अब कमान संभालने को तैयार

तेलुगुदेशम पार्टी के नए कार्यकारी अध्यक्ष के लिए करने को है कितना कुछ: आंध्र प्रदेश को निवेश का प्रमुख केंद्र बनाना, मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए अपनी दावेदारी मजबूत करना और 2029 के विधानसभा चुनावों तक पूरी तरह उभरकर आना

टीडीपी के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद तिरुपति में पार्टी समर्थकों से मिले लोकेश

- प्रसाद निचेनमेटला

भारत के सबसे चतुर और अनुभवी नेताओं में से एक चंद्रबाबू नायडू 20 अप्रैल को 76 वर्ष के हो गए. 'सनराइज स्टेट' आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर यह उनका चौथा कार्यकाल है.

इसमें अविभाजित आंध्र प्रदेश के मुखिया के तौर पर बिताए उनके दो पिछले कार्यकाल भी शामिल हैं. उनके कामकाज की रफ्तार में किसी तरह की कोई कमी आने का संकेत नहीं दिख रहा पर ऐसा लगता है कि उन्होंने पार्टी में—और शायद सरकार में भी—सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

अपने जन्मदिन से पांच दिन पहले नायडू ने इकलौते बेटे और तेलुगुदेशम पार्टी (टीडीपी) के राष्ट्रीय महासचिव नारा लोकेश की जिम्मेदारी बढ़ाकर उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष का पद सौंप दिया. उनके इस कदम को यह घोषित करने के तौर पर देखा जा रहा है कि पार्टी में उनके निर्विवाद उत्तराधिकारी लोकेश ही हैं.

हालांकि, औपचारिक घोषणा अभी हुई है लेकिन स्टैनफोर्ड से बिजनेस ग्रेजुएट 43 वर्षीय लोकेश पिछले दो साल से पार्टी मामलों में असल प्रमुख बने हुए हैं, और एक प्रमुख मंत्री के नाते काफी हद तक आंध्र प्रदेश प्रशासन में भी दखल रखते रहे हैं. यानी कि तभी से जब 2024 के विधानसभा चुनाव में नायडू की अगुआई वाले एनडीए गठबंधन ने एक और क्षेत्रीय दिग्गज वाइएसआर कांग्रेस पार्टी (वाइएसआरसीपी) नेता जगन मोहन रेड्डी से सत्ता छीन ली थी.

आंध्र प्रदेश की 175 सीटों वाली विधानसभा में टीडीपी के पास 135 विधायक हैं—इसके सहयोगी दलों जनसेना (जेएसपी) और भाजपा के विधायकों को छोड़कर—और इस तरह वह राज्य में एक मजबूत स्थिति में है. नई दिल्ली में भी पार्टी को एक अहम जगह हासिल है; इसके 16 लोकसभा सांसद केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के लिए समर्थन का एक महत्वपूर्ण आधार हैं.

लोकेश के लिए एक और उपमुख्यमंत्री पद बनाने की मांग—जेएसपी प्रमुख पवन कल्याण पहले से इस पद पर काबिज हैं—पिछले साल की शुरुआत से ही जोर पकड़ रही थी और ऐसा लगता है कि यह एक सोची-समझी मुहिम का हिस्सा है. हाल के दिनों में लोकेश का नई दिल्ली आना-जाना और भाजपा नेताओं तथा मंत्रियों के साथ उनकी मेल-मुलाकातें बढ़ी हैं. यही नहीं, मोदी तो उन्हें प्यार से 'भाई लोकेश' कहकर बुलाते हैं. मई 2025 में प्रधानमंत्री ने अपने आवास 7, लोक कल्याण मार्ग पर लोकेश, उनकी पत्नी ब्राह्मणी और बेटे देवांश के लिए रात्रिभोज का आयोजन किया था.

तब से इन दोनों नेताओं के बीच कई मुलाकातें हो चुकी हैं. सबसे ताजा मुलाकात अप्रैल के शुरू में हुई थी, जब लोकेश ने प्रधानमंत्री से मिलकर वह विधेयक पारित कराने के लिए उनका आभार व्यक्त किया था, जिसके तहत अमरावती को प्रदेश की एकमात्र और स्थायी राजधानी घोषित किया गया है.

घरेलू मोर्चे पर कोई भी प्रमुख नियुक्ति, नौकरशाहों की ट्रांसफर-पोस्टिंग या बड़े व्यापारिक सौदे संभावित वारिस की भागीदारी या सहमति के बिना नहीं होते. इसलिए इसमें हैरान होने जैसा कुछ नहीं है कि राजनेताओं से लेकर नौकरशाह, उद्योगपति और सेलेब्रिटीज तक हर कोई लोकेश की नजरों में बने रहना चाहते हैं.

