोणादित्य नाम के अद्वितीय शिल्पकार ने बनाया था. सिरपुर आज के छत्तीसगढ़ की राजधानी से बहुत दूर नहीं है, मगर सांस्कृतिक और कलात्मक परंपरा के लिहाज से मानो किसी दूसरी ही दुनिया का हिस्सा है.

बोधिसत्व दो कमल के आकार वाले आसन पर विराजमान हैं और आसन पर द्रोणादित्य का नाम अंकित है. इससे अंदाजा लगता है कि उत्तर-गुप्त काल में पांडुवंशी राजवंश के शासन के दौरान छत्तीसगढ़ कितनी अद्भुत मूर्तिकला का प्रमुख केंद्र था. 

1875 में रायपुर में महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय की स्थापना हुई. यह भारत में इस तरह का ग्यारहवां और निजी सहयोग से स्थापित होने वाला पहला संग्रहालय था. आज इसमें 15,000 से अधिक उत्कृष्ट वस्तुएं हैं. उनमें एक अवलोकितेश्वर की मूर्ति भी है. साल 1939 में सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर के पास वह कांस्य प्रतिमाओं के एक भंडार में मिली थी.

तकरीबन 13 साल बाद यह महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय पहुंची और वहां यह लगभग तीन दशकों तक सुरक्षित रही. मगर साल 1982 में संग्रहालय से चोरी हो गई. उसके बाद करीब 30 वर्षों तक वह अमेरिका से जुड़े प्राचीन वस्तुओं की तस्करी के काले धंधे वाले नेटवर्क में भटकती रही. 

अगला मोड़ अप्रैल 2026 में आया. मैनहैटन डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी की एक जांच में उस मूर्ति का पता चला. यह मूर्ति उन 657 प्राचीन वस्तुओं में शामिल थी, जिन्हें अमेरिका ने भारत को वापस लौटाया. इन वस्तुओं की कुल कीमत लगभग 134 करोड़ रुपए बताई गई. केवल यह मूर्ति करीब 19 करोड़ रुपए की है.

अप्रत्याशित अड़चन
तो क्या अंत भला तो सब भला? लगता तो नहीं. दरअसल, संग्रहालय के अधिग्रहण रजिस्टर को दीमकों ने नष्ट कर दिया है. ऐसे में संग्रहालय प्रबंधन अब उसकी जगह कोई वैकल्पिक दस्तावेज खोजने में जुटा है. यह रजिस्टर किसी भी संग्रहालय का सबसे अहम दस्तावेज होता है. उसमें प्राचीन वस्तुओं की पहचान, उनका मूल स्रोत, काल, आकार और सामान्य स्थिति सरीखी जानकारियां दर्ज रहती हैं.

हर साल संग्रहित वस्तुओं का भौतिक सत्यापन भी किया जाता है और उसका विवरण भी अमूमन वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन उसी रजिस्टर में दर्ज किया जाता है. अगर कानूनी नजरिये से देखें तो संग्रहालय अवलोकितेश्वर सरीखी वस्तुओं पर अपने अधिकार का कोई प्रमाण पेश नहीं कर सकता. अगर कोई और वस्तु भी चोरी हो जाती है, तो शायद किसी को पता तक न चले.

महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय

आखिर अधिग्रहण रजिस्टर क्या हुआ? दरअसल, 6 मई को संग्रहालय के प्रभारी क्यूरेटर डॉ. जे.आर. भगत ने राज्य के पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशक को पत्र लिखकर बताया कि वे हर साल संग्रहित वस्तुओं का भौतिक सत्यापन करते रहे हैं और प्राचीन दुर्लभ वस्तुओं को डबल लॉक सिस्टम के साथ एक कमरे में सुरक्षित रखा जाता है. अधिग्रहण रजिस्टर भी उसी कमरे में रखा जाता है.

उन्होंने लिखा कि साल 2023 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के आगमन के दौरान उस कमरे को खोला गया था. उस दिन तक रजिस्टर सुरक्षित था. मगर, अपनी आगामी सेवानिवृत्ति से पहले अपना कार्यभार सौंपने की तौयारी में जब उन्होंने 6 मई को उस कमरे को खोला तो उन्होंने पाया कि क्रमांक 2 से 6 तक के अधिग्रहण रजिस्टर को दीमकों ने नष्ट कर दिया है.

वहीं, क्रमांक 1 सुरक्षित बचा दिखा. भगत ने सुझाव दिया कि उन रजिस्टरों की कुछ प्रतियां संभवत: राज्य के विभाजन से पहले भोपाल में रखी गई हों और उनसे नई प्रतियां तैयार की जा सकती हैं. यह साफ नहीं है कि मध्य प्रदेश सरकार ने छत्तीसगढ़ के अनुरोध पर कोई जवाब दिया है या नहीं, या फिर अनुरोध भी भेजा गया है या नहीं.

यह भी स्पष्ट नहीं है कि संग्रहालय में वस्तुओं का भौतिक सत्यापन हर साल हो रहा था या नहीं. दीमकों को किसी चीज को नष्ट करने में आमतौर पर काफी समय लगता है. मगर, फिलहाल तो ऐसा लगता है कि उन्होंने भारत की स्मृति को ही चट कर डाला है.

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