डेयरी में बड़े मौके का दोहन

मोहन यादव ने दूध उत्पादन दोगुना करने के लिए नस्ल सुधार, टेक्नोलॉजी और सहकारी संस्थाओं पर दांव लगाया, पर असल वजह है जाति का गुणाभाग

मोहन यादव अपने भोपाल स्थित निवास पर एक नवजात बछिया के साथ, जिसका नाम उन्होंने कमला रखा है

दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री बन मध्य प्रदेश की कमान संभालने के कुछ ही महीनों के भीतर मोहन यादव ने राज्य में दूध का उत्पादन अगले पांच साल में दोगुने से ज्यादा बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजना का ऐलान किया था.

देश के डेयरी उत्पादन में मध्य प्रदेश का हिस्सा अभी करीब 9 फीसद है, जिसे बढ़ाकर 20 फीसद तक ले जाना उनका लक्ष्य है. दूध उत्पादन में राज्य तीसरे पायदान पर है, जबकि उत्तर प्रदेश (16 फीसद) और राजस्थान (15 फीसद) उससे आगे हैं. मुख्यमंत्री कहते हैं, ''इस क्षेत्र के विकास के लिए हम बहुआयामी दृष्टिकोण लेकर चल रहे हैं.''

नजर जाति पर?
डेयरी पर इस जोर के पीछे राजनीति समझने वाले मुख्यमंत्री की जातिगत पृष्ठभूमि को देखते हैं. दूध के कारोबार मे लगे लोगों का बड़ा हिस्सा यादव और पाल समुदायों का है और इस क्षेत्र के मजबूत होने का फायदा उन्हें ही मिलने की संभावना है. डेयरी को बढ़ावा देना उस ज्यादा बड़ी कोशिश से भी मेल खाता है जिसमें यादव पहचान से जुड़े मंसूबों पर जोर दिया जा रहा है.

मसलन एक योजना श्री कृष्ण पाथेय तीर्थ का विकास करने की है, जो यादवों के लिए खास अहमियत रखता है. साथ ही 300 सांदीपनि (कृष्ण के गुरु) स्कूल खोलने और सभी शहरी स्थानीय निकायों में गीता भवन बनाने का इरादा भी है. मगर मुख्यमंत्री ऐसे किसी इरादे से इन्कार करते हुए कहते हैं कि डेयरी को बढ़ावा देने का फायदा सभी को होगा.

नस्ल में सुधार, चारा, टीकाकरण, और दूध की मार्केटिंग मुख्यमंत्री की योजना के मुख्य हिस्से हैं. 2019 की पशुगणना के मुताबिक मध्य प्रदेश के करीब 70 फीसद मवेशियों के वंश का कोई अता-पता नहीं—केवल करीब 30 फीसद की वंशावली का पता है और वे ठीक-ठाक तादाद में दूध देते हैं. लिहाजा कृत्रिम गर्भाधान और कुछ हद तक इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (आइवीएफ) के जरिए, ऐसे पशुओं का हिस्सा कम करना है. साथ ही, उन पशुओं को बधिया बनाना है जिनमें सुधार नहीं हो सकता, ताकि उनकी आनुवांशिक शृंखला खत्म की जा सके.

कृत्रिम गर्भाधान हालांकि बड़े पैमाने पर राज्य में किया जाता है, लेकिन उसकी न तो कोई व्यवस्थित प्रणाली है और न ही कोई फीडबैक. संततियों की नस्ल का कोई लेखा-जोखा भी नहीं. पशुपालन महकमे के प्रिंसिपल सेक्रेटरी उमाकांत उमराव कहते हैं, ''इस कमी को पूरा करने के लिए हमने अपने पशु चिकित्सकों को नई से नई तकनीकों का प्रशिक्षण देने और महज टारगेट पूरे करने वाले काम को जड़ से खत्म करने का फैसला किया है.'' वे आगे कहते हैं, ''हमने एवीएफओ (असिस्टेंट वेटरनेरी फील्ड ऑफिसर) को प्रशिक्षित किया है कि मवेशी मालिकों के साथ बातचीत कर उन्हें नस्ल में सुधार का विकल्प अपनाने के लिए तैयार करें.''

नतीजे दिखाई भी देने लगे हैं. वित्त वर्ष 2024-25 और 2025-26 के बीच कृत्रिम गर्भाधान की प्रक्रियाएं 12.5 लाख से बढ़कर 20.9 लाख हो गईं, जबकि जिन पशुओं पर यह प्रक्रियाएं की गईं उनकी संख्या 10.8 लाख से बढ़कर 16.8 लाख पर पहुंच गई. कृत्रिम गर्भाधान के साथ दिक्कत यह है कि लेखाजोखा रखने के बाद भी शुद्ध नस्ल की संतति पैदा करने में 20 साल और छह पीढ़ियां तक लग सकती हैं.

आइवीएफ से यह अवधि कम हो जाती है. भोपाल के बुल मदर फार्म में, जहां 450 संततियों को जन्म दिया गया, आइवीएफ लैब के प्रभारी डॉ आनंद कुशवाहा कहते हैं, ''किसी पशु में 100 फीसद शुद्ध नस्ल का भ्रूण प्रत्यारोपित करके एक ही पीढ़ी में शुद्ध नस्ल की संतति हासिल की जा सकती है.''