आलोचनाओं से उबरे
महज तीन साल पहले लोकेश की स्थिति एकदम अलग थी. टीडीपी पूरी तरह बैकफुट पर थी, और जगन की वाइएसआरसीपी सत्ता में फिर वापसी को बेताब नजर आ रही थी. पार्टी नेता अब लोकेश में आए जबरदस्त बदलाव—राजनैतिक परिपक्वता और शारीरिक फिटनेस के मामले में भी—को देखकर हैरान रह जाते हैं.

चलने-फिरने के अजीब अंदाज, अटपटे ढंग से भाषण, मोटापे को लेकर उपहास, और 2019 के चुनाव में मंगलागिरि से अपनी पहली हार के बाद 'पप्पू' कहकर ताना मारा जाना अब बीती बात बन चुका है. नायडू के बेटे को अब एक प्रभावशाली, बेहतरीन वक्ता और फिटनेस को लेकर बेहद सतर्क नेता माना जाता है; वे सफेद-काली दाढ़ी वाले लुक में खासे आकर्षक दिखते हैं.

पहले खान-पान के शौकीन रहे लोकेश ने 2019 की हार के बाद से करीब 30 किलो वजन घटाया है. उन्होंने यह सब सोच-समझकर किया ताकि एक सकारात्मक राजनैतिक छवि बना सकें. उनके साथ काम करने वाले एक रणनीतिकार ने पार्टी दफ्तर में होने वाली बातें याद करते हुए बताया, ''जब हम लंच ब्रेक के दौरान पिज्जा का मजा ले रहे होते थे, तब लोकेश उबली सब्जियां खा रहे होते थे.

डाइट को लेकर इस सख्त अनुशासन ने कमाल कर दिया. उनका वजन तो घटा ही, वे एक बड़े राजनेता के तौर पर भी उभरे.'' पिछले साल इंडिया टुडे के साथ बातचीत के दौरान लोकेश ने इसका पूरा श्रेय अपनी पत्नी ब्राह्मणी को दिया था, जो पिछले कुछ वर्षों से उनके खान-पान पर पैनी नजर रख रही हैं.

राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि 2023 में साल भर लंबी 'युवा गालम' पदयात्रा के बाद लोकेश एक स्वतंत्र नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाने में सफल रहे. परिवार के गढ़ कुप्पम से लेकर राज्य के उत्तरी छोर पर स्थित इचापुरम तक, पूरे राज्य की पैदल यात्रा के दौरान उन्होंने कुल 3,132 किलोमीटर की दूरी तय की. यात्रा में शामिल रहे टीडीपी के एक पदाधिकारी बताते हैं, ''जब यात्रा शुरू हुई तब उन्हें एक घमंडी और शहर में पले-बढ़े लड़के की तरह देखा जाता था. लेकिन यात्रा पूरी होते-होते स्थानीय लोगों के साथ-साथ हजारों लोगों से मिलने और बातें करने के बाद, उनका रवैया काफी उदार और संवेदनशील नजर आने लगा.''

अगला चरण
कई बड़े मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल रहे लोकेश 2024 से ही पूरी तरह व्यस्त रहे हैं. आइटी और इलेक्ट्रॉनिक्स-संचार मंत्री के तौर पर उन्होंने विशाखापत्तनम को एक अहम आइटी हब बना दिया है, जो अब बेंगलूरू और हैदराबाद जैसे शहरों को टक्कर दे रहा है. गूगल के 1.5 अरब डॉलर (1.41 लाख करोड़ रु.) के एआइ हब जैसी बड़ी उपलब्धि के अलावा इन्फोसिस, टीसीएस और कॉग्निजेंट जैसी कंपनियां भी यहां पैर जमा चुकी हैं; इन सबने 2025 में लागू लिफ्ट (टेक हब के लिए जमीन मुहैया कराने) नीति का फायदा उठाया.

दुनियाभर में मशहूर टेक कंपनियों को आकर्षित करने के लिए दिए प्रोत्साहनों में से एक विवादास्पद प्रस्ताव यह भी है कि उन्हें जमीन महज 99 पैसे प्रति एकड़ की दर से दी जाएगी. संयोग से 2025-26 में भारत आए कुल निवेश प्रस्तावों में से एक-चौथाई हिस्सा इसी राज्य को मिला है.

लोकेश शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण जैसे क्षेत्रों में राज्य सरकार के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए भी तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. पिछले साल शुरू की गई व्हाट्सऐप-आधारित डिजिटल शासन पहल 'माना-मित्र' के जरिए नागरिकों को लगभग 200 तरह की सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं.

