नेताओं को बताने लगे औकात

मध्य प्रदेश में नेताओं की दादागीरी के खिलाफ वहां के अफसरशाह आखिर क्यों कर रहे हैं अपनी आवाज बुलंद?

टक्कर के एक मामले में तलब हुए BJP विधायक प्रीतम लोधी के बेटे दिनेश लोधी

शासक और शासितों को हमेशा एक-दूसरे से कोई न कोई शिकायत रहती आई है. पर बीते कुछ हफ्तों में मध्य प्रदेश में शासकों का ही एक तबका दूसरे के खिलाफ हो गया है. इसे आप 'ताकतवर बनाम स्थायी शासक' कह सकते हैं—यानी वे राजनेता जो अभी सत्ता में हैं और नौकरशाहों का वह खेमा जो हमेशा सत्ता में रहता है.

उनके बीच का नाजुक समझौता जब-तब टूटने के पीछे सिस्टम से जुड़ी कुछ वजहें हैं. कम-से-कम नौकरशाहों के लिए तो इन कारणों को खुलकर बताना अक्सर जोखिम भरा होता है. इसलिए, उनके बीच की नाराजगी अक्सर छोटी-मोटी तकरार के रूप में सामने आती है. मौजूदा 'तकरार' शुरू होने के तरीके से ही आप इसका अंदाज लगा सकते हैं.

इसकी पहली कड़ी दो हफ्ते पहले शिवपुरी में देखने को मिली, जब पिछोर के भाजपा विधायक प्रीतम लोधी करेरा के सब-डिविजनल पुलिस अफसर आयुष जाखड़ को धमकाते नजर आए. उन्होंने कहा कि वे अपने 10,000 समर्थकों को इकट्ठा करके उस आइपीएस अधिकारी का बंगला घेर लेंगे और 'उसमें गोबर भर देंगे'.

लोधी जाखड़ से नाराज थे क्योंकि उन्होंने टक्कर के एक मामले में विधायक के बेटे को थाने तलब किया था. उनका रसूखदार बेटा 'थार' गाड़ी में घूम रहा था जिसकी खिड़कियां काली की गई थीं और उस पर कोई रजिस्ट्रेशन प्लेट भी नहीं थी. बस एक पट्टिका लगी थी जिस पर उसके पिता का नाम स्थानीय विधायक के तौर पर लिखा था और एक सायरन भी लगा था. उस घटना में पांच लोग जख्मी हुए थे. आइपीएस एसोसिएशन ने विधायक की टिप्पणियों की निंदा की. मामला शांत करने के लिए लोधी को मुख्यमंत्री और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने बुलाया और फटकारा.

मंत्री के रिश्तेदार पर मुकदमा

फिर 22 अप्रैल को अलीराजपुर जिले की एक ब्लॉक पंचायत की सीईओ और प्रॉविंशियल सर्विस ऑफिसर प्रिया काग को राज्य मंत्री नागर सिंह चौहान के भाई इंदर सिंह चौहान ने धमकाया. इंदर के खिलाफ एफआइआर दर्ज की गई जब वे सीईओ दफ्तर के बाहर काग पर हमला करने की कोशिश करते दिखे. अधिकारी को पुलिस सुरक्षा तो दी गई मगर उनके पीछे खड़े होने के लिए कोई ताकतवर एसोसिएशन नहीं थी.

27 अप्रैल को जबलपुर नगर निगम में एडिशनल कमिशनर आइएएस अधिकारी अरविंद शाह ने राज्य के पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह पर उन्हें अपमानित करने और गाली-गलौज का आरोप लगाया. मंत्री इसलिए नाराज थे क्योंकि शाह ने एक कर्मचारी को काम में लापरवाही बरतने पर फटकार लगाई थी.

मगर राज्य के पूर्व भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह ने कुछ और ही कहानी बताई. उनका कहना था कि शाह ने उनके बारे में अपमानजनक टिप्पणियां की थीं. शाह को शुरू में आइएएस एसोसिएशन का समर्थन मिला मगर चूंकि इस मामले में एक दिगग्ज राजनेता शामिल थे और शायद कुछ अंदरूनी जांच भी हुई, तो एसोसिएशन ने पीछे हटने का फैसला कर लिया.

मगर सत्ताधारी दल के राजनेता और अधिकारी अपना आपा क्यों खो रहे हैं? इस बारे में एक दिलचस्प राय है, जिसे राज्य के एक मंत्री ने अपनी पहचान न जाहिर करने की शर्त पर कुछ इस तरह बताया: ''मध्य प्रदेश में अभी राजनैतिक शासन का जो मॉडल चल रहा है, उसमें मुख्यमंत्री ही सबसे ताकतवर हैं, जबकि मंत्रियों का कद छोटा कर दिया गया है.

मंत्री जो भी मामले सीएमओ को भेजते हैं, वे हफ्तों तक वहीं पड़े रहते हैं, जिससे मंत्रियों को अधिकारहीन होने का एहसास होता है. नौकरशाही इस मौके का लाभ उठाकर अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रही है.'' मंत्री का कहना है कि जब ये आपसी झगड़े फैसले के लिए मुख्यमंत्री तक पहुंचते हैं, तो इससे उनकी ताकत और बढ़ जाती है. 

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