अच्छी किस्म का चारा भी एक अहम पहलू है जिसकी बदौलत, तकरीबन 1.5 साल में ही पशु यौन प्रजनन की स्थिति में आ जाता है, जबकि इसके बगैर उसे तीन साल लगते हैं. किसानों को ऐप के जरिए हरे चारे के बारे में बताया जाता है. मध्य प्रदेश में हरा चारा महज 29,000 हेक्टेयर में बोया जाता है, जबकि डेयरी सेक्टर में कामयाबी का मॉडल माने जाने वाले गुजरात में यह 17 लाख हेक्टेयर में बोया जाता है. चारे की खेती को बढ़ावा देने के लिए पशुपालन, वन और कृषि विभाग मिलकर काम कर रहे हैं.

राज्य में संभावनाएं तो बहुत हैं, लेकिन चुनौतियां भी कायम हैं. एक तो पशु चिकित्सकों की नई भर्तियां होती दिखाई नहीं देतीं. ठेके पर एवीएफओ और निजी पशु चिकित्सकों की सेवाएं लेने पर निर्भरता बनी हुई है. एआइ और आइवीएफ के लिए इस्तेमाल उपकरण ज्यादातर आयातित हैं, जिससे उनकी सर्विसिंग और मरम्मत का काम सुस्त रफ्तार से होता है. बजट सहायता बढ़ाई गई है लेकिन फिर भी नाकाफी है.

सहकारिता में नई जान
मध्य प्रदेश ने श्वेत क्रांति का सफर अप्रैल 2025 में शुरू किया, जब राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के साथ एमओयू पर दस्तखत करके मध्य प्रदेश राज्य सहकारी डेयरी फेडरेशन (एमपीएससीडीएफ) का प्रबंधकीय नियंत्रण उसे सौंप दिया गया. एनडीडीबी ने तभी से दूध का संग्रह बढ़ाने के अलावा मांग बढ़ाने की खातिर उत्पादों में विविधता लाने पर ध्यान दिया. दुग्ध संग्रह के ठिकानों वाले गांवों की संख्या 5,763 से बढ़कर 6,989 हो गई और रोज उठाए जाने वाले दूध की खरीद 9.5 लाख लीटर से बढ़कर 11.5 लाख लीटर हो गई.

एमपीएससीडीएफ के एमडी संजय गोवाणी कहते हैं, ''हमारा लक्ष्य पांच साल में करीब 26,000 गांवों—आधे राज्य—तक विस्तार करना और दूध का संग्रह रोज पांच लाख लीटर तक बढ़ाना है.'' डेयरी किसानों का सदस्यता आधार भी एक साल में 2,14,000 से बढ़कर 2,50,000 हो गया. दूध की आपूर्ति करने वाले डेयरी किसानों को भुगतान भी 2 रुपए प्रति लीटर से लेकर 8.5 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ गया.

डेयरी से आमदनी बढ़ाने में सहकारी संस्थाओं की भूमिका बहुत अहम है. गुजरात अपने 90 फीसद दूध की खरीद सहकारी संस्थाओं के जरिए करता है, जबकि मध्य प्रदेश महज 4 फीसद की ही कर पाता है. इससे पता चलता है कि मध्य प्रदेश दुग्ध सहकारी संघ को मजबूत करने की कितनी जरूरत है. 

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने राज्य के डेयरी क्षेत्र से जुड़ी अपनी योजनाओं के बारे में इंडिया टुडे से बात की. पेश हैं प्रमुख अंश:

• आपने दूध का उत्पादन दोगुना करने की घोषणा की है. इसे हासिल कैसे करेंगे?

राज्य की दुग्ध सहकारी संस्था को पिछले साल जब हमने राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के हाथों में सौंपा, उस वक्त रोजाना 9.55 लाख लीटर दूध संग्रह किया जाता था और अब यह बढ़कर 11.72 लाख लीटर प्रतिदिन हो गया है. अंतत: 50 लाख लीटर प्रतिदिन के लक्ष्य पर पहुंचने के लिए हमारी योजना इसी मॉडल को आगे ले जाने की है. राज्य का दूध उत्पादन तो इससे कहीं ज्यादा, करीब 5.5 करोड़ लीटर रोज का है. यही वजह है कि इस क्षेत्र में जबरदस्त संभावना है.

कई भाजपा-शासित राज्य गायों की रक्षा के लिए गौशाला मॉडल पर जोर दे रहे हैं. आपका नजरिया अर्थशास्त्र पर ज्यादा आधारित दिखाई देता है.

गायों की रक्षा के लिए हम केवल चैरिटी और धर्म के भरोसे नहीं रह सकते. हमें स्वावलंबी होना होगा. नस्ल सुधार, मवेशियों के लिए समुचित और पोषक आहार और प्रसंस्करण इकाइयों को आधुनिक बनाने पर ध्यान दिया जा रहा है. एक नजर बाजार पर रखनी होगी. हम सीमांत किसानों को लेकर भी फिक्रमंद हैं, जो अपनी आमदनी का स्तर बढ़ा सकते हैं.

कहा जाता है कि डेयरी सेक्टर पर आप अपनी राजनैतिक स्थिति को मजबूत करने के लिए ध्यान दे रहे हैं क्योंकि आप पशुपालन में लगे समुदाय से आते हैं.

गोपाल कौन है? हर वह व्यक्ति जिसके पास गाय है, गोपाल है. खेती-किसानी में लगे सभी समुदाय मवेशी रखते और उनसे कमाते हैं. इस क्षेत्र के विकास का फायदा हर उस समुदाय को होगा जो दूध के उत्पादन में शामिल है, फिर उसकी जाति या धर्म चाहे जो हो. दूध कुपोषण से निबटने में भी मदद करेगा.

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