टीडीपी के मंत्री लोकेश, मुख्यमंत्री नायडू के पसंदीदा प्रोजेक्ट—आरटीजी (रियल-टाइम गवर्नेंस) पहल—की भी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. आरटीजी में डेटा, सैटेलाइट तस्वीरों और एआइ की मदद से किसी भी स्थिति की रियल-टाइम निगरानी और उस पर फौरन कार्रवाई की जाती है. यह पहल कई क्षेत्रों (नागरिकों को सेवाएं मुहैया कराने से लेकर जानकारी के प्रसार, कृषि संबंधी सलाह और मौसम की गंभीर चेतावनियों तक) में गेम-चेंजर साबित हुई है. टीडीपी सरकार इस पहल की सफलता से इतनी ज्यादा उत्साहित है कि अब राज्य में आने वाले वीआइपी मेहमानों के लिए राजधानी अमरावती में बने अत्याधुनिक आरटीजी केंद्र का दौरा एक अनिवार्य परंपरा की तरह हो गया है.

लोकेश के नेतृत्व में टीडीपी ने पार्टी कार्यकर्ताओं और उनके परिवार के सदस्यों के लिए भी अपने कल्याणकारी ढांचे को मजबूत किया है. इसमें पांच लाख रुपए का दुर्घटना बीमा कवर, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के लिए आर्थिक मदद, और रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रम शामिल हैं. जनवरी 2025 में पार्टी ने दावा किया था कि उसके सदस्यों की संख्या एक करोड़ का आंकड़ा पार कर गई है. इसका श्रेय लोकेश को ही दिया गया क्योंकि टेक्नोलॉजी की मदद से यह मुहिम उनकी निगरानी में ही चली थी जिससे पंजीकरण का काम बिना किसी बाधा के पूरा हो सका.

इस बीच, पार्टी में ऐसी उम्मीदें जताई जा रही हैं कि नायडू जल्द ही राज्य की कमान लोकेश को सौंप सकते हैं. टीडीपी नेताओं का एक तबका इस 'राज्याभिषेक' को चंद्रबाबू के केंद्र की राजनीति में जाने से जोड़कर देख रहा है—''अगर उन्हें उनके कद के हिसाब से कोई उपयुक्त पद मिलता है, मसलन उप-प्रधानमंत्री का पद...'' वहीं कुछ अन्य नेताओं का मानना है कि वे आंध्र प्रदेश में ही रुककर विधानसभा चुनाव, 2029 की तैयारी में लोकेश की मदद करेंगे.

हालांकि, टीडीपी के इस युवा नेता ने मुख्यमंत्री पद संभालने से जुड़ी किसी भी चर्चा को सिरे से खारिज कर दिया है. इंडिया टुडे से बातचीत में लोकेश ने कहा कि उनके पास पहले से ही बहुत काम है. उनके मुताबिक, ''हमारे नेता (नायडू) ने हमें राज्य के विकास के लिए बहुत सारा काम सौंप रखा है. मेरा ध्यान किसी पद पर नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारियों को निभाने पर ज्यादा केंद्रित है.''

2029 का एजेंडा
युवा नेता के भाजपा नेताओं से मिलने के लिए बार-बार दिल्ली पहुंचने को ऐसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है जिससे उनका दावा मजबूत हो सके—खासकर उस स्थिति में जब नायडू राजनीति से संन्यास लेने या केंद्र में कोई पद स्वीकारने का फैसला करें.

वहीं राज्य की बात करें तो जन सेना नेता और मौजूदा डिप्टी सीएम कल्याण की प्रतिक्रिया पर सबकी नजर रहेगी क्योंकि कहा तो यह भी जा रहा है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर इस लोकप्रिय अभिनेता-नेता की भी नजर है. लोकेश भले ही कल्याण को 'पेदन्ना' (बड़े भाई) कहकर बुलाते हों लेकिन पिछले साल की घटनाओं पर नजर डालें तो जेएसपी को टीडीपी नेताओं की यह मांग कतई नहीं सुहाई है कि लोकेश को भी डिप्टी सीएम बनाया जाना चाहिए.

टीडीपी के युवा वारिस तमाम परिस्थितियों से कैसे निबटते हैं, यही उनके राजनीतिक सफर का अगला चरण तय करेगा. नव्यांध्र इंटेलेक्चुअल फोरम के चेयरमैन डी.ए.आर. सुब्रह्मण्यम कहते हैं, ''अगर 2027 के मध्य तक लोकेश को सीएम बना दिया जाता है, तो उन्हें काम करने के लिए पूरे दो साल मिलेंगे—जो जगन के खिलाफ चुनावी जंग के लिए अपनी साख मजबूत करने के लिहाज से काफी हैं.'' 2024 के चुनावों में करारी हार का सामना करने के बावजूद, वाइएसआरसीपी नेता की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है. उन्हें अब भी 40 फीसद वोटों का समर्थन हासिल है. ऐसे में, जगन का मुकाबला करना ही नारा लोकेश के लिए सबसे बड़ा सियासी इम्तहान होगा.'' 

Read more!