अब 'खिलाड़ी' जीन की खोज

राज्य में बड़े पैमाने पर डीएनए डेटा जुटाने की मुहिम चलाई जा रही ताकि अलग-अलग तबकों में 'एथलेटिक जीन' की पहचान की जा सके. इसके जरिए ओलंपिक पर नजर है

सिद्दी समुदाय के खिलाड़ी इजमाम मजगुल (बाएं) जूनागढ़ में अपने कोच के साथ

यह एक ऐसा विचार था जो बिजली की तरह कौंधा और करीब 90 साल पहले खेल की दुनिया के मानस-पटल पर नाटकीय ढंग से दर्ज हो गया. दरअसल, 1936 के बर्लिन ओलंपिक में जेसी ओवेंस ने श्वेत नस्लीय श्रेष्ठता की धारणा को ध्वस्त कर दिया.

तब से 'चैंपियन' के डीएनए की खोज जारी है, जिसमें नस्लीय विचारों की छाया भी रही है. भारत ने भी 1980 के दशक में स्पेशल एरिया गेम्स (एसएजी) योजना के जरिए कोशिश की और एक तरह की जातीय प्रतिभा की खोज की.

इसने हमें लिम्बा राम और मैरी कॉम सरीखे खिलाड़ी दिए. कभी एसएजी की प्रयोगशाला रहे गुजरात ने अब 21वीं सदी का अपना नया संस्करण शुरू किया है. वह है पांच साल का स्पोर्ट्स जीनोमिक्स प्रोग्राम (एसजीपी). इसके तहत 10 खेल विधाओं में राज्य के 10,000 खिलाड़ियों के डीएनए की सीक्वेंसिंग की जाएगी, ताकि ऐसे आनुवंशिक संकेतकों की खोज की जा सके जो चैंपियनों को बाकी से अलहदा बनाते हैं.

यह शायद अब तक का भारत का सबसे महत्वाकांक्षी खेल-विज्ञान प्रयोग हो सकता है. गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (जीबीआरसी) की अगुआई में एसजीपी सहनशक्ति और तुरंत जोरदार ताकत लगाने वाले खेलों में राज्य के खिलाड़ियों का संपूर्ण जीनोम सीक्वेंसिंग करेगा. इससे पहले जीबीआरसी देश की पहली जनजातीय जीनोम सीक्वेंसिंग पहल का नेतृत्व कर चुका है.

इससे तैयार होने वाला गुजरात एथलीट जीनोम डेटाबेस (जी-एजीडी) जीनोटाइप, शारीरिक (फिजियोलॉजिकल) और प्रदर्शन से जुड़े आंकड़ों को एकीकृत करेगा, ताकि चोटों के आनुवंशिक जोखिम के कारकों की पहचान की जा सके. साथ ही, लिंग और उम्र से जुड़ी भिन्नताओं को समझा जा सके और रिकवरी के प्रोटोकॉल तैयार किए जा सकें.

तेज, ऊंचे, मजबूत!
गुजरात खेल प्राधिकरण के सहयोग से पांच सहनशक्ति और पांच जोरदार ताकत की दरकार वाले खेलों से खिलाड़ियों का चयन होगा. इसका लक्ष्य अव्वल खिलाड़ियों की मजबूत खेप तैयार करने के लिए एक डेटाबेस तैयार करना है. इसकी प्रेरणा साफ है, ओवेंस के कमाल के एक सदी बाद 2036 ओलंपिक के लिए क्वालिफाइ करने की तमन्ना.

2030 में अहमदाबाद में होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेल इसे आजमाने के लिहाज से अहम हैं. भारत के पास वक्त कम है. इस पहल के लिए 2028 और 2032 में ओलंपिक पदकों की संख्या बढ़ाना जरूरी है. एसपीजी किसी राज्य का ऐसा पहला व्यवस्थित प्रयास है और इसे जैव-इन्फ्रास्ट्रक्चर के रूप में देखा जा रहा.

स्पोर्ट्स जीनोमिक्स एक उभरता क्षेत्र है. यह जीन और एथलेटिक क्षमता, प्रदर्शन तथा प्रशिक्षण को लेकर शरीर की प्रतिक्रिया के बीच संबंध को समझने की कोशिश करता है. अब तक ज्यादातर वैश्विक शोध गैर-भारतीय आबादी पर आधारित रहे हैं. गुजरात की पहल डेटा के स्वदेशीकरण की दिशा में अहम कदम है. जीबीआरसी के डायरेक्टर डॉ. स्नेहल बगाथरिया कहते हैं, ''हम 2026 से हर साल 2,000 सैंपल जुटाने की उम्मीद कर रहे हैं.''

माना जाता है कि एथलेटिक प्रदर्शन में आनुवंशिक कारकों का योगदान औसतन करीब 66 फीसद तक होता है. ऐसे में डीएनए पॉलीमॉर्फिज्म विभिन्न खेलों को लेकर उपयुक्तता का आकलन करने में मददगार हो सकते हैं. इस पहल में व्यक्ति-विशेष प्रशिक्षण, स्वास्थ्य जोखिमों को कम करना और उपयुक्त सामाजिक समूहों में प्रतिभा की पहचान करना शामिल हैं. सालाना 5.21 करोड़ रुपए के बजट वाले एसजीपी के जरिए गुजरात की कोशिश खुद को स्पोर्ट्स बायोटेक हब के रूप में स्थापित करने की भी है.

बीसीसीआइ ने 2017 में भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम में जेनेटिक टेस्टिंग को शामिल किया. उसका उपयोग गति, सहनशक्ति और रिकवरी आदि को बेहतर करने के लिए किया गया. भारत में ये परीक्षण 2011 के आसपास शुरू हुए, उससे पहले भी कई खिलाड़ी व्यक्तिगत स्तर पर ऐसे आकलन कराते थे.

मगर कुछ सवाल भी खड़े होते हैं. आपके डीएनए डेटा का मालिक कौन होगा? क्या जेनेटिक प्रोफाइलिंग कथित रूप से 'कमतर' माने जाने वाले समूहों की प्रतिभाओं को बाहर कर देगी? जमीनी स्तर पर प्रतिभा निखारने की बजाए लैब अहम हो जाएंगे? क्या भविष्य जीन-संपादन की दिशा में बढ़ेगा? 

Read more!